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राज्य स्वास्थ्य व्यवस्था की कड़वी हकीकतः कहीं 23 दवाओं के भरोसे आयुष्मान भारत, कहीं 10 करोड़ की दवाएं होंगी खाक

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Ranchi: देश में स्वास्थ्य सेवाओं को एक नई दिशा देने के लिए सरकार ने आयुष्मान भारत योजना की शुरुआत की. योजना के प्रचार-प्रसार से लगा कि अब राज्य के गरीब मरीजों को बीमारी के दौरान केवल दुआ पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा बल्कि दवाएं भी मिलेगी. पैसों के अभाव में इलाज से महरुम नहीं होना पड़ेगा. लेकिन राज्य के सबसे बड़े अस्पताल में जहां प्रतिदिन करीब 2500 मरीज सिर्फ एडमिट होकर इलाज कराते हैं, उसी अस्पताल रिम्स में महज 23 दवाएं ही उपलब्ध हैं. यानी रिम्स में आयुष्मान भारत के तहत इलाज कराने वाले मरीजों के लिए करीब 75 प्रतिशत से अधिक दवाएं नहीं मिल पाती हैं.

इसी स्वास्थ्य व्यवस्था की दूसरी कड़वी हकीकत ये है कि 10 करोड़ से भी अधिक की लागत के 50 टन से भी अधिक दवाएं जला दी जाने वाली है. इसको लेकर झारखंड ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन समिति, स्वास्थ्य चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग ने रिम्स निदेशक को पत्र लिखा है. और दस करोड़ से अधिक की करीब दस टन दवाओं को जलाने का आदेश दिया है.

दवाएं हो गयी एक्सपायर

जिन दवाओं को जलाने का आदेश है, वो सभी एक्सपायर हो चुकी हैं. इन दवाओं में आयरण की गोलियां, दस करोड़ से अधिक की हर्बल मेडिसीन हैं. नरवारी मंडूर ये आयुर्वेदिक दवाएं हैं, जिंक टैबलेट, क्लौरोपेट सिरप, क्लोरोपिट सिरप, डीडी किट, गॉड बैंडेज, डिस्पोजेबल सिरिंज,एलबेंडाजोल, पैरासिटामोल, और स्लाइन की बोतलों को डिस्पोज किया जाना है. फिलहाल ये दवाएं नामकुम के वेयर हाउस में पड़ी है.

दवा और इंप्लांट के लिए लंबा इंतजार

आयुष्मान भारत योजना से मरीजों को लाभ तो मिल रहा है. लेकिन मरीजों के डरने की भी खबर को न्यूज विंग प्रकाशित करता रहा है. पिछले 9 नवंबर को पुरन बेदिया के बेटे बिरसई बेदिया अपने बेटे का इलाज कराने रिम्स आए थे. सभी जांच रिपोर्ट हो जाने के बाद भी मरीजों को लंबा इंतजार करना पड़ा, डॉक्टरों का कहना था कि इम्प्लांट नहीं होने की वजह से इलाज में देरी हो रही है. उसके बाद पुरन बेदिया ने अपने बेटे का इलाज पैसा जमा कर ही कराने की सोचे.

पुरन बेदिया एक अकेला मामला नहीं है. रोजाना ऐसे मामले सामने आ जाते हैं. मरीज की जांच के बाद इंप्लांट के लिए टेंडर निकाला जाता है जिससे देरी हो जाती है और मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ता है. इंप्लांट तो दूर मरीजों को दवा भी खुद से ही जाकर लानी पड़ती है.

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