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तालिबान ने किया अफगान के वार्ता प्रस्ताव को खारिज

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Faisal Anurag

Faisal Anurag

तालिबान ने काबुल के बातचीत के प्रस्ताव को खारिज कर दिया है. अफगानिस्तान सरकार ने जनवरी में औपचारिक रूप से तालिबान को सऊदी अरब में अमेरिका, यूएनओ और अन्य नाटो देशों के साथ बातचीत में शामिल होने का प्रस्ताव दिया है. तालिबान के एक प्रतिनिधि ने कहा है कि वह अफगानिस्तान की सरकार के साथ बातचीत में शामिल नहीं होगा, लेकिन अमेरिका के साथ अपनी अधूरी वार्ता को जारी रखेगा. तालिबान ने कहा है कि अफगानिस्तान की सरकार स्वतंत्र नहीं है, बल्कि वह अमेरिका और अन्य नाटो देशों की कठपुतली मात्र है.

अमेरिका और तालिबान के बीच पिछले दिनों अबुधाबी में बातचीत हुयी थी. तालिबान अमेरिकी  अधिकारियों के साथ सऊदी अरब में बातचीत को आगे जारी रखना चाहता है. इस बीच अमेरिका  के प्रेसिडेंट ट्रंप ने चौंकाने वाला बयान दिया है. उन्होंने सोवियत संघ की उस कार्रवाई को सही बताया है, जिसमें सोवियत संघ ने अपनी सेना पिछली सऊदी के आठवें दशक में अफगानिस्तान में तैनात करा दिया था. इसे अब तक अमेरिका और अन्य नाटो देश अफगानिस्तान पर सोवियत संघ का आक्रमण ही मानते रहे हैं. इस बयान के बाद पूर्व सोवियत संघ की कार्रवाई को लेकर दुनियाभर में कुटनीतिक बहस तेज हो गयी है. ट्रंप का यह बयान जहां एक ओर तमाम पूर्ववर्ती अमेरिकी प्रशासन की नीतियों को गलत ठहरा रहा है, वहीं अमेरिका की वह बेचैनी भी जाहिर कर रहा है, जो तीन दशकों के हस्तक्षेप के बाद भी अफगानिस्तान में फैसलाकुन जंग नहीं जीत पाया है.

ट्रंप चीन,पाकिस्तान और भारत से कहा है कि अफगानिस्तान में जंग लड़े. ट्रंप एक और प्रधान के प्रधानमंत्री का मजाक भी उड़ा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अफगानिसतान नीति पर लगातार अपनी दुविधा भी प्रकट कर रहे हैं. ट्रंप ने यह भी कहा है कि निकट भविष्य में अमेरिका अफगानिस्तान से अपने 7000 सैनिकों को वापस बुला लेगा. इस घोषणा में बाद नाटो के अन्य सदस्य देश भी दुविधा में हैं. विदेश मामलों के जानकार बताते हैं कि अमेरिका अफगान जंग में भारत और चीन को घसीटना चाहता है, जबकि पाकिस्तान को एकबार फिर वह एक निर्णायक जुग का हिस्सेदार बनाना चाहता है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने साफ कहा है कि पाकिस्तान अमेरिका को थोपा हुआ जंग नहीं लडेगा और न ही अपना कंधा इस्तेमाल करने देगा.

अमेरिका पाकिस्तान के इस रूख से बौखलाया हुआ है. हालांकि इमरान खान सरकार तालिबान से बातचीत को सकारात्मक पहल बताते हुए उसमें भूमिका भी निभा रहे हैं. तबाह अफगान में पुर्ननिर्माण के कामों में भारत ने पिछले दिनों महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है, लेकिन वह अब तक वहां किसी भी हालत में सैनिक भेजने से इंकार करता रहा है. भारत अपने पड़ोसी देशों में सैन्य हस्तक्षेप में रूचि नहीं लेता है.

श्रीलंका में भेजे गए शांति सेना के अनुभव से भी भारत ने सीखा है कि उसे पड़ोसियों के मामले में ज्यादा सजग रहने की जरूरत है. सैन्य हस्तक्षेप के मामले में मोदी सरकार अपनी पूर्ववर्ती सरकारों की नीतियों पर ही अब तक चली है, लेकिन ट्रंप का दबाव है कि भारत अपनी इस नीति से परे जाकर अफगान जंग का हिस्सेदार बने. चीन ने अब तक ट्रंप की अपील पर ध्यान नहीं दिया है. भारत ने भी इसपर कुछ नहीं कहा है. जबकि भारत और चीन दोनों ही उस बातचीत में शामिल हो रहे हैं. भारत अनौपचारिक रूप से ही शामिल हो रहा है. माना जा रहा है कि दुनिया के अधिकांश प्रभावी देश अफगान नीति पर लगातार दुविधा में ही हैं. दुनिया यह महसूस कर रही है कि अफगान जंग का नतीजा सामने नहीं आ रहा है और इससे तालिबान को कमजोर भी नहीं किया जा सका है. पाकिस्तान में भी कहा जा रहा है कि अफगान और इराक नीति पाकिस्तानी दहशतगर्दी का बड़ा कारण है. इमरान खान की पार्टी और उनकी सरकार साफ कह रही है कि सैन्य हस्तक्षेप कारगर नहीं रहा है. ट्रंप ने पूर्ववर्ती सोवियत संघ के सैन्य हस्तक्षेप को जायज ठहराकर इस बहस को पुनर्जीवित कर दिया है कि जब बबरक करमाल के नेतृत्व में राजशाही विरोधी क्रांति अफगानिस्तान में हुई थी, उसके खिलाफ अमेरिका ने ही अफगान कट्टरपंथियों को हवा दिया था और जब बरबक करमाल के निमंत्रण पर सोवियत सेना ने अफगानिस्तान में प्रवेश किया तो उसे आक्रमण बताकर तालिबान को खड़ा करने में मदद की गयी थी. दुनिया में यह बहस होती रही है कि जब तालिबान अमेरिकी नियंत्रण से बाहर हुआ, उसके बाद ही उसके खिलाफ जंग अमेरिका ने शुरू किया. अब अमेरिका अपने सैनिकों को वापस बुलाने की घोषणा कर अफगानिस्तान की वर्तमान सरकार को चौराहे पर खड़ा कर दिया है. कहा जाता है कि गनी सरकार काबुल तक ही सीमित है, देश के अन्य हिस्सों पर तालिबान के विभिन्न गुटों का वर्चस्व है. तालिबान के साथ बातचीत की राह की सबसे बड़ी बाधा यह है कि तालिबान कोई संघटित समूह नहीं है. उसके अनेक गुट हैं और सबके सब एक दूसरे के विरोधी है. ऐसी स्थिति में अफगानिस्तान को लेकर कोई भी बातचीत तब ही सार्थक होगी, जब उसमें सभी गुटों को शामिल किया जाए. इसमें अनेक गुट ऐसे हैं, जो विभिन्न निहितस्वार्थी ताकतों के इशारे पर संचालित हैं. इस बाधा के बावजूद तालिबान से बातचीत पर सारी दुनिया की नजर है. जनवरी की बातचीत आगे का रास्ता प्रशस्त करेगी.

(लेखक न्यूज विंग के वरिष्ठ संपादक हैं)

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