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रुकती है ट्रेन, कटते हैं टिकट लेकिन स्टेशन है बेनाम !

रेलवे स्टेशन पर कहीं भी नहीं लिखा स्टेशन का नाम नाम को लेकर ग्रामीणों को है आपत्ति

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Lohardaga: क्या आपने किसी ऐसे रेलवे स्टेशन के बारे में सुना है, जिसका कोई नाम ही ना हो. तो चलिए, आज हम आपको एक ऐसे रेलवे स्टेशन के बारे में बताते है, जहां ट्रेन तो आती-जाती है, लेकिन इसका कोई नाम नहीं. दक्षिण-पूर्व रेलवे में आनेवाला ये स्टेशन है बड़की चापी.

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दरअसल, रांची रेल मंडल से चलकर जब आप लोहरदगा रेलवे स्टेशन पहुंचेंगे तो आपको टोरी जाने के लिए वर्तमान में एकमात्र पैसेंजर ट्रेन ‘लोहरदगा-बड़की चांपी-टोरी’ मिलेगी. अब आप कहेंगे कि सबका नाम तो है फिर ये बेनाम कैसे हुआ. तो आपको जानकर आश्चर्य होगा कि लोहरदगा रेलवे स्टेशन से 14 किलोमीटर आगे बढ़ने पर बड़की चांपी रेलवे स्टेशन है. इस स्टेशन में कहीं आपको इस स्टेशन का नाम नहीं मिलेगा. रेलवे के सरकारी दस्तावेज़ों में, टिकट पर बड़की चांपी रेलवे स्टेशन का नाम जरूर दर्ज है, लेकिन स्टेशन में कहीं आपको इसका नाम लिखा नहीं मिलेगा. तो हुआ ना ये बेनाम.

क्या है कारण

रेलवे स्टेशन का नाम तो है, लेकिन स्टेशन पर कोई बोर्ड नहीं. इसके पीछे कारण है, ग्रामीणों का विरोध. दरअसल, साल 2011 में जब लोहरदगा-टोरी रेलवे लाइन की शुरुआत हुई तो सबसे पहले बड़की चांपी तक यात्री रेलगाड़ी को चलाया गया. यह स्टेशन कमले गांव में स्थित है. विवाद की वजह भी यही है. ग्रामीणों को इस बात पर एतराज है कि जब स्टेशन कमले गांव में है तो नाम बड़की चांपी क्यों होगा. ग्रामीणों का कहना है कि रेलवे स्टेशन का नाम भी कमले होना चाहिए. बड़की चापी नाम से ग्रामीणों को एतराज है, और जब स्टेशन का नाम लिखा गया तो ग्रामीणों ने उसे मिटा दिया. साल 2011 से लेकर अब तक यह स्टेशन बिना नाम के ही है. मार्च 2017 में बड़की चांपी से टोरी तक रेल सेवा शुरू हो गई. फिर भी हालत जस के तस हैं.

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बड़की चांपी रेलवे स्टेशन के प्रबंधक प्रीतम कोयो का कहना है कि वे जब से यहां आए हैं, स्टेशन का नाम लिखा नहीं देखा. कुछ समय पहले रेलवे ने यहां नाम लिखने की कोशिश भी की थी, तब ग्रामीणों के विरोध से फिर से नाम लिखा नहीं जा सका. स्थानीय ग्रामीण सरयू लाल और रघु साहू  का कहना है कि ग्रामीणों की मांग है कि स्टेशन का नाम कमले हो. यह जब तक नहीं होगा,  तब तक स्थिति यही रहेगी. बड़ी बात यह भी है कि दुनिया का सबसे बड़ा रेलवे नेटवर्क चलाने वाला भारतीय रेलवे भी इस विवाद को आज तक सुलझा नहीं पाया है.

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