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सरना कोड पर केंद्र के पाले में बॉल डालने की तैयारी में राज्य सरकार

15 नवंबर से पहले ही विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की घोषणा का आदिवासी संगठनों ने किया स्वागत

Ranchi: लंबे अरसे से झारखंड का आदिवासी समुदाय जनगणना प्रपत्र में अपने लिए अलग कोड के लिए आंदोलनरत रहा था. संगठनों के प्रतिनिधियों ने मांग की थी कि जल्द से जल्द सरकार अलग धर्मकोड से संबंधित प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजे. अब मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने घोषणा की है कि सरना धर्मकोड के लिए 15 नवंबर से पहले ही विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया जाएगा. इस सत्र में सरना धर्मकोड से संबंधित प्रस्ताव पारित करा कर उसे केंद्र को भेजेंगे. सीएम की इस घोषणा का राज्य के विभिन्न आदिवासी संगठनों ने स्वागत किया है.

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आदिवासियों के धार्मिक पहचान को मान्यता मिलेगी

सरना कोड के लिए लंबे समय से आवाज उठा रहे शिक्षाविद सह सामाजिक कार्यकर्ता डॉ करमा उरांव ने कहा है कि मुख्यमंत्री की इस घोषणा का हम स्वागत करते हैं. उन्होंने कहा कि यह धर्म और परंपरा की जीत है. आदिवासियों के धार्मिक पहचान को अब मान्यता मिलेगी. सरकार ने हमारी मांगों को माना है अब केंद्र सरकार को भी हमारी मांगों पर विचार करना चाहिए. उन्होंने कहा कि सरना धर्मावलंबी सिर्फ झारखंड में ही नहीं बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी रहते हैं.

सभी जगह आंदोलन तेज होगा ताकि केंद्र सरकार हमारी मांगे पूरी करें. डॉ करमा उरांव ने कहा कि 29 अक्तूबर को सरना धर्मावलंबियों ने बंगाल की मुख्यमंत्री और राज्यपाल को ज्ञापन सौंपकर धर्मकोड से संबंधित मांगों से अवगत कराया है. इसके अलावा छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्यप्रदेश में भी आंदोलन तेज हो रहा है.

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राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को भी अपनी भावनाओं से अवगत करायेंगे

आदिवासी सेना के शिवा कच्छप ने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने आदिवासी समुदाय की वर्षों से की जा रही इस मांग को लेकर अपना सकरात्मक रूख दिखाया है. हमारी अपनी अलग धार्मिक पहचान है जिसे अन्य समुदायों के साथ जोड़ा जाता था. शिवा ने कहा कि हम अब दिल्ली में जाकर आंदोलन करेंगे. राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व  गृहमंत्री को अपनी मांगों की जानकारी देंगे और उनसे अलग धर्मकोड की मांग करेंगे.

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2015 में खारिज हो चुकी है मांग

गौरतलब है कि राज्य का आदिवासी समुदाय पिछले कई दशकों से अलग धर्मकोड की लड़ाई लड़ रहा है. आदिवासी समुदाय का मानना है कि बड़ी संख्या में रहते हुए भी उसे कभी हिंदू तो कभी ईसाई समुदाय के साथ जोड़ा जाता रहा है. हालांकि राज्य में धार्मिक पहचान के लिए चल रहे आंदोलन के दो अलग-अलग स्वर है.

दरअसल एक समूह अलग धर्मकोड सरना कोड के नाम से मांग रहा है तो दूसरा समूह आदि धर्म के नाम पर इसकी लड़ाई कर रहा है. इसके अलावा देश के अलग अलग जनजातीय समूहों के द्वारा भी समय- समय पर अलग -अलग नामों से धर्मकोड की मांग की जाती रही है.

2015 में गृह मंत्रालय (भारत के महारजिस्ट्रार कार्यालय) की ओर से जारी एक चिट्ठी में सरना कोड की मांग को खारिज कर दिया गया था. इसके पीछे तर्क दिया गया था कि देश के अलग-अलग भागों से सौ से अधिक नामों से कोड की मांग की जा रही है इसलिए सभी के लिए अलग-अलग कोड जारी करना संभव नहीं है.

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दिल्ली में भी लगातार झारखंड के सरना समुदाय ने संघर्ष को रखा है तेज

हालांकि डॉ करमा उरांव जैसे बुद्धिजीवियों का मानना है कि झारखंड में सरना कोड की मांग को लेकर जितनी लड़ाई लड़ी गयी है, उसकी तुलना देश के किसी और जगह से नहीं की जा सकती है. दिल्ली में भी लगातार झारखंड के सरना समुदाय ने अपने संघर्ष को तेज रखा है. उनका कहना है कि हमें सिर्फ सरना कोड ही चाहिए उससे कम कुछ भी नहीं.

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