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Tata Group ने क‍िया इस मह‍िला के साहस और समर्पण को सलाम, इनकी मौत से भारत में महिला आंदोलन को भी लगा था बड़ा झटका, आप भी जान‍िए

Jamshedpur : टाटा समूह ने आज यानी बुधवार को अपने आधि‍कारि‍क ट्वि‍टर हैंडल से लेडी मेहरबाई टाटा की तस्‍वीर के साथ खास ट‍िप्‍पणी की है. ल‍िखा है- जिसका साहस और समर्पण हमें प्रेरित करता रहता है. बात है भी सोलहों आने सच. टाटा समूह को आकार देने और इसकी देश-दुन‍िया में जड़ें जमाने में मेहरबाई टाटा का योगदान कम नहीं था. एक से बढ़कर एक कहानी और हर आम ओ खास को प्रेरि‍त करने वाले तथ्‍य. इसमें एक कहानी जो मेहरबाई की महान शख्‍सि‍यत को दर्शाता है. जब जमशेदजी टाटा के बेटे दोराबजी टाटा टाटा समूह के चेयरमैन थे और टाटाट स्‍टील तब ट‍िस्‍को डूबने की कगार पर पहुंच गई थी. दोराबजी टाटा और उनकी पत्‍नी मेहरबाई टाटा की बदौलत कंपनी न केवल बची बल्‍क‍ि मुनाफे में भी आयी. इसमें अहम रोल नभिाया एक बेशकीमती हीरे ने जिसका नाम है जुबली डायमंड. पत‍ि के हाथों उपहार में म‍िले हीरे को मेहरबाई ने न‍ि:संकोच ग‍िरवी रखने की इजाजत दे दी और बदले में म‍िले रुपयों से कंपनी संकट से उबरी.
इन सबसे अलग आपको शायद ही मालूम हो क‍ि भारत में बाल व‍िवाह को गैरकानूनी घोषि‍त करने के अभि‍यान में मेहरबाई टाटा का खास योगदान था. बाल विवाह निरोध अधिनियम, जिसे शारदा अधिनियम के नाम से जाना जाता है, 1929 में पारित किया गया था. लेडी टाटा से न केवल शारदा अधिनियम पर परामर्श लिया गया, बल्कि उन्होंने भारत और विदेशों में भी इसके लिए सक्रिय रूप से प्रचार किया था. राष्ट्रीय महिला परिषद और अखिल भारतीय महिला सम्मेलन जैसे उस समय के नवजात महिला संगठनों के सदस्य के रूप में उन्होंने 29 नवंबर, 1927 को मिशिगन के एक कॉलेज में हिंदू विवाह विधेयक के लिए एक मामला बनाया. उसके दो दिन बाद उनके पति सर दोराबजी टाटा ने व्हाइट हाउस में तत्कालीन संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति केल्विन कूलिज से मुलाकात की. उन्होंने बैटल क्रीक कॉलेज जो अब एंड्रयूज यूनिवर्सिटी है में आयोज‍ित कार्यक्रम में अपने संबोधन में कहा- मेरे पास आज भारत के एक विधायक द्वारा भेजा गया एक पैम्फलेट है जो भारत सरकार में लड़क‍ियों की शादी की न्यूनतम उम्र तय करने के लिए एक बिल पेश करना चाहता है.

इन राज्‍यों में बदलाव का द‍िया था हवाला
विधायक के परिचयात्मक भाषण का हवाला देते हुए उन्होंने कहा था- मेरे पास सरकार से बिल के प्रति उनके रवैये के बारे में कहने के लिए एक शब्द है. सरकार शायद जानती है कि कई भारतीय राज्यों मसलन बड़ौदा, मैसूर और भरतपुर ने 12 साल से कम उम्र की लड़कियों के विवाह पर रोक लगानेवाले कानून पारित किए हैं. हाल ही में राजस्थान के राज्य कोटा ने एक नया विवाह अधिनियम लागू किया. इससे पता चलता है कि बाल विवाह के संबंध में सरकारें वास्तव में अपने लोगों के कल्याण में क्या रुचि रखती हैं और क्या चाहती हैं. भारत सरकार का कर्तव्य उनके सामने स्पष्ट है. मुझे पूरी उम्मीद है कि यह बिल पास हो जाएगा. मुझे लगता है कि इसे अगले फरवरी में फिर से सरकार के सामने लाया जाना है. हालांकि, बिल 28 सितंबर 1929 तक पारित नहीं हुआ था और लेडी टाटा जैसी महिला नेताओं की भारतीयों को समझाने और विश्व राय का दबाव बनाने की क्षमता के बिना यह संभव नहीं होता. उन्होंने प्रस्तावित नए संविधान में महिलाओं के लिए समान राजनीतिक स्थिति की मांग में 1930 में अखिल भारतीय महिला सम्मेलन में संघर्ष की बात की. विधानसभा में महिला सदस्यों की अनुपस्थिति को शारदा विधेयक के समर्थकों द्वारा एक बड़ी कमी के रूप में महसूस किया गया था. जैसा कि महिलाएं अपनी बहनों की भावनाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक प्रत्यक्ष और बल के साथ व्यक्त कर सकती थीं.
बनी वैश्विक आवाज

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शारदा अधिनियम के लिए लेडी टाटा का प्रभावी कार्य भारत में महिलाओं की मुक्ति में उनके विशाल योगदान का केवल एक पहलू था, वह महिलाओं के मताधिकार, लड़कियों की शिक्षा और पर्दा प्रथा को हटाने के लिए प्रतिबद्ध थीं और वैश्विक मंचों पर उनका समर्थन करने में विशेषज्ञ थीं. लंदन में अंतर्राष्ट्रीय महिला मताधिकार समाचार ने 1921 में रिपोर्ट किया था क‍ि बॉम्बे की विधान परिषद ने महिलाओं के मताधिकार देने का एक प्रस्ताव पारित किया है. महिला मताधिकार के पक्ष में एक बड़ी सार्वजनिक बैठक विल्सन कॉलेज हॉल बॉम्बे में लेडी टाटा की अध्यक्षता में आयोजित की गई थी. बम्बई की महिलाओं को मताधिकार देने के लिए विधान परिषद का आह्वान करने वाला एक प्रस्ताव पारित किया गया और विधान परिषद के प्रत्येक सदस्य को भेजा गया. हम भारतीय महिलाओं के लिए इस दूसरी बड़ी जीत पर खुशी मनाते हैं . जिस अद्भुत गति से वे चीजों को पार करती हैं उसे खुशी से स्वीकार करते हैं. एक अन्य ब्रिटिश समाचार पत्र द स्फीयर ने 1924 में वेम्बली में महिला सप्ताह के दौरान भारतीय सम्मेलन आयोजित करने में मदद करने में मेहरबाई टाटा की भूमिका पर ध्यान दिया. भारत में भारतीय महिला लीग संघ के अध्यक्ष के रूप में और बॉम्बे प्रेसीडेंसी के संस्थापकों में से एक के रूप में महिला परिषद लेडी टाटा ने भी भारत को अंतर्राष्ट्रीय महिला परिषद में शामिल किया.
भारत की प्रवक्ता

The Royal’s
Sanjeevani
Pitambara
Pushpanjali


1931 में अपनी मृत्यु के बाद उन्होंने जो निशान छोड़ा, वह उनके बारे में लिखे गए मृत्युलेखों में स्पष्ट था. लंदन के एक प्रकाशन द कॉमन कॉज ने लिखा- जून में लेडी टाटा की मौत भारत में महिला आंदोलन के लिए एक बड़ा झटका है. यह अन्य देशों में महिलाओं के अंतर्राष्ट्रीय समूहों में लगभग उतना ही महसूस किया जाएगा, जहां कुछ वर्षों से उन्हें भारत की प्रवक्ता के रूप में देखा जाता रहा है. लेडी टाटा को अन्य देशों की महिलाओं के लिए भारत के प्रतिनिधि की भूमिका निभाने के लिए सराहनीय रूप से फिट किया गया था. उनके पास चरित्र की महान शक्ति थी, जो वास्तविक दयालुता और व्यवहार की विलक्षण कृपा के साथ किसी भी सम्मेलन में तुरंत अपनी उपस्थिति दर्ज कराती थी. अनेक देशों की महिलाओं ने अपनी सशक्त वाणी, अपनी सुंदरता और बुद्धिमान सहनशीलता से आधुनिक मुक्त भारतीय नारी की छाप छोड़ी. आधुनिक मुक्त भारतीय नारी की सशक्त वाणी, सुन्दरता और विवेकपूर्ण सहनशीलता की छाप. श्रद्धांजलि ने उनके अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण पर प्रकाश डाला और कैसे नस्ल और रंग की बाधाओं से पीछे हटने से इनकार करने से उन्हें “भारत में महिलाओं की राष्ट्रीय परिषद की चलती भावना” बना दिया. लेडी टाटा बहुत छोटे समूह से संबंधित थी जो अन्य भूमि की महिलाओं के साथ सहयोग में भी विश्वास करती. वह दर्द सहने की अनंत क्षमता रखती थी और उसने कभी भी जल्दबाजी या बिना सोचे-समझे निर्णय नहीं लिया. जब भी उसने किसी व्यक्ति की मदद करने का वादा किया या उसने अपनी ताकत के आखिरी औंस तक ऐसा किया.

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