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महिलाओं के हक की आवाज के साथ खड़ा होना देशद्रोह है क्या ?

देश की जनता को मेरा खुला पत्र

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Ranchi :  मैं आलोका कुजूर 28 और 29 तारीख को दैनिक अखबार के माध्यम से पता चला कि 26 जुलाई को खूंटी थाना में सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखक, लेखिका, विधायक समेत मेरे उपर भी देशद्रोह का केस हुआ है. जानकारी के अनुसार फेसबुक के माध्यम से मैने खूंटी में पत्थलगड़ी करने वाले लोगों को उकसाया है. संविधान की गलत व्याख्या की है. फेसबुक के माध्यम से जनता को भड़काया है, वो भी गांव की वैसी जनता जो अशिक्षित है. जब आशिक्षत थे तो जाहिर है, तकनीकी ज्ञान से दूर थे. तब मेरी लेखनी से कैसे भड़क गये. ये सवाल मेरे मन में उठ रहा है, तब लगता है ये आरोप सरासर गलत है.

मैं लम्बे समय से फेसबुक में लिखने का काम कर रही हूं. जिसमें मैं सामाजिक और राजनीतिक हर व्यक्ति के काम कागज पर मूल्यांकन करती रही हूं. मैं जमीन के आंदोलनों से भी लम्बे समय से मूलरूप से लिखने का काम करती रही हूं. भारत में महिला संगठन के साथ भी मेरा संबध रहा है. मुझे खुशी होती की हमारे संगठनों का नाम लिखते आदिवासी महासभा और ए.सी भारत सरकार कुटुम्ब परिवार से मेरा कोई संबध नहीं है. तब केस झूठे आधार पर किया गया है.

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दैनिक अखबार में खबर पढ़ने के बाद पता चला की प्रशासन के पास इतना समय होता है कि वो फेसबुक देखती है, तब सवाल बनता है कि वो थाना में रह कर क्या काम करते हैं? इतने लोगों पर नजर रखते हैं, तब वह थाना भारत का सबसे जागरूक थाना लगता है. ऐसे में यहां सवाल बनता है कि ये थाना इतने हल्के तरीके से केस कैसे कर सकती है?

जानकारी के आधार पर संविधान की गलत व्याख्या कर बरगलाया गया है. जो गलत है. मैं जानकारी देना चाहती हूं कि महिलाओं, सर्वजन, लेखन और जमीन के मुद्दों पर अखबार में छपे 15-20 साल के रिपोर्ट में कहीं भी आदिवासी महासभा और ए.सी भारत कुटुम्ब परिवार के साथ ना सामाजिक और ना ही संगठन से कोई संबध रहा है. मेरे ऊपर लगाये गये सारे आरोप गलत व  बेबुनियाद हैं. मेरा संबंध इन संगठनों से कैसे है? प्रशासन सार्वजनिक करे. इस बात पर गहराई से ध्यान देना जरूरी है कि एफआईआर में बार-बार इस बात का जिक्र किया गया है कि, खूंटी की ग्रामीण जनता अशिक्षित है. तब यह सवाल करना जरुरी हो जाता है कि, क्या अशिक्षित ग्रामीण फेसबुक इस्तेमाल करती है. फिर यह सवाल भी मन में आता है कि, सरकार तथा प्रशासन के जानने के बावजूद की खूंटी में शिक्षा का स्तर रसातल में चला गया है. फिर भी सरकार द्वारा शिक्षा के स्तर को ठीक करने के लिए आजतक कोई कदम क्यों नहीं उठाया गय़ा. एक सवाल यह भी है की खूंटी की जनता अशिक्षित है तो फिर संविधान की गलत व्याख्या कैसे हुई. जब यह सारे सवाल मन में आते हैं तो यह समझ में आता है की प्रशासन हमपर झूठे आरोप का आधार बनाकर गदगद है.

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दैनिक अखबार में छपे खबर के आधार पर हमसब सोशल मीडिया और फेसबुक में पत्थलगड़ी एवं संविधान के प्रावधानों की गलत व्याख्या कर लोगों में राष्ट्र विद्रोह की भावना का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं. यह एफ.आई.आर की कॉपी में बार-बार लिखा गया है. मुझे अच्छा लगा थाना भी मानती है की कहीं व्याख्या गलत हुई है तो, यही मौका है कि संविधान की सही व्याख्या क्या है? इसपर भी बहस हो सकती है. एफ.आई.आर में बार-बार झारखण्ड के खूंटी जिला में अशिक्षित आदिवासी ग्रामीणों की बात कही गई है. ऐसे में कहीं ना कहीं थानेदार समझ रहे हैं कि शिक्षा विभाग और सरकार की शिक्षा व्यवस्था की पहुंच खूंटी में नहीं हो पाई है. तब सरकार को शिक्षा को लेकर काम करना चाहिए.

झारखंड पांचवी अनुसूचित क्षेत्र है. यहां ग्रामसभा के अधिकारों को सुनिश्चित किये बैगर आदिवासियों की जमीन पर सरकार कोई फैसला ले नहीं पा रही है. पूरा झारखंड जंगल और जमीन के सवाल के साथ आंदोलन कर रहा है. लोग हर दिन सड़क पर अपनी मांग के साथ संघर्ष कर रहे हैं. ऐसी स्थिति में जन आंदोलन के सवालों के साथ खड़ा होना कहां से देशद्रोह है.

मेरे कुछ सवाल हैं –

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  • . मैं देशद्रोही क्यों ?
  • . प्रशासन यह बताये कि देशद्रोह का पैमाना क्या है ?
  • खूंटी में मानव तस्करी एक बड़ी समस्या है, क्या इस सवाल को उठाना देशद्रोह है ?
  • डायन हत्या के नाम पर लाखों महिलाओं की हत्या हो गई है, क्या इस सवाल को उठाना देशद्रोह है ?
  • वन अधिकार कानून के अंर्तगत महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की गई है, क्या इस सवाल को उठाना देशद्रोह है ?
  • जमीन के सवाल के समाधान के रास्ते क्यों नहीं निकाले जा रहे हैं, क्या इस सवाल को उठाना देशद्रोह है ?

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2017 से पत्थलगड़ी जो मुण्डा समाज की परम्परा में शामिल है. सारंडा का यह इलाका एशिया का सबसे बड़ा वनक्षेत्र का इलाका है. मुण्डा समाज अपनी परम्परागत व्यवस्था को कायम कर रहे हैं. उन्ही इलाकों में लगातार देशद्रोही बनाते मुण्डा समाज संविधान और जमीन के सवाल के साथ तैनात हैं. घने वन क्षेत्र जहां रोटी कपड़ा और मकान जैसा सुविधा खुद से सवाल पूछती है. वहीं श्रम आधारित व्यवस्था तमाम चुनौतियों के साथ अपने पहचान की लड़ाई लड़ने के लिए क्रमबंध तरीके से खड़ी है. इस इलाके में कोयलकारों का आंदोलन और जमीन बचाने के आंदोलन ने किसान और मजदूर के आजीविका के साथ जमीन ही जीवन का मूल आधार रहा है. कागज के टुकड़े में जमीन का हिस्सा और जमीन में मानव का हिस्सा, विकास में खेती का हिस्सा और विकास के लिए जमीन का हिस्सा इस बार-बार के हिस्सेदारी के बीच किसानों के पास भूख की समस्या आ खड़ी होती जा रही है, वहीं पूंजी आधारित व्यवस्था ने किसान से मजदूर और मजदूर से मौत के सफर पर चल रहे हैं. बदलते दौर में सरकार की योजनाओं में कोई बदलाव नहीं आया. आवास योजना आज भी एक ही लाख में बनाने की योजना है. किसानों के खेत में पानी नहीं है. ऐसे कई सवाल हैं, जो झारखंड की जनता पूछना चाहती है.

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मैं पत्रकार, लेखिका, शोधकर्ता, महिला, चिंतक, कवयित्री हूं. आदिवासी और महिला मुद्दों, जल-जंगल-जमीन और जन आंदोलनों पर लम्बे समय से शोधपरख लेख लिखती रही हूं. मेरे लेख भारत में कई राज्यों के समाचार पत्र ही नहीं बल्कि विश्व के कई मैगजीनों में भी छप चुकी है. भारत की महिला आंदोलन से जुड़ी हुई है. राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर महिलाओं की लेखनी पर सम्मान प्राप्त है. खुद की मेहनत और महिलाहित के लिए मैंने शोध किया है. जो पांडूलिपि के रूप में है. पत्थर खदान में औरत, महिला बीडी वर्कर, पंचायत राज, डायन हत्या पर शोधपरख लेख लिख चुकी हूं. प्रथम सामूहिक किताब झारखंड इन्सायक्लोपिडीया, शोधपरख किताब झारखंड की श्रमिक महिला, कविताओं सामूहिक प्रथम किताब कलम को तीर होने दो, देश के प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में लगातार कविताओं का प्रकाशन होता रहता है. मुझे लेखनी के लिए अनेक अवॉर्ड, सम्मान और फेलोसिप, जो भी अवॉर्ड मुझे मिले हैं, वे सभी आज मुझे ही निहार रहे हैं, कि इतना काम करने के बावजूद मैं देशद्रोही कैसे हो गई.

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