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जरूरतमंद बच्चों को शिक्षित कर सुषमा बस्तियों को कर रही रोशन

अब तक 450 बच्चों में जगा चुकी शिक्षा का अलख

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Ranchi: कहते हैं एक पुरुष शिक्षित होता है, तो बस एक शख्स शिक्षित होता है. लेकिन महिला शिक्षित होती है तो एक परिवार शिक्षित होता है. और शिक्षित महिलाएं, समाज का स्वरूप किसी न किसी तरह जरूर बदलने की कोशिश करती है. ऐसी ही कोशिश एदलहातु मोरहाबादी की रहने वाली सुषमा केरकेट्टा कर रही है.

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सुषमा पिछले आठ साल से इलाके में शिक्षा का अलख जगा रही है. सुषमा 2011 से संत गैब्रिएल एंड मोनिका नाम की स्कूल चला रही है. जिसकी नींव इन्होंने जरूरतमंदों को शिक्षित करने के लिये रखी थी. ये ऐसा समय था, जब क्षेत्र में लोग शिक्षा के प्रति जागरूक नहीं थे. और कुछ थे भी तो आर्थिक तंगी के कारण माता-पिता बच्चों को स्कूल नहीं भेजते थे.

सुषमा ने इलाके में स्कूल तो खोल लिया, लेकिन बच्चे स्कूल आ ही नहीं रहे थे. ऐसे में वो खुद आस-पास की बस्तियों में जाकर अभिभावकों को समझाती और बच्चों को स्कूल लेकर आती. सुषमा खुद बतातीं है कि बच्चों को घर से लाने-जाने पर भी माता-पिता बच्चों को स्कूल भेजना नहीं चाहते थे, क्योंकि अभिभावक स्कूलों के फीस आदि देने की स्थिति में नहीं थे.

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18 बच्चों से की थी शुरूआत

बच्चों में शिक्षा का अलख जगा रही सुषमा ने बताया कि जब 2011 में इन्होंने स्कूल खोला, उस वक्त स्कूल में मात्र 18 बच्चे थे. एक साल में ही इनके स्कूल में जरूरतमंद बच्चों की संख्या बढ़कर 58 हो गयी. वर्तमान में इनके स्कूल में सिर्फ जरूरतमंद बच्चे ही नहीं, बल्कि संपन्न परिवारों के बच्चे भी पढ़ने आ रहे है. जिनसे ये स्कूली खर्च और शिक्षकों को देने के लिये फीस लेती है.

सरकारी नौकरी छोड़ चला रहीं स्कूल

सुषमा 1986 में संत जेवियर कॉलेज में गेस्ट फैकल्टी के रूप में हिन्दी विभाग से जुड़ी. इसी साल इनकी नौकरी सिक्किम स्थित साउथ सिक्किम नामची पब्लिक स्कूल में पीजीटी शिक्षिका के रूप में हिंदी विषय के लिए तय हुई . वहां पढ़ाते हुए इन्हें लगा कि जब यहां पढ़ने वाले बच्चों से इतना स्नेह मिल रहा तो, अपने राज्य में क्यों न बच्चों को शिक्षित किया जाए. इसी के साथ स्कूल में पढ़ाने के दौरान रांची में स्कूल की नींव रखी. अपने वेतन से ही इन्होंने स्कूल की सारी जरूरतों की पूर्ति की. और जब इन्हें लगा कि स्कूल बच्चों के लिये तैयार है तो ये नौकरी छोड़कर रांची आ गयी.

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450 बच्चों को पढ़ा चुकी है निशुल्क

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इन्होंने बताया कि 2010 से अब तक 450 जरूरतमंद बच्चों को ये निःशुल्क पढ़ा चुकी है. सिर्फ स्कूली शिक्षा ही नहीं, सुषमा इन बच्चों को स्वच्छता के प्रति भी जागरूक करती है. इन्होंने बताया कि शुरू के दिनों में बस्ती के बच्चों को देखकर थोड़ा मन संकुचित हो जाता था. लेकिन इच्छा थी कि इन बच्चों को शिक्षित कर ही लूंगी.

ऐसे में सबसे पहले ऐसे बच्चों को इन्होंने स्वच्छता का पाठ पढ़ाया और फिर इन्हें अक्षर ज्ञान दिया. इनके स्कूल में न सिर्फ किताबी ज्ञान और स्वच्छता बल्कि समय-समय पर अन्य गतिविधियां जिसमें पौधरोपण, वाद-विवाद आदि कराया जाता है.

अभिभावकों को भी सिखाती है लिखना-पढ़ना

कई अभिभावक इनके पास बच्चों की शिकायत लेकर आते है. जिन्हें अक्षर ज्ञान नहीं होता. इन्होंने बताया कि ऐसे अभिभावकों के बोलने आदि तरीकों से इन्हें अभिभावकों के निरक्षर होने का पता लगता है. ऐसे में इन अभिभावकों को स्कूल में ही उनका नाम, पता आदि लिखना सिखाया जाता है. वहीं बच्चों को भी यह कहा जाता है कि माता-पिता को नाम आदि लिखने का अभ्यास करायें. इस काम में भी उन्हें काफी खुशी मिलती है.

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प्रौढ़ शिक्षा केंद्र खोलने की है चाह

सुषमा ने बताया कि आनेवाले समय में जल्द से जल्द जरूरतमंद अभिभावकों के लिये प्रौढ़ शिक्षा केंद्र खोलने की कोशिश की जा रही है. जिसमें ऐसे अभिभावकों को पढ़ाया जायेगा, जो किसी-न-किसी परिस्थितियों में आकर पढ़-लिख नहीं पायें.

शिक्षा के क्षेत्र से है परिवार

समाज को शिक्षित कर रही सुषमा ने बताया कि इनके जीवन के आदर्श उनके माता-पिता है. उनके पिता कैथोलिक प्रेस में काम करते हुए नौ बच्चों का लालन-पालन किया और सबको उच्च शिक्षा भी दी. सुषमा ने कहा कि विपरित परिस्थितयों में पिता ने नौ भाई-बहनों को पढ़ाया. वर्तमान में इनकी आठ बहनें और एक भाई स्कूल कॉलेजों में शिक्षा का प्रचार कर रहे है. इनका मानना है कि माता-पिता ने अपने बच्चों को पढ़ाया अब उनके नौ बच्चे नौ लाख बच्चों को पढ़ायें ऐसी इच्छा है.

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