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SUNDAY SPECIAL : शहर में पति-पत्नी के बीच के रिश्तों में तेजी से आ रही कड़वाहट, मनोचिकित्सक डॉ. संजय अग्रवाल से जानिए क्या है वजह

टॉक्सिक रिलेशन में रहने से अच्छा है क्विट कर जाना, हमेशा याद रखें कोई भी सेटबैक, डिजास्टर नहीं होता

Sanjay Prasad

Jamshedpur : पत्नी से विवाद के बाद बहुमंजिली इमारत से कूद कर खुदकुशी करने के एक मामले ने जमशेदपुर को हिला कर रख दिया. पति-पत्नी के साथ अन्य रिश्तों की खून ने सोचने पर मजबूर कर दिया है. शहर के मशहूर मनोचिकित्सक डॉ.संजय अग्रवाल कहते हैं-इसकी सबसे बड़ी वजह तथाकथित आधुनिकता है, जिसमें हमारे वैल्यू सिस्टम खत्म हो रहे हैं. हम अधिकार को लेकर संजीदा तो हुए हैं लेकिन कर्तव्य भूल गये हैं. यही कारण है कि रिश्ते मधुर होने की बजाय जहरीले होते जा रहे हैं. इसका सबसे ज्यादा असर पति-पत्नी के संबंधों पर दिख रहा हैं. दुख यह है कि इसका खामियाजा बच्चे भुगत रहे हैं.

शराब और ड्रग्स रिश्तों को बर्बाद कर रहे हैं

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बकौल डॉ.अग्रवाल, शराब और ड्रग्स ऐसे रिश्तों में आग में घी का काम कर रहे हैं. हम अपनी पहचान कार, बंगला और सुख सुविधाओं में खोजने लगे हैं. पैसे के पीछे भागने लगे हैं. पैसा पाने के लिए अगर गलत भी करना पड़ता है तो हम गूरेज नहीं करते. यही गलत कदम बाद में हमारे तनाव की वजह बनता है. इससे रिश्तों में भी खटास आने लगती है और एक दिन जिंदगी नरक-सी लगने लगती है. हमारी महत्वकांक्षाएं इस कदर बढ़ गई हैं कि हम पारिवारिक मूल्य की बजाय पैसे और करिअर के पीछे भागने लगे हैं. फिर हम ऐसे जाल में फंसते जाते हैं जहां पति-पत्नी एक दूसरे पर भरोसा नहीं करते. जब बच्चे अपने पैरेन्ट्स के बीच मारपीट और रोज-रोज के झगड़े देखते हैं तो वह प्यार की तलाश में बाहर जाते हैं और फिर वे गलत संगति में पड़कर अपनी जिंदगी भी नरक बना डालते हैं.

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टॉक्सिक रिलेशन को बचाने के चक्कर में बर्बाद हो रहे बच्चे

डॉ.संजय अग्रवाल कहते हैं-मुझे लगता है कि जिस संबंध में एक-दूसरे पर भरोसा खत्म हो जाय और रोज-रोज मारपीट और झगड़ा हो, तो ऐसे टॉक्सिक रिलेशन से क्विट कर जाना समझदारी होती है. लड़कियों को शुरू में थोड़ी दिक्कत तो जरूर होती है लेकिन बाद में सबकुछ ठीक हो जाता है. इससे बच्चे बर्दाद होने से बच जाते हैं. अमूमन लोग अपने टॉक्सिक रिलेशन को बचाने के चक्कर में अपने बच्चों के भविष्य को बर्बाद कर देते हैं. दुनिया भर में हुए सर्वे में यह तथ्य सामने आया है कि जिन बच्चों के पैरेन्ट्स के रिश्ते अच्छे नहीं होते, उनके बच्चे दब्बू, इनसेक्योर और कॉन्फ्लिक्ट पर्सनालिटी के होते हैं.

समाज में यह स्टिग्मा है कि अपनी समस्या को दूसरे के संग शेयर मत करो

डॉ.संजय अग्रवाल कहते हैं कि अभी भी समाज में यह स्टिग्मा है कि हम अपनी समस्या को शेयर नहीं करते. कई बार लड़की अपने माता-पिता से भी अपनी समस्याएं शेयर नहीं करती और अंदर ही अंदर घुटती रहती है. इसका रैमिफिकेशन काफी खतरनाक होता है. कई बार लड़कियां ऐसा कदम उठा डालती है जो परिवार के लिए परेशानी वाला होता है. मैं तो यही कहूंगा कि अगर कोई समस्या है तो हमेशा उस पर बात करना चाहिए. पहले आपस में कोशिश करनी चाहिए कि संवाद के जरिए समस्या खत्म हो. अगर उस स्तर पर नहीं होता है तो अपने पैरेन्ट्स के साथ बैठ कर इस पर बात करनी चाहिए. अगर समस्या आउट ऑफ कन्ट्रोल हो और लगता है कि इसमें बातचीत कारगर नहीं है तो ऐसे टॉक्सिक रिलेशन में रहने की बजाय क्विट कर जाना बेहतर है. एक बात जिंदगी में हमेशा याद रखे. कोई भी समस्या परमानेंट नहीं होती. हम सेटबैक को डिजास्टर मान बैठते हैं, जबकि यह टेम्पोरेरी होता है.

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