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आदिवासि‍यों के संवैधानिक अधिकारों पर हमले के मामले यूएन में उठाने का एलान

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Ranchi: गुरुवार को रांची स्थित हरमू मैदान में आदिवासी समन्वय मंच के बैनर तले देश भर से आदिवासी संगठन जुटे और अपने संवैधानिक अधिकारों को लागू करने की आवाज बुलंद की. इस आयोजन में 10 राज्यों के आदिवासी संगठनों ने सत्ता की ‘कॉरपोरेट गुलामी’ व ‘जल जंगल जमीन’ पर हो रहे हमलों का प्रतिरोध करने का एलान किया. वक्‍ताओं ने कहा कि देश में आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों पर हो रहे हमलों के मामलों को संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा में उठाया जाएगा.


सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे कुमार चन्द्र मार्डी ने आदिवासियों पर हमलों में आई तेजी के लिए भाजपा सरकार को जिम्‍मेवार ठहराया. उन्‍होंने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि भाजपा सरकार सत्‍ता में आने के बाद आदिवासि‍यों के अधिकारों पर हमले तेजी से बढ़ रहे हैं. वहीं पूर्व की सरकार ने भी आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों को लागू करने में रूचि नहीं ली. पेसा कानून, पांचवीं अनुसूची, समता जजमेंट जैसे आदिवासी विषयों को सत्ता वर्ग दरकिनार कर रहा है. राज्य में आदिवासियों की दशा काफी दयनीय है. उन्‍होंने कहा कि झारखंड की रघुवर सरकार यहां के आदिवासियों को जमीन से बेदखल करने का काम कर रही है. देश में आदिवासि‍यों के अधिकारों पर हो रहे हमलों के लेकर मंच के प्रतिनिधि अन्तरराष्ट्रीय मंच के साथ-साथ यूएन में भी बात रखेंगे. साथ ही आदिवासियों का शोषण करने वाली रघुवर सरकार को राज्य की सत्‍ता से उखाड़ फेंकने का कार्य संगठन करेगा.

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बुलेट ट्रेन और एक्सप्रेस हाईवे के लिए आदिवासी नहीं देंगे जमीन

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वहीं महाराष्ट्र से आये आदिवासी एकता मंच के संस्थापक कालूराम काकड़या दोदड़े ने कहा आदिवासियों की एकता को तोड़ने का प्रयास सालों से भारत में किया जाता रहा था, अब यह मूर्त रूप ले रहा है. पांचवीं अनुसूची, समता जजमेंट, पेसा कानून का अगर सरकार पालन नहीं करती तो सरकार के खिलाफ आदिवासी पुन: विद्रोह करेंगे. सरकार के द्वारा विकास के नाम पर आदिवासी क्षेत्रों में विस्थापन वाली योजना को लागू नहीं होने दिया जाएगा. वहीं आदिवासि‍यों को विस्थापित करने वाली योजना बुलेट ट्रेन और एक्सप्रेस हाईवे के लिए आदिवासी जमीन नहीं देंगे.

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जल, जंगल, जमीन की रक्षा करना हमारा दायित्व 

इस मौके पर आदिवासी समन्वय मंच के संयोजक अशोक चौधरी ने कहा आदिवासियों का जीवन मिल बांटकर खाने और प्रकृति के साथ चलने पर विश्वास रखता है. लेकिन आज की व्यवस्था जो राज्यसत्ता ने खड़ी की है, उसमें प्रकृति का पूरी तरह दोहन करना है. आज बड़े पैमाने पर जल-जंगल-जमीन का नाश किया जा रहा है. ऐसे में इसे बचाने का दायित्व हम पर है. इसके लिए हम दूसरे समुदाय से भी संवाद करेंगे और समन्वय स्थापित करने का प्रयास होगा.


उन्‍होंने कहा कि पेसा कानून के तहत और समता जजमेंट से यह स्पष्ट हो गया है कि पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में खनिज संपदा पर आदिवासियों का अधिकार है. फिर भी राज्य सरकार निजी कंपनियों को प्राकृतिक संसाधनों को हस्तांतरण कर रही है. आज देश में भय और डर का माहौल बना दिया गया है. संगठन जागृत होने संगठित होने और संवाद पर विश्वास करता है. सरकार अगर हमारी बात नहीं मानती है तो लाखों आदिवासी अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए जेल जाने को तैयार होंगे.

नेपाल से आए शिवनारायण उरांव ने कहा झारखंड से करीब ढाई लाख उरांव आदिवासी नेपाल में जाकर बस गए हैं. वहां आदिवासी का दर्जा मिला हुआ है, लेकिन जमीन रक्षा संबंधित कानून आदिवासियों के लिए नहीं है. उन्‍होंने कहा कि हम आयोजन समिति से उम्मीद करते हैं नेपाल में भी सम्मेलन का आयोजन करें. साथ ही नेपाल में आदिवासियों को आरक्षण मिले इसका प्रयास हमलोग कर रहे हैं.

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