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चुनाव दर चुनाव मतदाता के जनादेश की धज्जियां उड़ाना लोकतंत्र के लिए खतरा है

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Faisal Anurag

लोकतंत्र के इतिहास में भारत के राजनीतिक नेताओं और कई बार पार्टियों ने जनादेश और पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को जिस तरह माखौल बनाया है, वैसा दुनिया में कम ही देखने को मिलता है. चुनाव दर चुनाव मतदाता के जनादेश की धज्जियां उड़ती रहती हैं.

राजनीतिक अविश्वसनीयता के गहराते जाने का नतीजा आंदोलनों में दिखता है, जहां राजनीतिक दलों को नकारने की प्रवृति बढती जा रही है. देश में जिस तरह के आंदोलन दिख रहे हैं, उससे जाहिर होता है कि भारत की राजनीतिक साख के बड़े संकट के दौर में है.

देखा जा रहा है कि राजनीतिक अंधभक्ति का यह दौर आमजनों के लिए अवसाद का विषय बन गया है.

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अमरीकी सिनेटरों के समक्ष अपनी बात को रखते मैकार्थी.

नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी के विरोध में तेजी से आंदोलन का विस्तार हो रहा है. इस आंदोलन का कोई संगठित रूप नहीं दिख रहा है. लेकिन भागीदारी का लगातार विस्तार बताता है कि लोग राजनीतिक समूहों पर भरोसा खो रहे हैं.

जिस तरह सत्ता का केंद्रीकरण बढ़ा है, उसने राजनीतिक विमर्श में असहमति की जगह को कम कर दिया है. प्रत्येक असमहत स्वर को देशविरोधी बताना भले ही किसी खास समूह को सुकून देता हो, लेकिन इसका दूरगामी असर नकारात्मक ही होता है.

दूसरे विश्वयुद्ध के आसपास मैकार्थीवाद को अमरीका ने विरोध को कुचलने का आधार बनाया था. मैकार्थी नामक एक सिनेटर ने तब सत्ताविरोध को अमरीका का विरोध बता दिया था. और विरोधियों को राज्यदमन का शिकार बना दिया था.

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रवींद्र नाथ टैगोर के साथ आईस्टाइन. 1930 मे ली गयी दुर्लभ तस्वीर.

मशहूर वैज्ञानिक आईस्टाइन को भी तब अमरीका की नागरिकता का त्याग करना पड़ा. उन्हें  स्वीटजरलैंड जना पड़ा था. उन पर गरीबों का पक्ष लेने का आरोप था. तब अमरीका ने सोवियत रूस को दुश्मन घोषित कर रखा था और अमरीका में लोकतंत्र और समानता की चर्चा करने वाले इस मैकार्थीवाद के शिकार थे.

भरत में भी यह नजारा देखा जा सकता है. भारत का लोकतंत्र दुनिया में केवल आबादी और चुनाव या सत्ता परिर्वतन की निरंतरता के कारण ही आदर से नहीं देखा जाता, बल्कि संविधान के मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता भी उसका एक बड़ा कारण रहा है.

भारत इस समय एक बड़े राजनीतिक साख के संकट से गुजर रहा है. खास कर उसकी राजनीतिक विरासत और संवैधानिक संस्थाओं का क्षरण बड़ी चिंता का कारण है. भारत का यह दौर बिल्कुल नायाब है.

लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं की बड़ी भूमिका होती है. लेकिन जिस तरह के सवाल संवैधानिक संस्थाओं को ले कर उठ खडे हुए हैं, उन्हें खारजि नहीं किया जा सकता है.

बड़ा सवाल तो राजनीतिक दलों ने ही खड़ा कर दिया है, जहां आंतरिक लोकतंत्र लगभग नदारद है. राष्ट्रीय कहे जाने वाले दलों के साथ क्षेत्रीय दल भी इसी घेरे में हैं. इससे भी बड़ा सवाल दलबदल की प्रवृति को बढ़ावा ने पैदा किया है.

भारत में जिस तरह दलबदल कानून की धाज्ज्यिां उड़ी हैं, वह लोकतंत्र में व्यक्तिवाद के वर्चस्व का ही इशारा है.

वोट का सौदा करने की प्रवृति का एक नया तरीका इजाद किया जा रहा है. प्रतिनिधियों का बड़ी संख्या में इस्तीफा कराना. इस प्रहिक्रया में जिस तरह धनबल ओर सत्ताबल का इस्तेमाल किया जाता है,  वह एक अंधकारमय भविष्य का ही संकेत है.

आखिर क्या कारण है कि राजनीतिक दल या नेता पांच साल के वायदे और कार्यक्रम-विचार का समझौता कर लेते हैं. और कई बार वोटरों का भी समर्थन इस प्रक्रिया में हासिल कर लेते हैं. दलबदल को रोकने के लिए जो कानून लाया गया था, उसकी मंशा थी कि पांच सालों तक प्रतिनिधि दलबदल नहीं करें.

लेकिन देखा गया है कि इस कानून का जिस तरह से दुरुपयोग किया गया है, उसने उसकी प्रासंगिता को ही संदेह में ला दिया है. दलबदल भारत के लोकतंत्र के लिए एक बड़ी बीमारी रही है. दलबदल रोकने वाले कानून के बावजूद यह बीमारी संक्रामक बनी हुइ्र है.

बिहार ने तो जनादेश पलट देने का जो उदाहरण दिया, उसका असर अब भारत के दूसरे हिस्सें पर भी है. संसद या विधानसभा में पार्टियों या किसी गठबंधन का बहुमत इस तथ्य की गारंटी नहीं है कि वे पांच साल के लिए हैं.

कारपोरेट का नियंत्रण राजनीति पर जितना बढ़ रहा है, राजनीतिक समूहों में विचारहीनता उतनी ही बढ़ती जा रही है.

प्रतिबद्ध मतदाताओं की निराशा का असर बढ़ने का संकेत है कि वोट देने के बाद भी वोटर किसी उम्मीद में नहीं रहता है. वोटरों को यह अंदेशा बना रहता है कि उसने जिस प्रतिनिधि का चयन किया है, वह विचारों ओर वायदों पर खरा साबित होगा.

वोटर हर चुनाव में अपनी मंशा जाहिर करता है और अक्सर वह अंत में ठगा हुआ महसूस करता है.

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