Opinion

क्षमा करना वामपंथी मित्रों, लेकिन अब तुम्हें डूब मरना चाहिए

“दुनिया छोड़ो, तुमने भारत के मजदूरों को एक करने का मौका खो दिया.”

Shashi Shekhar

5 मई को कार्ल मार्क्स का जन्मदिन था. अपनी जवानी पूंजीपतियों की मंजूरी-हजूरी में बीता देने के बाद, आज भारत के मजदूर अपने घर खाली हाथ लौट रहे हैं. रेल की पटरियों के किनारे 1000 किलोमीटर दूर के सफर पर पैदल चल रहे मजदूर. अपने “देस” लौटने के लिए सूरत में पुलिस से भिड़ते मजदूर. आखिर, कार्ल मार्क्स को उनके जन्मदिन पर इससे अधिक गिफ्ट ये मजदूर क्या दे सकते थे?

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लेकिन, यही वक्त है, जब तमाम येचुरियों, करातों, राजाओं, अंजानों को बंगाल की खाड़ी में जल समाधि ले लेनी चाहिए. और कन्हैयाओं, रावणों, मेवानियों के सीने की जांच होनी चाहिए. वाकई, उनके सीने में दौड़ता लहू “लाल” है?

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ये देश गुजरात की एक यूनिवर्सिटी कैंटीन में समोसे के दाम बढ़ने पर ऐसा आन्दोलन कर देता था, जिसकी आंच पूरे देश में फैलती है. और फिर “लौह महिला” और “दुर्गा” की उपाधि से नवाजी गयी तत्कालीन निरंकुश हो चली प्रधानमंत्री को उनकी हैसियत बता देती है.

ये देश एक यूटोपियन टाइप संस्था “जनलोकपाल” की मांग को लेकर 10 साल पुरानी कांग्रेस सरकार को मुंह के बल खडा कर देता है. पेट्रोल की कीमत में मामूली बढ़त हो या पीएफ ब्याज दर में 1 फीसदी की कमी, कामरेड गुरुदास दासगुप्ता अकेले संसद से सड़क तक हिला कर रख देते थे और सरकार को मजबूरन पीछे हटना पडता था. इस वजह से ही, कभी यूपीए-1 की सरकार को रोलबैक सरकार भी कहते थे.

लेकिन, आज….आज तुम कहां हो कामरेड?

देश में 14 करोड़ सिर्फ प्रवासी मजदूर इस वक्त अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे हैं. नौकरी छूटी, परिवार से दूर, कोई बचत नहीं. सरकारें ऐसे सलूक कर रही हैं, जैसे मजदूर सर्कस का जानवर हो. स्टेट का रिंग मास्टर चाबुक चलाता है, वापस नहीं लेंगे. केन्द्र का चाबुक चलता है, वापस भेजेंगे.

रेलवे कहती है, टिकट का पैसा दो. विपक्ष कहता है, हम देंगे पैसा. स्टेट कहता है, पहले पैसे देकर आओ, हम रीइमबर्स कर देंगे. मीडिया कहता है, पैसा लिया ही नहीं. मजदूरों का “सेवक” खामोश है. और तुम कामरेड, जाने किस चरम सुख प्राप्ति का इंतजार कर रहे हो?

जानता हूं, तुम्हें इस बात का इंतजार है कि क्रांति खुद चल कर ए के गोपालन भवन/अजय भवन पर दस्तक देगी. तब तुम उस क्रांति को अपने झोले में भर-भर कर रामलीला मैदान/गान्धी मैदान पहुंचोगे और पूछोगे हिन्दुस्तान की हुकूमत से कि आपने तो पूंजीपतियों से कहा था, पैसा न काटना, नौकरी से न निकालना, क्यों नहीं मानी उन पूंजीपतियों ने आपकी बात?

तो कामरेड, पिछले 70 सालों से तुम्हारा “क्रांति” के दस्तक देने का इंतजार इस बार भी इंतजार ही रह गया. क्योंकि, इस बार क्रांति सचमुच तुम्हारे दरवाजे से होकर गुजर गई और तुम अपने “चरम-सुख” प्राप्ति में लीन रह गए.

तुम्हारे पास मौका था, उन लाखों मजदूरों को रास्ते में रोक लेने का और वापस उन अट्टालिकाओं के सामने खड़ा कर देने का, जिनकी नींव में इन मजदूरों का खून-पसीना लगा है. तुम जाते उनके पास, सूरत से मुंबई तक, दिल्ली से पंजाब तक, कुनूर से चेन्नई तक और पूछते उन पूंजिपतियों से, जिन्होंने सालों इन मजदूरों की बदौलत देश-विदेश में अपनी ऐशगाहों का इंतजाम किया हैं और आज एक झटका लगते ही इनसे पल्ला झाड रहे हैं.

अरे, और कुछ नहीं तो जो घर आ गए, उनके घर जाते और कहते कि मजदूर भाइयों, डरना मत, हम लड़ेंगे साथी, जीतेंगे साथी. लेकिन, तुम मौका चूक गए.

मार्क्स बाबा,

मैं जानता हूं, आज आप अपने भारतीय चेलों से जरूर दुखी होंगे. इसलिए, मैं आपको हैप्पी बर्थडे नहीं बोलूंगा. हो सके तो, मेरी तरफ से आप भी इन्हें बोल देना, डूब मरो वामपंथियों…

डिस्क्लेमर : लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, ये इनके निजी विचार हैं.

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