Opinion

आध्यात्मिक पुनर्जागरण के प्रणेता स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरी

10 मई—स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि का आविर्भाव दिवस

स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि भारत के एक अद्वितीय महात्मा और सुप्रसिद्ध आध्यात्मिक पुस्तक, योगी कथामृत के लेखक, श्री श्री परमहंस योगानन्द, के गुरू थे। स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी का जन्म 10 मई, 1855 को हुआ था और उनका पारिवारिक नाम प्रियनाथ कड़ार था। वे बंगाल के निवासी थे। उन्होंने निर्विवाद रूप से एक अत्यंत महान् आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त कर ली थी। उनकी पुस्तक, कैवल्य दर्शनम्, एक कालातीत उत्कृष्ट कृति है। उन्होंने अपने परमगुरु, महावतार बाबाजी, के आदेशानुसार यह पुस्तक लिखी थी, तथा इस पुस्तक में संक्षिप्त एवं सरल ढंग से गहन आध्यात्मिक सत्यों को प्रतिपादित किया गया है, जिसे सभी व्यक्ति सरलतापूर्वक समझ सकते हैं।

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स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी ने अपने प्रमुख शिष्य, योगानन्दजी, को कठोर एवं श्रमसाध्य प्रशिक्षण प्रदान किया, जो प्रत्येक दृष्टि से पूर्ण प्रशिक्षण था। इस प्रकार स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी ने योगानन्दजी को इस योग्य बना दिया था कि उन्होंने क्रियायोग विज्ञान को भारत एवं सम्पूर्ण विश्व के लोगों तक पहुँचाने के कार्य में अपरिमेय ऊँचाइयों को स्पर्श किया। श्रीयुक्तेश्वरजी ने कहा, “क्रियायोग एक ऐसा साधन है, जिसके माध्यम से मनुष्य के विकास की गति को तीव्र किया जा सकता है।” क्रियायोग विज्ञान शरीर, मन और आत्मा की पवित्रता को प्राप्त करने के लिए उपयुक्त है और इसके माध्यम से एक दृढ़संकल्प साधक अन्ततः ईश्वर के साथ एकत्व को प्राप्त कर सकता है।

स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी की प्रेरणा से योगानन्दजी ने पाश्चात्य जगत् में क्रियायोग का प्रतिपादन किया। स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी ने उन्हें परामर्श दिया कि वे क्रियायोग विज्ञान का निष्ठापूर्वक प्रचार करने के लिए सेल्फ़-रियलाइज़ेशन फ़ेलोशिप और योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया की स्थापना करें। योग के विषय में मानव जाति को शिक्षा प्रदान करने की दिशा में योगानन्दजी के आरम्भिक कदमों और अन्ततः एक असाधारण आध्यात्मिक व्यक्तित्व—जिनका गौरव समस्त महाद्वीपों की सीमाओं को लाँघ गया—के रूप में उनकी महान् सफलता का श्रेय मुख्य रूप से श्रीयुक्तेश्वरजी के मार्गदर्शन को ही जाता है।

स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी की अपने परमप्रिय शिष्य, योगानन्दजी, के साथ प्रथम भेंट स्वयं में अत्यंत नाटकीय एवं प्रेरणादायक थी। वाराणसी की एक संकरी गली में, योगानन्दजी ने देखा कि वे एक लम्बे कद वाले प्रभावशाली व्यक्तित्व की ओर एक चुंबकीय आकर्षण का अनुभव कर रहे हैं और उन्होंने, जो उस समय मात्र एक किशोर युवक ही थे, उन सन्त महाशय के रूप में पिछले कई जन्मों के अपने गुरू को पहचान लिया। तथा महान् गुरू के (योगी कथामृत से उद्धृत) प्रथम शब्द थे, “ओ मेरे प्रिय, तुम मेरे पास आ गए!” सभी पाठकों के लिए ये शब्द गुरू-शिष्य सम्बंध के कालातीत आकर्षण का चित्रण करते हैं।

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महान् गुरू की सावधानीपूर्ण देखरेख में व्यतीत किए हुए उनके प्रारंभिक वर्षों में योगानन्दजी ने अपने व्यक्तित्व का विकास इस प्रकार से किया, जिसने उन्हें इस संसार और उसके परे जगत् में भी महानता प्रदान की। यथार्थ में स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी की विरासत की महानता योगानन्दजी का एक सर्वोच्च आध्यात्मिक व्यक्तित्व के रूप में निर्माण करने में निहित है।

जो व्यक्ति उद्यम के विभिन्न क्षेत्रों में श्रेष्ठता की खोज करते हैं और स्वयं भी श्रेष्ठ कार्य करने का प्रयास करते हैं, वे प्रायः सादगी की शक्ति का उचित मूल्याँकन नहीं कर पाते हैं, किन्तु भारत के सन्त उत्कृष्टता के गुणों को पहचानते थे और स्वयं अपने जीवन में भी अत्यंत सादगीपूर्ण ढंगों से उन गुणों का उदाहरण प्रस्तुत करते थे। स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी का जीवन एक अत्यंत सम्मानित जीवन था। उनकी पुस्तक, कैवल्य दर्शनम्, एक पथप्रवर्तक एवं गौरवमय ग्रन्थ है, जिसकी युगों-युगों तक सराहना की जाएगी। तथापि, व्यापक और वैविध्यपूर्ण कार्यों के स्थान पर, स्वामी श्रीयुक्तेश्वरजी का जीवन और समय मुख्यतः अपने शिष्यों का बुनियादी स्तर पर एवं कुशलतापूर्वक अध्यापन करने में ही व्यतीत होता था।

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उन्होंने योगानन्दजी को अत्यंत बुद्धिमानीपूर्वक अपना प्रशिक्षण प्रदान किया जिसके परिणामस्वरूप वे भारत की महान् एवं गहन शिक्षाओं के पथप्रदर्शक बने, और योगानन्द जी ने अत्यंत कुशलतापूर्वक पाश्चात्य जगत् और सम्पूर्ण विश्व के समक्ष इन अद्वितीय सत्यों की प्रतीयमान बाह्य जटिलताओं के पीछे छिपी सादगी को प्रकट किया।

भारत के एक महानतम् आध्यात्मिक दूत के मित्र, दार्शनिक, और मार्गदर्शक के रूप में स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि ने एक आध्यात्मिक पुनर्जागरण का मार्ग प्रशस्त किया, जो अभी भी सम्पूर्ण विश्व के सत्यान्वेषी पुरुषों और महिलाओं के हृदय, मन, और आत्मा को उत्तरोत्तर आवृत कर रहा है। अधिक जानकारी: http://yssofindia.org

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