Opinion

विपक्षी दलों की हार के बढ़ते मर्ज के बीच गुम हो रहा है और नयी राह तलाशने का संघर्ष

Faisal Anurag

आम चुनावों की करारी हार से हताश प्रमुख विपक्षी दलों का मर्ज गहराता ही जा रहा है. ये सब संकट की कसौटी पर नेतृत्व के खरा नहीं उतरने और फ्रंट से पीछे हटने के मर्ज के लक्षण हैं. जिसका असर उन सवालों को भी प्रभावित कर रहा है जिससे प्रभावित हो कर वोटरों ने 2019 में भी उन्हें अपनी पहली पसंद बनाया. विपक्ष के लिए यह हालात इतिहास का अभूतपूर्व संकट है. 1973 के पहले भी विपक्ष की ताकत कभी बहुत बड़ी नहीं हो सकी थी.

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लेकिन 1967 में 9 राज्यों में यदि वे कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने में कामयाब हुए थे तो वह रणनीतिक कौशल ही था. जिसने कांग्रेस के मिथ और नरेटिव दोनों को चुनौती दी थी. विपक्ष केंद्र में चुनौती नहीं दे पाया लेकिन इस नरेटिव में अपनी महत्ता को तो स्थापित कर ही दिया. 1977 में कांग्रेस का सत्ता से बेदखल होना एक बड़ा घटना थी. उसके बाद की राजनीति में 2014 तक विपक्ष एक ताकत के रूप में बना रहा. 2014 में पहली बार विपक्ष नरेटिव नहीं बना पाया और 2019 में तो उसे बेहद गंभीर हालात का सामना करना पडा.

ऐसे हालात को पलटने की चुनौती और सत्ता के मिथकों को नष्ट करने के साथ एक ऐसी अवधारणा भी बनाने की जरूरत है जो उनमादित होती भीड़ के बीच राजनीतिक विमर्श को खड़ा करे. जो मिथक आज खड़े किये जा रहे हैं, वे तथ्य पर कम और भावनाओं व प्रोपगैंडा पर ज्यादा आधारित हैं. यह प्रोपगैंडा तब और प्रभावी हो जाता है जब उसके शिकार स्वयं इसे चुनौती देने वाले ही हो जाते हैं.

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राजनीति की इतिहासविहीनता का यह दौर बताता है कि संघर्ष की विरासतों से सबक इस नेतृत्व ने नहीं लिया है. प्रोपगैंडा मशीनरी का मुकाबला करना आसान तो नहीं है लेकिन असंभव भी नहीं है. यह असंभव क्यों नहीं है इसकी गहरी समझ ही कारगर राजनीतिक प्रतिरोध का आधारतत्व है.

हताशा ने राजनीतिक दलों के कैडरों को ज्यादा मायूस इन नेताओं के पीछे हटने ने भी किया है. अवसरवादी तो सुरक्षित शरण की तलाश कर रहे हैं. विचारों के प्रति उनकी अब तक की प्रतिबद्धता का नकाब भी तेजी से उतर गया है. यह संकट सांस्कृति राष्ट्रवाद के एकाधिकारवादी मानसिकता की गिरफ्त में आते जाने का ही संकेत है.

भारत में आये मनोवैज्ञानिक बदलाव के प्रति उदासीता बताती है कि नया नरेटिव बनाने की क्षमता विपक्षी दलों के थिेकटैंक भी खोते जा रहे हैं. तय है कि पूर्व की कार्यशैली, व्यवहार और रणनीति वर्तमान का मुकाबला नहीं कर सकती. लोकतांत्रिक स्पेस का लगातार सिकुड़न बेहद चिंताजनक है. जर्मनी या इटली का उदाहरण दे कर इन नये तत्वों का ईजाद करने वाली राजनीतिक शैली का जवाब नहीं दिया जा सकता है.

.रास्ता तो नेतृत्व को ही तलाशना होगा. कि वह किस तरह संकट की गहराई और अनैहातिहासिकता से किस तरह टकराने का हौसला और वैचारिकता दिखाता है. और आमजन के बीच कैसे राह बनाता है. यह आसान तो बिल्कुल नहीं है लेकिन असंभव भी नहीं है. उस दौर में भी तब मजहबी नफरत राजनीति के केंद्र में है और यही सबसे बड़ी ताकत सत्ता के लिए है. इसका केवल सरकार की विफलताओं ओर आर्थिक क्षेत्र के संकटों से मुकाबला नहीं किया जा सकता है. गांधी से सीखा जा सकता है कि वे इस दौर में सद्भाव की पटरी किस तरह बड़ा बनाते थे और अपनी अहिंसा को भी नया तेवर देते थे.

इसी तरह कांग्रेस को नेहरू के विचार भी ताकत दे सकते हैं लेकिन वह तो नेहरू पर हुए हमलों का जबाव भी दे नहीं पा रही है. यह काम वे कर रहे हैं जो  नेहरूवादी नहीं है लेकिन लोकतंत्र और भारत के उस इतिहास में भरोसा रखते हैं. जो सब के साथ सहिष्णुता के साथ चलने की विरासत रखता है.

अन्य क्षेत्रीय दल तो और भी घबराहट और हताशा में हैं. समाजवादी पार्टी फ्रंट से मुकाबला करती नजर नहीं आती है और वह चुनौतियों के बरखिलाफ खड़ी भी नहीं हो पा रही है. बहुजन समाजवादी पार्टी तो अंबेडकर और कांशीराम का रासता छोड़ कर सरेंडर की मुद्रा में है और विपक्ष को ही कमजोर बना रही है. यही हालत राजद की भी है. झामुमो का संकट तो और भी गहरा है, जो आदिवासियों के कोर सवालों से किनारा करता दिख रहा है. इन दलों को गहरे आत्मविश्लेषण की जरूरत है.

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