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झारखंड की जेलों में बंद कैदियों में सबसे ज्यादा एसटी-एससी

Ranchi: झारखंड की जेलों में 18654 कैदी हैं. इनमें अलग-अलग धर्म के कई लोग हैं. जातिगत आधार पर देखा जाये तो 5322 आदिवासी भी अपनी नियति के भरोसे जेलों में बंद पड़े हैं. यह रिपोर्ट केंद्र सरकार ने पिछले दिनों जारी की थी. बताया जाता है कि आदिवासियों के अलावे अनुसूचित जाति (एससी) के 3014 कैदी जेलों में दिन गुजार रहे हैं. यानी एसटी-एससी कैटेगरी के 8000 से अधिक लोग जेलों में हैं. केंद्र के मुताबिक राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) कारागार संबंधी आंकड़ों को प्रकाशित करता है. नवीनतम रिपोर्ट 2019 की है. एनसीआरबी के रिपोर्ट की मानें तो झारखंड में 13709 हिंदू कैदी हैं. इसके बाद मुस्लिमों की संख्या (3121) अधिक है. इसाई वर्ग के 1194 लोग भी जेलों में हैं. अन्य कैदियों की संख्या 550 और सिखों की 80 है. हालांकि इनमें से कुछ कैदी विचाराधीन (अंडर ट्रायल) हैं जबकि कई दोषसिद्ध कैदी भी हैं.

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सबसे अधिक हैं ओबीसी वर्ग के कैदी

राज्यसभा में सांसद के सोमप्रसाद ने जेलों में बंद कैदियों का धर्म औऱ जाति के आधार पर आंकड़ों की मांग की थी. इसके जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा ने बताया था कि जेलों में बंद कैदियों में जातिवार (31-12-2019 तक) में सबसे अधिक ओबीसी कैटेगरी के कैदी हैं. इनकी संख्या 7303 है. एसटी के 5322, एससी के 3014 तथा अन्य कैटेगरी के 3015 कैदी जेलों में बंद हैं.

गृह मंत्रालय के अनुसार देश में कारागारों में कैदियों की कुल संख्या 4,78,600 है. इनमें से 1,44,125 दोषसिद्ध और 3,30,487 अंडरट्रायल कैदी हैं. कुल कैदियों में 19,913 महिला कैदी भी हैं. देशभर में जातिवार कैटेगरी के हिसाब से सबसे अधिक 162800 कैदी जेलों में हैं. एससी कैटेगरी के 99273, एसटी के 53336 और अन्य कैटेगरी के 126393 कैदी हैं.

सरना समाज के लिये संवदेनशीलता जरूरीः सरना समिति

केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष बबलू मुंडा कहते हैं कि ट्राइबल क्लास के सामने शिक्षा और जागरुकता का अभाव है. यही वजह है कि जिस समाज ने अरसे तक जल, जंगल, जमीन के लिये अपनी कुर्बानी दी, उसे ही आज नक्सली, अपराधी होने के नाम पर, तो कभी फॉरेस्ट एक्ट के उल्लंघन के नाम पर पुलिसिया कार्रवाई का शिकार होना पड़ रहा है. जेलों में बंद जनजाति समाज के कैदियों में एक-दो फीसदी केस को छोड़ दें तो समुचित जांच पर सभी निर्दोष साबित होंगे. सरकार को चाहिये कि जनजाति समाज के लोगों के मामले में पुलिस को संवेदनशीलता, समझदारी से केस की जांच करने को कहे. बेवजह निर्दोष को किसी केस में फंसाकर उसकी जिंदगी चौपट ना करे.

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