LITERATURE

महालनोबिस मॉडल’ पर खड़े किये गये थे भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर के स्टील प्लांट

आजाद भारत के विकास के मॉडल की नीव डालनेवाले पीसी महालनोबिस की जयंती पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi: जिस तरह से प्रशान्त चन्द्र महालनोबिस का नाम थोड़ा यूनिक किस्म का है उसी तरह का अनूठा उनका काम भी रहा है. बहुत सारे लोगों ने तो महालनोबिस का नाम तक भी नहीं सुना होगा. महालनोबिस प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक एवं सांख्यिकीविद थे. उन्हें भारत की दूसरी पंच-वर्षीय योजना के मसौदे को तैयार करने के लिए जाना जाता है. “महालनोबिस दूरी” उनके द्वारा सुझाया गया एक सांख्यिकीय माप है.

उन्हें देश की आज़ादी के बाद उन्हें नवगठित मंत्रिमंडल का सांख्यिकी सलाहकार बनाया गया. उन्होंने बेरोज़गारी समाप्त करने के सरकार के प्रमुख उद्देश्य को पूरा करने के लिए योजनायें बनायीं. देश में स्टील की कमी दूर करने के लिए भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर के विशाल स्टील प्लांट इन्हीं की सलाह पर लगाये गये थे.

Sanjeevani

कोलकाता में हुआ जन्म

प्रशांत चंद्र महालनोबिस का जन्म कोलकाता में 29 जून, 1893 को हुआ था. उनके दादा गुरचरण ने सन 1854 में बिक्रमपुर (अब बांग्लादेश) से कोलकाता आकर अपना व्यवसाय स्थापित किया था. उनके पिता प्रबोध चंद्र महालनोबिस ‘साधारण ब्रह्मो समाज’ के सक्रिय सदस्य थे. उनकी माता निरोदबसिनी बंगाल के एक पढ़े-लिखे कुल से सम्बन्ध रखती थीं.

प्रशांत का बचपन विद्वानों और सुधारकों के सानिध्य में गुजरा. उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा उनके दादा द्वारा स्थापित ‘ब्रह्मो ब्वायज स्कूल’ में हुई.

उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा भी यहीं से सन 1908 में पास की. इसके बाद 1912 में प्रेसीडेंसी कालेज से भौतिकी विषय में आनर्स किया.कॉलेज में जगदीश चन्द्र बोस और प्रफुल्ल चन्द्र रॉय जैसे शिक्षकों ने उन्हें पढाया. मेघनाद साहा तथा सुभाष चन्द्र बोस कॉलेज में उनके जूनियर थे .

इसे भी पढ़ें :स्कूली शिक्षक के जज्बे को सलाम, लॉकडाउन में बच्चों को पढ़ाने के लिए पेड़ पर बनाया घर

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से भौतिकी और गणित में डिग्री ली

इसके बाद लन्दन जाकर उन्होंने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया. वहां से भौतिकी और गणित दोनों विषयों से डिग्री हासिल की. कैंब्रिज में इनकी मुलाकात महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन से हुई. फिजिक्स में अपना ट्रीपोस करने के बाद उन्होंने ‘कवेंडिश प्रयोगशाला’ में टी.आर. विल्सन के साथ कार्य किया.

उसके बाद ये कुछ समय के लिए कोलकाता लौट आए जहाँ उनकी मुलाकात प्रेसीडेंसी कॉलेज के प्रिंसिपल से हुई जिन्होंने उन्हें वहां पर भौतिकी पढ़ने का आमंत्रण दिया.

कोलकाता में प्रशांत की मुलाकात निर्मला कुमारी से हुई जो हेरम्भाचंद्र मित्रा की पुत्री थीं. 27 फरवरी 1923 को दोनों ने हेरम्भाचंद्र की मर्जी के विरुद्ध विवाह कर लिया. प्रशांत के मामा सर नीलरतन सरकार ने कन्या के पिता का रस्म अदा की.

इसे भी पढ़ें :Jharkhand: कोविड वैक्सीन खत्म, 2 जुलाई को स्टॉक आने के बाद लगेगी

इस पत्रिका से मिला सांख्यिकी का ज्ञान

प्रशांत जब इंग्लैंड लौटे, तो उन्होंने वहां ‘बायोमेट्रिका’ नामक पत्रिका खरीदी. वह एक सांख्यिकी जर्नल था. उस जर्नल से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसका पूरा सेट खरीद लिया. ‘बायोमेट्रिका’ पत्रिका से प्रेरित और बैजेंद्रनाथ सिल से मार्गदर्शन मिलने पर उन्होंने सांख्यिकी में काम शुरू कर दिया.

‘बायोमेट्रिका’ पढ़ने के बाद उन्हें मानवशास्त्र और मौसमविज्ञान जैसे विषयों में सांख्यिकी की उपयोगिता का ज्ञान हुआ और उन्होंने भारत लौटते ही इस पर काम करना शुरू कर दिया. महालनोबिस ने सबसे बड़ा योगदान ‘सैंपल सर्वे’ की संकल्पना में दिया. उसी सैंपल सर्वे के आधार पर आज की नीतियां और योजनाएं बनाई जा रही हैं.

इसे भी पढ़ें :RANCHI: रातू रोड फोर लेन एलिवेटेड कॉरिडोर का रास्ता साफ, दो महीने के भीतर टेंडर

नेहरू से नजदीकी

1938 में जवाहरलाल नेहरू की अंतरिम सरकार ने उनकी ही अध्यक्षता में देश के आर्थिक विकास के लिए योजना आयोग की स्थापना की. यहीं से पंचवर्षीय योजानाओं की शुरुआत हुई. नेहरू देश के विकास के मॉडल में प्रबुद्ध लोगों को जोड़ना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने कुछ लोगों को चिन्हित किया. इनमें से एक थे महालनोबिस.

नेहरू उनसे इतने प्रभावित थे कि उन्हें योजना आयोग में ले आये. कुछ समय बाद महालनोबिस योजना आयोग के सदस्य के साथ-साथ पचास के दशक में हिंदुस्तान के सबसे अहम व्यक्तियों में से एक बन गए.

‘महालनोबिस दूरी’ सांख्यिकी माप

1920 में उनकी मुलाकात नेल्सन एन्ननडेल से हुई. नेल्सन एन्ननडेल की वजह से महालनोबिस में मानवमिति की समस्या के अध्ययन में रुचि जागी. एन्ननडेल ने उन्हें कोलकाता में एंग्लो-इंडियन के मानवमिति मापों का अध्ययन करने को कहा और इन मापों पर अध्ययन करने पर उन्होंने 1922 में सांख्यिकी से संबंधित अपना पहला शोधपत्र तैयार किया.

यही वह अध्ययन था, जिसके दौरान उन्होंने बहुचर दूरी माप का प्रयोग कर जनसंख्या के समूहीकरण और तुलना के एक तरीके का पता लगाया, जिसे ‘महालनोबिस दूरी’ सांख्यिकी माप कहा गया.

इसे भी पढ़ें :बंपर सरकारी नौकरी : साउथ इस्टर्न कोलफील्डस लिमिटेड के 408 पोस्ट के लिए करें आवेदन

भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्थापना की

महालनोबिस के कई सहयोगियों ने भी सांख्यिकी में दिलचस्पी लेनी शुरू की थी. धीरे-धीरे ये समूह बढ़ता ही गया. 17 दिसम्बर 1931 को भारतीय सांख्यिकी संस्थान की स्थापना हुई और 28 अप्रैल 1932 को औपचारिक तौर पर पंजीकरण करा लिया गया.

प्रारंभ में संस्थान प्रेसीडेंसी कॉलेज के भौतिकी विभाग से चलाया गया पर धीरे-धीरे इसके सदस्यों ने जैसे जैसे इस दिशा में काम किया वैसे-वैसे संस्थान भी बढ़ता गया.

‘संख्या’ जर्नल शुरू किया

‘बायोमेट्रिका’ के तर्ज पर सन 1933 में संस्थान के जर्नल ‘संख्या’ की स्थापना हुई.सन 1938 में संस्थान का प्रशिक्षण प्रभाग स्थापित किया गया. सन 1959 में भारतीय सांख्यिकी संस्थान को ‘राष्ट्रिय महत्त्व का संस्थान’ घोषित किया गया और इसे ‘डीम्ड विश्वविद्यालय’ का दर्जा दिया गया.

कोलकाता के अलावा भारतीय सांख्यिकी संस्थान की शाखाएं दिल्ली, बैंगलोर, हैदराबाद, पुणे, कोयंबटूर, चेन्नई, गिरिडीह सहित भारत के दस स्थानों में हैं. इसका मुख्यालय कोलकाता में है जहाँ मुख्य रूप से सांख्यिकी की पढ़ाई होती है.

इसे भी पढ़ें :श्री अग्रसेन स्कूल ने तीरंदाज दीपिका कुमारी के नाम पर रखा गया आर्चरी क्लब का नाम

सांख्यिकी में योगदान

आचार्य ब्रजेन्द्रनाथ सील के निर्देशन में प्रशांत चन्द्र महालनोबिस ने सांख्यिकी पर काम करना शुरु किया था. इस दिशा में जो सबसे पहला काम कॉलेज के परीक्षा परिणामों का विश्लेषण. इस काम में उन्हें काफी सफलता मिली. इसके बाद महालनोबिस ने कोलकाता के ऐंग्लो-इंडियंस के बारे में एकत्र किए गए आंकड़ों का विश्लेषण किया. यह विश्लेषण और इसका परिणाम भारत में सांख्यिकी का पहला शोध-पत्र कहा जा सकता है.

इसे भी पढ़ें :BIHAR : 6 साल से एक ही जिले में जमे 893 पुलिसकर्मियों का हुआ तबादला, यहां देखें लिस्ट

सैंपल सर्वे’ की संकल्पना

महालनोबिस का सबसे बड़ा योगदान उनके द्वारा शुरू किया गया ‘सैंपल सर्वे’ की संकल्पना है. इसके आधार पर आज के युग में बड़ी-बड़ी नीतियां और योजनाएं बनाई जा रही हैं. प्रोफेसर महालनोबिस दूरद्रष्टा थे.

उन्होंने सांख्यिकी का प्रयोग आम लोगों की भलाई के कार्यों के लिए किया. उन्होंने कभी भी कोई पद आधिकारिक तौर पर स्वीकार नहीं किया क्योंकि उन्हें विज्ञान में ब्यूरोक्रेसी की दखलअंदाजी पसंद नहीं थी. वे भारतीय सांख्यिकी संस्थान को सदैव एक स्वतंत्र संस्था के रूप में देखना चाहते थे.

सांख्यिकी दिवस

देश की आर्थिक योजना और सांख्यिकी विकास के क्षेत्र में प्रशांत चन्द्र महालनोबिस के उल्लेखनीय योगदान के मद्देनजर उनका जन्मदिन, 29 जून हर वर्ष भारत में ‘सांख्यिकी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है. राष्ट्रीय आय के अनुमान के लिए पीसी महालनोबिस की अध्यक्षता में ‘राष्ट्रीय आय समिति’ का गठन किया गया.

नेहरू से नजदीकी

1949 में महालनोबिस मानद सांख्यिकी सलाहकार नियुक्त किये गए. अगले साल तक, यानी 1950 तक उन्होंने नेशनल सैंपल सर्वे(एनएसएस) और केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (सीएसओ) की स्थापना की.

महालनोबिस की जीवनी लिखने वाले अशोक रूद्र का मानना है कि एनएसएस और सीएसओ की वजह से ही जितना भरोसेमंद डाटा भारत सरकार को मिलता है, विश्व में कहीं और इसकी मिसाल नहीं है. यहीं से महालनोबिस जवाहरलाल नेहरू की नज़र में आ गए. जवाहरलाल नेहरू ने आजादी के बाद दूसरी पंचवर्षीय योजना की कमान सौंपी.

इसे भी पढ़ें :खराब हो गयी है हालत, अब तो बस चलाने की अनुमति दे सरकार

दूसरी पंचवर्षीय योजना और महालनोबिस

समाजवादी सोच के महालनोबिस ने अमेरिका, चीन, रूस आदि देशों में जाकर उनके आर्थिक मॉडल समझे थे.इनमें से रूस के मॉडल ने उन्हें सबसे ज़्यादा प्रभावित किया था. 1954 में महालनोबिस ने दूसरी पंचवर्षीय योजना का ड्राफ्ट योजना आयोग को दिया.

इसमें कहा गया था कि अगर देश में त्वरित औद्योगिक तरक्की करनी है तो सरकार के सार्वजानिक उपक्रम अहम् भूमिका निभाएंगे. सरकार को भारी उद्योग, जैसे स्टील, सीमेंट आदि पर ध्यान केंद्रित करना होगा. पूंजीगत वस्तुएं (कैपिटल गुड्स) के निर्माण की भी इसमें बात की गयी जिससे त्वरित रोज़गार उत्पन्न हो. इसके लिए बांध और फैक्ट्रियों के निर्माण की योजना बनाई गई.

महालनोबिस का कहना था कि रोज़गार से उपभोक्ता वस्तुओं के इस्तेमाल को बढ़ावा मिलेगा और देश में तरक्की आएगी. उनकी इस पूरी योजना को ‘महालनोबिस मॉडल’ कहा गया. उनकी सोच के चलते पहली पंचवर्षीय योजना में जहां खनिज और उद्योग के लिए 179 करोड़ रुपये आवंटित किये गए थे, वहीं दूसरी योजना में ये बढ़कर 1075 करोड़ रुपये हो गए थे.

इसे भी पढ़ें :जदयू ने राजनीति के ‘चाणक्य’ पर साधा निशाना, कहा- हर किसी को पीएम बनाने का सपना दिखाते हैं

कई अर्थशास्त्रियों ने किया पसंद, विरोध के स्वर भी उठे थे

कई भारतीय अर्थशास्त्रियों ने ‘महालनोबिस मॉडल’ का विरोध भी किया. इनमें से एक थे बीआर शेनॉय. उन्हें ये योजना अति महत्वाकांक्षी लगी जिसमें ख़र्च ज़्यादा होने की वजह से वित्तीय घाटे और मुद्रास्फीति के बढ़ने की संभावना थी.

उनकी बात सुनी ही नहीं गई. दूसरे विरोधी थे, अमेरिकी अर्थशास्त्री मिल्टन फ्रीडमैन. उन्हें यह मॉडल बहुत गणितीय लगा जिसमें पूंजीगत उत्पादन पर ज़ोर दिया गया था, न कि मानव संसाधनों पर. फ्रीडमैन का मानना था कि भारी उद्योगों के बनिस्बत छोटे और मंझोले उद्योगों से ज़्यादा रोज़गार उत्पन्न होता है.

इसे भी पढ़ें :जानिये, कब से शुरू हो सकता है संसद का मानसून सत्र

महालनोबिस के प्लान के अलावा देश के पास एक और विकल्प था.

तब बंबई (अब मुंबई) के दो अर्थशास्त्रियों- सीएन वकील और पीआर ब्रह्मानंद ने सुझाया था कि देश के पास पूंजी कम है और मानव संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं और इनमें से ज़्यादातर बेरोजगार हैं.

उनका मानना था कि इस पूंजी को ‘वेज गुड्स’ बनाने में खपाया जाए. ‘वेज गुड्स’ यानी कपड़े, खिलौने, स्नैक्स, साइकिल और रेडियो जैसे उत्पाद जिनमें कम पूंजी लगती है और जोख़िम भी नहीं होता. लोग इन्हें बनाते और अर्जित किये गये धन से इन्हें ख़रीदते.

दोनों अर्थशास्त्रियों का मानना था कि इससे कृषि में निवेश बढ़ेगा, ग्रामीण आधारभूत ढांचा खड़ा होगा, कृषि संबंधित उद्योग और निर्यात बढ़ेगा. कुछ ऐसा ही फ़्रीडमैन ने कहा था. पर, सुनी गई सिर्फ महालनोबिस की और चली बस नेहरू की. सभी ने ‘महालनोबिस मॉडल’ पर अपनी मुहर लगाई और देश में ये लागू किया गया.

इसे भी पढ़ें :3 करोड़ रुपये गबन करनेवाले पोस्टमास्टर की जमीन व संपति होगी जब्त, सीबीआइ ने निबंधन विभाग से लिया ब्यौरा

सम्मान और पुरस्कार

महालनोबिस को 1944 में ‘वेलडन मेडल’ पुरस्कार दिया गया. 1945 में लंदन की रॉयल सोसायटी ने उन्हें अपना फेलो नियुक्त किया. उन्हें ‘इंडियन साइंस कांग्रेस’ का अध्यक्ष भी चुना गया. अमेरिका के ‘इकोनोमेट्रिक सोसायटी’ का फेलो नियुक्त किया गया. उन्हें 1952 में पाकिस्तान सांख्यिकी संस्थान का फेलो बनाया गया.

1954 में रॉयल स्टैटिस्टिकल सोसायटी का मानद फेलो नियुक्त किया गया. 1957 में उन्हें देवी प्रसाद सर्वाधिकार स्वर्ण पदक दिया गया. 1957 में ही उन्हें अंतरराष्ट्रीय सांख्यिकी संस्थान का मानद अध्यक्ष बनाया गया.भारत सरकार ने 1968 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया. 28 जून, 1972 को उनका निधन हो गया.

इसे भी पढ़ें :साथी के साथ की दरिंदगी, प्राइवेट पार्ट में एयर कंप्रेसर लगा भर दी हवा, आंतें फटी, 2 गिरफ्तार

Related Articles

Back to top button