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कविता

ऐसे समय के लिए पहाड़ के जनकवि गिर्दा की कविता– अपनी औकात महसूस कीजिये

पहाड़ के बड़े जनकवि हुए हैं- गिर्दा. वे ऐसे ही समय के लिए आज से बहुत पहले उन्होंने लिखा है- अपनी औक़ात महसूस कीजिये. महसूस कीजिये कि इंसान कितना छोटा है, कितना निर्बल है. प्रकृति कितनी विशाल है, कितनी बलशाली है.ये जो भ्रम है इंसान को सब…

बांग्ला देश के कवि रफीक आजाद की कविता – बेहद भूखा हूं

बेहद भूखा पेट में, शरीर की पूरी परिधि मेंमहसूसता हूं हर पल, सब कुछ निगल जाने वाली एक भूखबिना बरसात के ज्यों चैत की फसलों वाले खेतों मेंजल उठती है भयानक आगठीक वैसी ही आग से जलता है पूरा शरीरमहज दो…

दंगों में अपमानित की जानेवाली बेटियों को समर्पित शरद कोकास की तीन कविताएं

बुरे वक्त में जन्मी बेटियांबेटियां जो कभी जन्मीं ही नहींवे मृत्यु के दुख से मुक्त रहींजन्म लिया जिन्होंने इस नश्वर संसार मेंउन्हें गुजरना पड़ा इस मरणांतक प्रक्रिया सेअस्तित्व में आने से लेकर…

कवि और कविता पर आज बाजारवाद हावी, इसलिए मंच में हुआ बदलाव

एक वक्त था जब कवि और कविताओं की अपनी एक अलग रौनक थी. लेकिन बाजारवाद के चकाचौंध में उस रौनक की रोशनी गुम सी गयी है. कभी कवि की एक पंक्ति से एक जमाने का हाल बयां होता था. लेकिन आज पूरी कविता किसी माजरे के लिए फीकी पड़ती दिखती है. आखिर ऐसा…

शरद कोकास की कविता – रोहित वेमुला का आखिरी खत

रोहित वेमुला ने अपनी आत्महत्या से पूर्व जो ख़त लिखा था उसे पढ़ने के बाद जो तकलीफ़ मुझे हुई उसने इस कविता को जन्म दिया- शरद कोकास रोहित वेमुला का आखिरी खत“जब आप यह ख़त पढ़ रहे होंगेमैं इस दुनिया में नहीं होऊंगा”…

सीमा मिश्रा की कविता – एक अजन्मी  बेटी का डर

एक अजन्मी  बेटी का डरहे मां डर लगता है मुझे,तुम्हारी उस दुनिया में आने सेमैंने सुना है तुम्हारी उस दुनिया मेंहैं, कुछ हिंसक दानव रूपी मानवपहले तो मैं थी बेताबलेकिन अब डर लगता है बाहर आने सेहे मां कैसे…

अजमल खां की कविता – लिख दो कि एक भारतीय हूं मैं

(फिलिस्तीन के महमूद दरवेश, कश्मीर के आगा साहिद अली और असम के मिया कवियों की कड़ी में)लिख दो कि एक भारतीय हूं मैंलिख दोकि एक भारतीय हूं मैंउसके नीचे लिखोकि मेरा नाम अजमल हैएक मुसलमान हूं मैंऔर भारतीय…

वर्तमान पर टिप्पणी करती शिरोमणि महतो की कविता – जो मारे जाते हैं

जो मारे जाते हैंवे एक हांक मेंदौड़े आते सरपट गौओं की तरहवे बलि-वेदी पर गर्दन डालकरमुंह से उफ्फ भी नहीं करतेबिलकुल भेड़ों की तरहवे मंदिर और मस्जिद मेंगुरुद्वारे और गिरिजाघर मेंकोई फर्क नहीं…

इमारतों में मजदूरी करने वाले ईरानी कवि साबिर हका की कविताएं

ईरानी मजदूर साबिर हका की कविताएं तडि़त-प्रहार की तरह हैं. साबिर का जन्म 1986 में ईरान के करमानशाह में हुआ. अब वह तेहरान में रहते हैं और इमारतों में निर्माण-कार्य के दौरान मज़दूरी करते हैं. साबिर हका के दो कविता-संग्रह प्रकाशित हैं और ईरान…

अष्टभुजा शुक्ल की एक कविता जो आज़ भी प्रासंगिक है – गणित का एक सवाल

गणित का एक सवाल किसी धर्मस्थल केविवाद मेंतीन हजार लोग बम सेदो हजार गोली सेएक हजार चाकू सेऔर पांच सौजलाकर मार डाले जाते हैंचार सौ महिलाओं कीइज़्ज़त लूटी जाती हैऔर तीन सौ शिशुओं कोबलि का बकरा बनाया जाता…