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सुप्रीम कोर्ट का फैसला, प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होना गुनाह नहीं, माओवादी  को जमानत मिली

NewDelhi : सुप्रीम कोर्ट के अनुसार किसी प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होना गुनाह नहीं. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने माओवादी समर्थक कोन्नाथा मुरलीधरन को जमानत देने के आदेश के खिलाफ दायर  महाराष्ट्र सरकार की याचिका खारिज कर दी. जान लें कि पहले जमानत देते हुए बंबई  हाईकोर्ट ने कहा था कि प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होने से भर से कोई आतंकी नहीं बन जाता.

यह तभी हो सकता है जब उसने संगठन से जुड़कर कोई आतंकी घटना को अंजाम दिया हो या हिंसा फैलाई हो या हिंसा फैलाने के लिए उकसाने का काम किया हो. खबरों के अनुसार जस्टिस अरुण मिश्रा और एमआर शाह की पीठ ने महाराष्ट्र सरकार की  याचिका खारिज करते हुए आदेश में कहा कि बंबई हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने का उन्हें कोई कारण नजर नहीं आता.

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 मुरलीधरन को एटीएस ने 2015 में गिरफ्तार किया था

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मुरलीधरन को एटीएस ने 2015 में गिरफ्तार किया था. उस पर सीपीएम (माओवादी) संगठन का सदस्य होने का आरोप था.  यह संगठन गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम एक्ट (यूएपीए) के तहत प्रतिबंधित है.

मुरलीधरन के पास  से माओवादी साहित्य, माओवादी, मार्क्सवादी-लेनिनवादी और नक्सलबाड़ी संगठनों के विलय करने संबंधी घोषणा की कॉपी, फर्जी पैन कार्ड जो थामस जोसेफ के नाम से बना था, कुछ सिम कार्ड और मोबाइल फोन बरामद किये  गये थे.

एटीएस ने मुरलीधरन  के खिलाफ यूएपीए कानून की धारा 10, 20, 38 और 39(प्रतिबंधित संगठन का सदस्य होने, आतंकी संगठन को समर्थन देने) के तहत चार्जशीट दायर की थी.  हाईकोर्ट ने आदेश में कहा था कि यूएपीए की पकड़ी गयी सामग्री से कानून की धारा 20 संपुष्ट नहीं होती.

इसके अनुसार ऐसे व्यक्ति को उम्रकैद की सजा दी जायेगी जो ऐसे आतंकी गैंग का सदस्य होगा जो आतंकी गतिविधि में लिप्त होगा.   कोर्ट ने कहा कि वह चार साल से जेल में है, इसलिए उन्हें जमानत दी जाती है.

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