Jharkhand Story

कहानियां झारखंड आंदोलन की-9 : रंग खरीदने के लिए पैसे नहीं थे, इसलिए लिक्विड जिलेटिन से बैनर लिखते थे बीरेंद्र

Praveen Munda

Ranchi : झारखंड अलग राज्य के आंदोलन के दौरान पूरे राज्य के आंदोलनकारियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था. कई लोग अपने घर-परिवार को छोड़कर अलग राज्य के लिए आंदोलन में उतरे थे. ऐसे ही लोगों में थे बीरेंद्र कुमार महतो. बीरेंद्र कुमार महतो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी झारखंड आंदोलन में सक्रिय रहे. आंदोलन के दौरान इनके जिम्मे एक महत्वपूर्ण काम था. यह काम था झारखंड आंदोलन के दौरान बैनर लिखने का. यह काम गुपचुप तरीके से करना था. बीरेंद्र कहते हैं- तब मैं लिक्विड जिलेटिन से बैनर लिखता था, क्योंकि मेरे पास रंग खरीदने के लिए पैसा नहीं होते थे. मैंने लिक्विड जिलेटिन की बारूद से ही बैनर लिखने का काम किया. यह काफी जोखिम भरा काम था.

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बीरेंद्र ने उस दौर में आंदोलनकारियों की ओर से अखबार और मीडिया के लिए प्रेस विज्ञप्तियां बनायीं. कई लेख तैयार किये. इसके साथ ही भाषण लिखे, बैनर पर आंदोलन से संबंधित नारे भी लिखे. एक और काम था, जो ज्यादा खतरनाक था. बीरेंद्र कहते हैं- झारखंड आंदोलनकारियों के लिए उन्होंने जिलेटिन एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का काम भी किया. कई अवसर पर जिलेटिन गंतव्य तक पहुंचाकर साथियों को सूचित किया करता था. उस दौर में मुझे विस्फोटक खूंटी के नीचे चौक, कर्रा रोड स्थित कलुवा और हैदर अली के आवास से, रांची के तुपुदाना, हेसाग के हीरा लाल संस एंड कंपनी और जलील शाह एंड कंपनी से मिलता था. ये लोग माइंस उद्योग के लिए विस्फोटक (बारूद) बेचने का कारोबार करते थे. इन जगहों से जिलेटिन लेकर आंदोलनकारियों तक पहुंचाया.

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बीरेंद्र कहते हैं- उस दौर में कई ऐसी घटनाएं हुई थीं, जो आज भी सहज ही याद आ जाती है. सीधी कार्रवाई, आंदोलनकारियों का 14 दिनों का उपवास, 72 घंटे का झारखंड बंद, लगातार होनेवाले धरना-प्रदर्शऩ. उस समय युवा था और साथियों के साथ जोश के साथ झारखंड आंदोलन में शामिल हुआ था. लेकिन, अब इस बात की तकलीफ होती है कि जिस अलग राज्य के लिए आंदोलनकारियों ने अपना खून-पसीना बहाया, घर-बार छोड़ा, आज उनकी हालत काफी खराब है.

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