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11वीं पुण्यतिथि पर विशेष :  माटी का मान बढ़ाने में सदा सजग रहे न्यायमूर्ति लाल पिंगला नाथ शाहदेव

 

 

Ranchi:  देश के इतिहास में अवकाश प्राप्त जज को एक थाना की पुलिस आंदोलन के कारण गिरफ्तार कर ले, इसका इकलौता उदाहरण होगा जस्टिस एल पी एन शाहदेव जी का केस. सोमवार को न्यायमूर्ति शाहदेवजी की 11वीं पुण्यतिथि है. शाहदेवजी एक मेधावी छात्र, कुशल अधिवक्ता, न्यायप्रिय न्यायधीश, समाजसेवी, कुशाग्र बुद्धि, मृदुभाषी, मिलनसार एवं आंदोलनकारी शख्सियत थे.

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उनका जन्म 3 जनवरी 1930 को  नागवंशी राजपरिवार में लातेहार जिला के कामता गांव में हुआ था. उनके पिता का नाम स्व नवालाल चंडी प्रसाद नाथ शाहदेव था. प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही महुआमिलान स्कूल में हुई थी. हाई स्कूल की पढ़ाई बालकृष्ण हाई स्कूल से पूरी की. फिर आगे की पढ़ाई के लिए रांची आ गए. यहां रांची कॉलेज से स्नातक किया. उसके बाद कानून में रुचि होने के कारण एलएलबी की पढ़ाई पटना के एलएलबी कॉलेज से 1954 में पूरी की. इसके साथ ही लॉ की प्रैक्टिस शुरु कर दी. 1958 में वे न्यायिक सेवा में आ गए. पहली पोस्टिंग हज़ारीबाग़ में मुंसिफ के पद पर हुई. 1980 में धनबाद जिला के जिला एवं सत्र न्यायाधीश बने.1983 में इनकी तबादला हो गया. गया, मुंगेर, जमुई जैसे कई जिलों में अपनी सेवा दी. 1986 से 1992 तक पटना हाईकोर्ट (रांची पीठ) के न्यायधीश के रूप में हुई. जस्टिस शाहदेव झारखंड़ के प्रथम धरती पुत्र थे जिन्होंने न्यायाधीश बनने का गौरव प्राप्त किया था. 1992 में न्यायिक सेवा से अवकाश ले लिया.

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जस्टिस शाहदेवजी सही मायने में एक झारखंडी मानसिकता से ओत प्रोत व्यक्ति थे. जब वे न्यायिक सेवा में थे और झारखंडियों की स्थिति को देखते, सुनते और पढते थे तो उनके अंदर का झाड़खंडी दिल अंदर से कचोटता था. वे शुरू से ही अलग झारखंड़ राज्य के पक्षधर थे. चूंकि वे एक संवैधानिक पद पर आसीन थे, सो वे खुलकर कुछ कर नहीं पा रहे थे. पर उनके अंदर भी झारखंडियों के मान सम्मान, हक, अधिकार को लेकर दिल में एक चिंगारी धधकती थी. जब उन्होंने अवकाश प्राप्त किया तो वे समाचार पत्रों में अपने आलेख के माध्यम से अलग झारखंड़ राज्य की मांग को लेकर इसे जायज ठहराया. उनके इस प्रयास से झारखंड़ के कई बुद्धिजीवी लोग, सभी जाति धर्म के लोग उनसे जुड़ने लगे. आंदोलन को तेज करने की रणनीति बनाने लगे. झारखंड़ अलग राज्य की लड़ाई लड़ रही कई राजनीतिक दल के कार्यकर्ता, आंदोलनकारी उनसे कानूनी सलाह लिया करते थे.

एक समय ऐसा आया कि जब झारखंड़ अलग राज्य की मांग के आंदोलन में ठहराव एवं बिखराव आ गया. तब 1998 में जस्टिस शाहदेव ने इस आंदोलन को एक नेतृत्व प्रदान किया. उस समय इस आंदोलन को और तेज करना कठिन कार्य था क्योंकि तत्कालीन बिहार राज्य के मुखिया अलग राज्य के पक्षधर नहीं थे. वे किसी भी सूरत में झारखंड़ को बिहार से अलग करना नहीं चाहते थे. राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव जी ने यहां तक कह दिया था कि झारखंड मेरी लाश पर बनेगा. मतलब साफ था कि अलग राज्य बनने की राह में अनेक रोड़ा था. तब जस्टिस शाहदेव जी के नेतृत्व में एक अलग राज्य निर्माण समिति का गठन किया गया. समिति में झारखंड़ आंदोलन कर रही 16 पार्टियां शामिल थीं जिसमें झामुमो, जेपीपी, झारखंड़ पार्टी, आजसू, राजद की स्थानीय इकाई सहित अन्य दल शामिल थे. जस्टिस शाहदेव आंदोलनकारियों के साथ मिलकर तत्कालीन केंद्र सरकार को इस बात पर सहमत कराने में सफल हो गए कि बिहार सरकार के विरोध के बावजूद भी अगर केंद्र सरकार चाहे तो अलग राज्य का निर्माण कर सकती है. केंद्र की  भाजपा  सरकार को यह बात समझ में आ चुकी थी.

अतः देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व अटल बिहारी बाजपेयी एवम् गृहमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी जी ने छत्तीसगढ़ एवम् उत्तराखंड के साथ साथ झारखंड़ को भी एक अलग राज्य बनाने का निर्णय लिया. तत्कालीन बिहार सरकार के द्वारा 1998-99 में वनांचल बिल को नामंजूर करने तथा झारखंड़ अलग राज्य की प्रस्ताव को वापस लेने के कई नकारात्मक कार्य हुए. झारखंड़ अलग राज्य का एक बिल 21 सितंबर 1998 को  बिहार विधानसभा में लाया गया था और उस पर वोटिंग होनी थी. बिल को गिराने में बिहार सरकार सफल हो जाती, यह निश्चित था. ऐसे में तब जस्टिस शाहदेव जी ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर झारखंड़ बन्द का आह्वान किया.

वे जानते थे कि बिल को बिहार सरकार गिराने में सफल हो जाएगी लेकिन जब झारखंड़ बन्द सफल होगा तो केंद्र सरकार तक संदेश यह चला जायेगा कि झारखंड की जनता अलग राज्य की मांग पर एक है. अलग राज्य निर्माण समिति में शामिल सभी 16 दलों ने शाहदेव जी के नेतृत्व में बंद को अभूतपूर्व एवम् सफल बनाया. पूरा झारखंड़ उस दिन बन्द रहा. सड़कों पर सिर्फ आंदोलनकारी ही नजर आने लगे थे. रांची में जस्टिस शाहदेव जी के नेतृत्व में आंदोलनकारी सड़क पर उतर गए. शाहदेव सहित हज़ारों आंदिलंकारियों को गिरफ्तार किया गया.

देश के इतिहास में शायद यह पहली घटना रही होगी जब किसी अवकाश प्राप्त न्यायाधीश को पुलिस के द्वारा गिरफ्तार किया गया हो. उन्हें सुबह 11 बजे से लेकर शाम 5 बजे तक कोतवाली थाना में बैठाकर रखा गया. केंद्र तक जो संदेश यह समिति देना चाहती थी वह पहुँच चुका था. तब तत्कालीन बाजपेयी जी की केंद्र सरकार ने  लोकसभा से 2 अगस्त  2000 को बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक पास कर दिया. 11 अगस्त को राज्यसभा से स्वीकृति मिली एवम् 25 अगस्त 2000 ई को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली. झारखंड देश के मानचित्र में 28वां राज्य बना.

जस्टिस एल पी एन शाहदेव जी के झारखंड़ आन्दोलन में निभाई गयी भूमिका के कारण राजभवन के समक्ष स्थित चौक का नामकरण इनके नाम पर किया गया है. इसका उद्घाटन 2013 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन जी ने किया था. विधानसभा भवन में भी इनका तैल चित्र बनाया गया है जिसका उद्धघाटन तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष श्री सीपी सिंह जी के द्वारा किया गया था. जस्टिस शाहदेव जी की भूमिका को देखते हुए जिस स्कूल में इनकी प्रारंभिक शिक्षा हुई थी, उस स्कूल को अपग्रेड करके उत्क्रमित हाई स्कूल बनाया गया. उसका नाम बदल कर जस्टिस एल पी एन शाहदेव किया गया है. जस्टिस एल पी एन शाहदेव जी की मृत्यु 10 जनवरी 2012 को हुई. ये अपने पीछे एक पुत्र तथा चार पुत्री छोड़ गए हैं. इनके एकमात्र पुत्र श्री प्रतुल नाथ शाहदेव हैं जो आज भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता हैं.

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