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मृत्यु से पहले 3 साल तक कोमा में रहे थे नोबेल पुरस्कार पानेवाले पहले एशियाई टैगौर

पूरब के लियोनार्दो द विंची कहे जानेवाले रवींद्र नाथ टैगोर की जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : रविंद्र नाथ टैगोर बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. उनकी तुलना लियोनार्दो द विंची से भी की जा सकती है. जिस तरह से विंची कला के कई क्षेत्रों में अपनी अद्भुत सृजनात्मकता का उदाहरण पेश करते हैं उसी तरह टैगोर भी कविता, कहानी, उपन्यास, गीत, संगीत व चित्रकला में अपनी प्रतिभा दिखाते हैं.

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‘ब्रह्म समाज’ के संस्थापकों में शामिल थे पिता

टैगोर का जन्म कलकत्ता के एक बंगाली परिवार में हुआ. ये अपने माता – पिता के 13 बच्चों में सबसे छोटे थे. उनके पिता देवेंद्र नाथ ठाकुर महान हिन्दू दार्शनिक और ‘ब्रह्म समाज’ धार्मिक आंदोलन के संस्थापकों में से एक थे.

इनकी उम्र बहुत कम थी जब माँ से साथ छूट गया. पिता भी ज्यादातर समय घर से दूर रहते थे. इसलिए इन्हें घर की आया एवं घर के नौकरों द्वारा पाला – पोसा गया था. सन 1883 में उन्होंने 10 साल की उम्र की मृणालिनी देवी के साथ विवाह किया. इनके कुल 5 बच्चे हुए. सन 1902 में उनकी पत्नी की मृत्यु हो गई.

टैगोर बहुत ही कम उम्र में बंगाल पुनर्जागरण का हिस्सा बने, जहां उनके परिवार की काफी सक्रिय भागीदारी रहती थी. टैगोर का पूरा परिवार एक उत्साही कला प्रेमी था. उन्होंने क्षेत्रीय एवं पश्चिमी दोनों ही भाषाओँ में थिएटर, संगीत, और साहित्य का अध्ययन किया.

जब वे केवल 11 वर्ष के थे तो अपने पिता के साथ पूरे भारत का दौरा किया. इस यात्रा के दौरान उन्होंने कई विषयों में ज्ञान अर्जित किया. उन्होंने कालीदास को पढ़ा और जाना.

जब वे इस यात्रा से वापस लौटे तब उन्होंने सन 1877 में मैथिली शैली में एक बहुत लंबी कविता लिखी. उन्हें कवि कालिदास जी के अलावा अपने भाई बहनों से भी प्रेरणा मिली

. यात्रा के दौरान जब वे अमृतसर में थे. तब उन्होंने सिख धर्म के बारे में जाना. इससे बाद में 6 कविताओं और धर्म पर कई लेखों को लिखने में मदद की

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रवींद्र नाथ टैगोर की शिक्षा

हालाँकि टैगोर की अधिकांश शुरूआती शिक्षा घर पर ही पूरी हुई थी. किन्तु इनकी पारंपरिक शिक्षा इंग्लैंड के स्कूल ब्राइटन, ईस्ट ससेक्स से पूरी हुई.

दरअसल उनके पिता चाहते थे कि वे बैरिस्टर बने. इसलिए उन्होंने रवींद्र को सन 1878 में इंग्लैंड भेजा. उन्होंने लंदन यूनिवर्सिटी के कॉलेज में दाखिला लिया, किन्तु वे बिना डिग्री लिए इसे बीच में ही छोड़ दिए.

वे शेक्सपियर के कई कामों को अपने ही तरीके से सीखने की कोशिश करने लगे. वहां से वे अंग्रेजी, आयरिश और स्कॉटिश साहित्य और संगीत के सार को सीखने के बाद भारत वापस लौट आये.

टैगोर ने बहुत कम उम्र में ही लिखना शुरू कर दिया था. सन 1882 में उन्होंने अपनी सबसे चर्चित कविताओं में से एक ‘निर्जहर स्वप्नाभांगा’ लिखी थी. उनकी एक भाभी कादंबरी उनके करीबी दोस्त और विश्वासी थी.

जिन्होंने सन 1884 में आत्महत्या कर ली थी. इस घटना से उन्हें गहरा आघात पहुंचा, उन्होंने स्कूल में कक्षाएं छोड़ी और अपना अधिकांश समय गंगा में तैराकी करने और पहाड़ों में ट्रैकिंग करने में बिताया.

सन 1890 में उनकी कविताओं का संग्रह ‘मणसी’ प्रकाशित हुआ था. सन 1891 और 1895 के बीच की अवधि फलदायी शाबित हुई, जिसके दौरान उन्होंने लघु कथाओं ‘गल्पगुच्छा’ के तीन खंडों का संग्रह किया.

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शान्तिनिकेतन की स्थापना

टैगोर ने प्रयोगात्मक स्कूल की स्थापना के विचार के साथ 1901 में शान्ति निकेतन की नींव रखी. वहां एक आश्रम की स्थापना की.. वहां पेड़ के नीचे कक्षाएं चलती थीं. वहां पारंपरिक रूप से गुरु – शिष्य परंपरा का पालन करते हुए शिक्षा दी जाती थी. टैगोर ने आशा व्यक्त की कि आधुनिक विधि की तुलना में शिक्षण के लिए प्राचीन विधि में परिवर्तन फायदेमंद साबित हो सकता है.

जब वे शांतिनिकेतन में रह रहे थे उस समय उन्होंने सन 1901 में ‘नावेद्य’ और सन 1906 में ‘खेया’ का प्रकाशन किया था. दुर्भाग्यवश, उसी दौरान उनकी पत्नी और उनके दो बच्चे मृत्यु को प्राप्त हो गये, जिससे वे बहुत दुखी हुए. किन्तु उस समय उनके द्वारा किये गये कार्य बंगाली के साथ – साथ विदेशी पाठकों के बीच अधिक से अधिक लोकप्रिय होने लगे थे.

सन 1912 में वे इंग्लैंड गए, वहां उन्होंने उनके द्वारा किये गये रचनाओं को विलियम बटलर योर्ट्स, एज्रा पौण्ड, रोबर्ट ब्रिजेस, एर्नेस्ट राईस और थॉमस स्टर्ज मूर के साथ ही उस युग के प्रमुख लेखकों के समक्ष पेश किया. मई 1916 से अप्रैल 1917 तक वे जापान एवं अमेरिका में रहे जहाँ उन्होंने ‘राष्ट्रवाद’ और व्यक्तित्व पर व्याख्यान दिया.

एक दुनिया’ की अवधारणा में विश्वास

टैगोर ‘एक दुनिया’ की अवधारणा में विश्वास करते थे, इसलिए उन्होंने अपनी विचारधाराओं को फ़ैलाने के प्रयास में विश्व दौरे की शुरुआत की. सन 1920 से 1930 के दशक में उन्होंने दुनिया के कई देशों की यात्रा की. उस दौरान उन्होंने लैटिन अमेरिका, यूरोप और दक्षिण पूर्व एशिया का दौरा किया. जहाँ उन्होंने अपने कार्यों के माध्यम से कई प्रसिद्ध कवियों का ध्यान अपनी ओर खींचा.

उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका और जापान जैसे देशों में लेक्चर दिए. इसके तुरंत बाद टैगोर ने मेक्सिको, सिंगापुर और रोम जैसे स्थानों का दौरा किया, जहाँ उन्होंने आइंस्टीन और मुस्सोलीनी जैसे प्रसिद्ध राष्ट्रीय नेताओं और महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों से मुलाकात की.

सन 1927 में, उन्होंने दक्षिणपूर्व एशियाई दौरे की शुरुआत की और कई लोगों को अपने ज्ञान और साहित्यिक कार्यों से प्रेरित किया. इन्होने इस अवसर का उपयोग कर कई विश्व के नेताओं से भारतीयों और अंग्रेजों के बीच के मुद्दों पर चर्चा करने का भी प्रयास किया.

यद्यपि उनका प्रारंभिक उद्देश्य साम्राज्यवाद को खत्म करना था, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने यह महसूस किया कि साम्राज्यवाद उनकी विचारधारा से अधिक शक्तिशाली है.

और इसलिए इसके प्रति उनमें और अधिक नफरत विकसित हुई. इसके अंत तक उन्होंने 5 महाद्वीपों में फैले 30 से भी अधिक देशों का दौरा किया था.

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रवींद्र का साहित्यिक कार्य

इन्होने अपने जीवनकाल के दौरान, कई कविताओं, उपन्यासों और लघु कथाओं की रचना की. हालाँकि उन्होंने बहुत कम उम्र में लिखना शुरू कर दिया था लेकिन साहित्यिक कार्यों की तेजी उनकी पत्नी और बच्चों की मृत्यु के बाद बढ़ी.

लघु कथाएं :- जब वे एक किशोरी थे तब उन्होंने छोटी कहानियां लिखना शुरू किया था. उन्होंने ‘भिखारिनी’ के साथ अपना लेखन करियर शुरु किया. अपने करियर के प्रारंभिक चरण के दौरान, उनकी कहानियां उस परिवेश को रिफ्लेक्ट करती थी, जिसमें में बड़े हुए. उन्होंने अपनी कहानियों में गरीबों की समस्याओं को भी शामिल किया.

उन्होंने हिन्दू विवाहों और कई अन्य रीति – रिवाजों के नकारात्मक पक्ष के बारे में भी लिखा जोकि देश की परंपरा का हिस्सा था. उनकी कुछ प्रसिद्ध लघु कथाओं में कई अन्य कहानियां जैसे ‘काबुलीवाला’, ‘क्षुदिता पाषाण’, ‘अटोत्जू’, ‘हेमंती’ और ‘मुसल्मानिर गोल्पो’ शामिल हैं.

उपन्यास :– उनके कार्यों में उपन्यासों की अधिक सराहना की जाती है. उन्होंने सामाजिक बुराइयों के बीच साम्राज्यवाद के आने वाले खतरों के बारे में बात की. उन्होंने अपने एक उपन्यास ‘शेशर कोबिता’ में मुख्य नायक की कविताओं और रिदमिक पैसेज के माध्यम से अपनी कहानी सुनाई. उनके प्रसिद्ध उपन्यासों में ‘नौकाडुबी’, ‘गोरा’, ‘चतुरंगा’, ‘घारे बाइरे’ और ‘जोगाजोग’ आदि शामिल है.

कवितायेँ :– रवींद्र ने कबीर और राम प्रसाद जैसे प्राचीन कवियों से प्रेरणा ली. इससे उनकी कविताओं और कार्यों की तुलना अक्सर 15 वीं और 16 वीं शताब्दी के शास्त्रीय साहित्य कवियों से की जाती थी. उनकी कुछ बेहतरीन कविताओं में ‘बालका’, ‘पूरबी’, ‘सोनार तोरी’ और ‘गीतांजली’ शामिल है.

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दो देशों के राष्ट्रीय गीत के रचयिता

टैगोर की अधिकांश कवितायेँ, कहानियां, गीत और उपन्यास बाल विवाह और दहेज जैसे उस समय के दौरान चल रही सामाजिक बुराइयों के बारे में होते थे. लेकिन उनके द्वारा लिखे गए गीत भी काफी प्रचलित थे. उनके गीतों के गायन शैली को ‘रवींद्र संगीत’ कहा जाता था.. देश के राष्ट्रीय गान –‘जन गण मन’ की रचना इन्हीं के द्वारा की गई है. इसके अलावा उन्होंने बांग्लादेशी राष्ट्रीय गीत –‘आमर सोनार बांग्ला’ की भी रचना की थी. जो कि बंगाल विभाजन के समय बहुत प्रसिद्ध था.

टैगोर ने भारतीय पौराणिक कथाओं और उस समय के सामाजिक मुद्दों को आधार बनाते हुए कई नाटक लिखे. जब वे किशोरवस्था में थे तब उन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर यह कार्य शुरू किया. जब वे 20 वर्ष के हुए तब उन्होंने न सिर्फ ‘वाल्मीकि प्रतिभा’ को लिखा बल्कि ‘टाईटूलर’ चरित्र का भी वर्णन किया.

पौराणिक डाईकोट नाटक वाल्मीकि जी पर आधारित था, उसे उन्होंने लिखा. उन्होंने इसमें कुछ सुधार कार्य कर इसे लिखा था.
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टैगोर कलाकार के रूप में

इन्होंने 60 साल की उम्र में ड्राइंग एवं पेंटिंग करना शुरू किया. उनकी पेंटिंग्स यूरोप में आयोजित प्रदर्शनी में प्रदर्शित की गई थी. टैगोर की सौन्दर्यशास्त्र, कलर स्कीम और शैली में कुछ विशिष्टताएँ थी, जो इसे अन्य कलाकारों से अलग करती थीं. वे उत्तरी न्यू आयरलैंड से सम्बंधित मलंगन लोगों की शिल्पकला से भी प्रभावित थे.

वह कनाडा के पश्चिमी तट से हैडा नक्काशी और मैक्स पेचस्टीन के वुडकट्स से भी काफी प्रभावित थे. नई दिल्ली में नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट में टैगोर जी की 102 कला कृतियाँ हैं.

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राजनीतिक विचारधारा

टैगोर का राजनीतिक दृष्टिकोण थोड़ा अलग था. हालाँकि उन्होंने साम्राज्यवाद की निंदा की, उन्होंने भारत में ब्रिटिश प्रशासन की निरंतरता एवं राष्ट्रवाद का समर्थन किया. उन्होंने महात्मा गाँधी द्वारा सितंबर 1925 में प्रकाशित ‘द कल्ट ऑफ द चरखा’ में ‘स्वदेशी आन्दोलन’ की आलोचना की.

उन्होंने ब्रिटिश और भारतीयों के सह – अस्तित्व में विश्वास किया. और उनका कहना था कि भारत में ब्रिटिश शासन ‘हमारी सामाजिक बीमारी के राजनीतिक लक्षण हैं’. वे कभी भी साम्राज्यवाद के समर्थन में नहीं थे. वे इसे मानवता की सबसे बड़ी चुनौती मानते थे.

उन्होंने शिक्षा प्रणाली की भी आलोचना की, जब भारत में अंग्रेजी भाषा के लिए मजबूर किया गया था. कभी – कभी वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन भी करते थे. स्वतंत्र भारत की उनकी दृष्टि पूरी तरह से विदेशी शासन से स्वतंत्रता पर आधारित नहीं थी, बल्कि अपने नागरिकों के विचारों और विवेक की स्वतंत्रता पर आधारित थी.

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मृत्यु के अंतिम पल

इनके जीवन के अंतिम चार वर्ष बीमारियों के चलते दर्द से गुजरे. जिसके कारण सन 1937 में वे कोमा में चले गये. वे 3 साल तक कोमा में ही रहे.

इस पीड़ा की विस्तृत अवधि के बाद 7 अगस्त, 1941 को उनका देहवसान हो गया. उनकी मृत्यु जोरसंको हवेली में हुई जहाँ उन्हें लाया गया था.

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नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले एशियाई

सन 1940 में, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी ने उन्हें शांतिनिकेतन में आयोजित एक विशेष समारोह में डॉक्टरेट ऑफ लिटरेचर से सम्मानित किया था.

अंग्रेजी बोलने वाले राष्ट्रों में उनकी सबसे अधिक लोकप्रियता उनके द्वारा की गई रचना ‘गीतांजलि : गीत की पेशकश’ से बढ़ी. इससे उन्होंने दुनिया में काफी ख्याति प्राप्त की. और उन्हें इसके लिए साहित्य में प्रतिष्ठित नॉबेल पुरस्कार जैसा सम्मान दिया गया. उस समय वे नॉन यूरोपीय और एशिया के पहले नॉबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाले विजेता बने.

सन 1915 में उन्हें ब्रिटिश क्राउन द्वारा नाइटहुड भी दिया गया था, किन्तु जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद उन्होंने 30 मई 1919 को अपने नाईटहुड को छोड़ दिया. उन्होंने कहा कि उनके लिए नाईटहुड का कोई मतलब नहीं था, जब अंग्रेजों ने अपने साथी भारतीयों को मनुष्यों के रूप में मानना भी जरुरी नहीं समझा.

टैगोर ने दुनिया भर में लेखकों की पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया. उनके द्वारा किये गए कार्यों का प्रभाव न सिर्फ बंगाल एवं भारत में था बल्कि यह दूर – दूर तक फैला हुआ था. इसलिए उनके कार्यों का अनुवाद अंग्रेजी, डच, जर्मन, स्पेनिश आदि भाषाओँ में भी किया गया था.

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