JharkhandMain SliderRanchi

बेहाल है राज्य का सबसे बड़ा अस्पताल रिम्स, अब तो आईसीयू को भी खुद ऑक्सीजन की जरूरत

Ranchi : राज्य का सबसे बड़ा अस्पताल रिम्स, जो राज्य के गरीबों के लिए एकमात्र सहारा है. छोटी से लेकर गंभीर बीमारियों तक का इलाज कम बजट में गरीब यहां करवाते हैं. जिसपर राज्य सरकार का प्रति वर्ष का बजट 350 करोड़ से भी ज्यादा है. इतने बड़े बजट के बावजूद इस अस्पताल का हाल पूरी तरह से बेहाल है.

इस अस्पताल के कई विभागों का आईसीयू को भी खुद ऑक्सीजन की जरूरत है. जांच के लिए जो टेस्ट मशीन हैं, उन्हें खुद ही पोस्टमार्टम की जरुरत है. वहीं न्यूरो विभाग में एयर कंडीशन का आलम ये कि मरीज खुद के खरीदे टेबल फैन के जरिए गरमी से निजात पा रहे हैं.

सफाई का हाल तो ऐसा है कि टॉयलेट भी शरमा जाए. रिम्स के जिस विभाग में सबसे अधिक मरीज इलाजरत हैं, वहां के आईसीयू में हमेशा दुर्गंध फैला रहता है, जो वहां एडमिट हुए मरीजों के लिए तो अब आदत जैसी बन गयी है.

इसे भी पढ़ें – भाजपा के 116 नवनिर्वाचित सांसदों का है क्रिमिनल रिकॉर्ड, 265 हैं करोड़पति

न्यूरो आईसीयू जहां अपने पंखे के जरीए मरीज पा रहे गर्मी से निजात

बेहाल है राज्य का सबसे बड़ा अस्पताल रिम्स, अब तो आईसीयू को भी खुद ऑक्सीजन की जरूरत

रिम्स में सबसे ज्यादा मरीज न्यूरो विभाग में ही आते हैं. बेड के अलावा गलियारा और रुम में बेड के नीचे भी मरीज इलाज करवाते हैं. न्यूरो विभाग के आईसीयू विभाग में मरीजों का हाल गर्मी से बेहाल है,  आईसीयू का एयर कंडीशन बन शो पीस ही है.

adv

मरीजों को अपने लिए खुद पंखा खरीदना पड़ रहा है. वहां इलाजरत लगभग सभी मरीज अपना टेबल फैन खरीदकर गर्मी से राहत पा रहे हैं. वहीं अन्य वार्डों में दस बेड वाले रुम में मात्र एक पंखे के जरीए रिम्स प्रबंधन मरीजों की गर्मी को दूर कर रहा है. रांची में पारा फिलहाल 40 डिग्री सेल्शियस के करीब चल रहा है.

19 करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी नहीं मिलती दवा

बीते वर्ष बजट होने के बावजूद मरीजों को जरूरी दवाएं हॉस्पिटल में उपलब्ध नहीं कराई जा सकीं. ऐसे में मरीजों को सभी दवाएं उपलब्ध कराने के दावे पर भरोसा नहीं किया जा सकता. हॉस्पिटल के ओपीडी दवा वितरण केंद्र में मरीजों को मुफ्त में दवाएं दी जाती हैं. लेकिन इस केंद्र पर मात्र 20 दवाएं ही मौजूद हैं. वहीं पेडियाट्रिक्स और स्किन की दवाएं तो सेंटर में मौजूद ही नहीं है, जिससे मरीजों को सारी दवाएं बाहर से लेनी पड़ती हैं.

वहीं इनडोर में इलाज कराने वाले मरीजों को भी स्लाइन और कुछ दवाएं ही मिल पाती हैं. 2017-18 वित्तीय वर्ष में मरीजों के लिए दवा पर प्रबंधन ने 19 करोड़ रुपए खर्च किए. लेकिन हड्डी के मरीजों को कैल्शियम की दवा तक नहीं मिल पाई. वहीं पारासेटामोल जैसी दवा के लिए भी प्राइवेट मेडिकल स्टोर्स की दौड़ लगानी पड़ी.

इसे भी पढ़ें – जिस महतो वोट बैंक पर था जगरनाथ को भरोसा, उसी ने किया किनारा, कांग्रेसियों का प्यार तो मिला पर वोट…

115 करोड़ की मशीनों की होनी थी खरीददारी

किसी भी हॉस्पिटल में मशीनें और इंफ्रास्ट्रक्चर के बिना मरीजों का इलाज नहीं हो सकता. इसलिए रिम्स प्रबंधन ने पिछले वित्तीय वर्ष में 115 करोड़ रुपये मशीनों की खरीददारी के लिए मिले थे. जबकि ज्यादातर समय मरीजों को जांच के लिए रिम्स प्रबंधन बाहर का रास्ता दिखा देता है. मशीनें ज्यादातर वक्त खराब ही रहती हैं.

इसपर रिम्स प्रबंधन की सफाई है कि मरीजों का लोड बढ़ जाने की वजह से मशीनें खराब हो जाती हैं. लेकिन प्रबंधन इसके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं कर पाया है.

मेडिकल के छात्रों को प्रैक्टिकल के लिए खुद से खरीदने होते हैं सामान

लोगों ने नीट की परीक्षा पास कर सरकारी मेडिकल कॉलेज में एडमिशन लिया, ताकि यहां सुविधाएं मिल सकें. लेकिन यहां पढ़ाई में प्रयुक्त होने वाले सामान की खरीदारी छात्रों से कराई जा रही है. जबकि देश के सभी सरकारी मेडिकल डेंटल कॉलेजों में सामग्रियों की खरीद सरकार खुद करती है. यहां कई गरीब और ट्राइबल स्टूडेंट भी पढ़ाई कर रहे हैं.

छात्रों ने आरोप लगाया है कि रिम्स परिसर में करोड़ों की लागत से डेंटल कॉलेज की बिल्डिंग तैयार है, लेकिन उनका प्रैक्टिकल एस्बेस्टस से बने रूम में कराया जा रहा है.

साथ ही छात्रों का कहना है कि इतनी गर्मी में दो घंटे प्रैक्टिकल करने के दौरान कई छात्र बीमार भी हो गये. समस्याएं सुनने के बाद डायरेक्टर ने आश्वासन दिया कि जल्द ही इस पर कार्रवाई की जाएगी.

प्रैक्टिकल नीचे के कमरों में कराने का निर्देश दिया गया है. हॉस्टल आवंटन के लिए कमेटी बनाई जाएगी. जहां तक सामग्रियों की खरीद का मामला है तो निदेशक ने कहा कि वे 2.50 लाख रुपए दे सकते हैं.

आयुष्मान के तहत ऑपरेशन के लिए मरीजों को है दो महीने से इंतजार

बेहाल है राज्य का सबसे बड़ा अस्पताल रिम्स, अब तो आईसीयू को भी खुद ऑक्सीजन की जरूरत

आयुष्मान भारत के तहत ईलाज के लिए आये मरीजों को ऑपरेशन के लिए दो महीने तक का इंतजार करना पड़ता है. रिम्स के न्यूरो और ऑर्थो विभाग में सबसे ज्यादा मरीजों का आयुष्मान के तहत इलाज होता है. इलाज में इंप्लांट की आवश्यकता होती है.

ये इंप्लांट आयुष्मान के जरीए ही मुहैया कराये जाते हैं. पर इसको मंगवाने में ही रिम्स प्रबंधन कोताही बरत रहा है, जिससे मरीजों को ऑपरेशन में काफी देर होती है और परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.

इसे भी पढ़ें – फेसबुक पोस्ट को लेकर गुजरात के वडोदरा में 200-300 लोगों ने दलित दंपति पर हमला किया, 11 पर एफआइआर

advt
Advertisement

Related Articles

Back to top button
%d bloggers like this: