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झारखंड के कुछ अधिकारी अयोग्य, अनिर्णायक, उदासीन, हठी और धूर्त हैं: अनिल स्वरूप (Retd. IAS)

राज्य की स्थित दिल दहलानेवाली

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Ranchi: झारखंड विकास परिषद के पूर्व सीईओ रिटायर्ड आइएएस अनिल स्वरूप ने ‘The Print’ में एक लेख लिखा है. जिसमें उन्होंने छत्तीसगढ़ और झारखंड की तुलना की है. उन्होंने लेख में यह बताने की कोशिश की है कि कैसे झारखंड पीछे रह गया और उसके साथ ही बना राज्य छत्तीसगढ़ आगे बढ़ गया. उन्होंने इस लेख में आइएएस अधिकारियों की भूमिका के बारे भी लिखा है. उन्होंने बिना किसी का नाम लिए झारखंड के कुछ अधिकारियों को अयोग्य, अनिर्णायक, उदासीन, हठी और धूर्त कहा है. आपको बताते चलें कि अनिल स्वरूप एक रिटायर्ड आइएएस अधिकारी हैं. रिटायरमेंट के बाद उन्हें झारखंड के विकास परिषद का सीईओ बनाया गया था. लेकिन उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया है. 10 दिसंबर को राज्य सरकार की तरफ से उनका इस्तीफा कबूल कर लिया गया. इस्तीफा कबूल हो जाने के बाद ‘The Print’ में उन्होंने दो जनवरी को जो लेख अंग्रेजी में लिखा है, उसे न्यूज विंग हू-ब-हू हिंदी में रूपांतरण कर रहा है.

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रमन सिंह ने अच्छी विरासत छोड़ी

रमन सिंह छत्तीसगढ़ में भले ही चुनाव हार गए हों. लेकिन उन्होंने जो विरासत छोड़ी है, उसका फायदा उन्हें चुनाव में हराने वालों को जरूर मिलेगा. छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक एक स्थिर सरकार की वजह से वहां विकास को गति मिल सकी. ऐसी गति जिसका सपना एक साथ बना झारखंड अभी भी नहीं देख सकता. इससे ज्यादा क्या चाहिए छत्तीसगढ़ ने इतनी जल्दी अपना राजधानी ‘नया रायपुर’ भी बना लिया और झारखंड अभी तक नयी राजधानी के लिए संघर्ष कर रहा है. अभी तक झारखंड की सारी सरकारी मशिनरी एक पीएसयू की बिल्डिंग ‘प्रोजेक्ट भवन’ में चल रही है.

विकास में छत्तीसगढ़ निकला काफी आगे

दोनों झारखंड और छत्तीसगढ़ एक साथ ही बने थे और अब दोनों अपना 20वां साल पूरा करने जा रहे हैं. झारखंड बिहार से अलग हुआ और छत्तीसगढ़ एमपी से. अलग होने के बाद दोनों का विकास दर ने बढ़ा. लेकिन दोनों में काफी अंतर था. छत्तीसगढ़ ने विकास के मामले में अपने पैरेंट स्टेट एमपी को पीछे छोड़ दिया. लेकिन झारखंड पीछे रह गया. ऐसा आंकड़ों से साफ होता है. वित्त वर्ष 1994-95 से लेकर 2001-2002 तक की बात की जाए तो संयुक्त बिहार और झारखंड की विकास दर करीब 3.6 फीसदी थी. झारखंड बनने के बाद विकास दर वित्त वर्ष 2001-2002 से लेकर 2011-12 तक करीब 6.3 फीसदी हो गयी. लेकिन बिहार की विकास दर 11.4 फीसदी थी. वहीं छत्तीसगढ़ की बात करें तो 1994-1995 से 2001-2002 तक की विकास दर 3.1 फीसदी थी. जो 2011-2012 तक 8.6 फीसदी हो गयी. जो एमपी से काफी ज्यादा थी. एमपी की विकास दर इस वक्त 7.6 फीसदी ही थी. छत्तीसगढ़ ने एमपी को 7.6 फीसदी से पीछे छोड़ा. अगर प्रति व्यक्त आय की बात की जाए तो झारखंड ने बिहार को पीछे जरूर छोड़ा लेकिन सिर्फ 0.1 फीसदी से. झारखंड की प्रति व्यक्ति आय 2.1 फीसदी है और बिहार की 2 फीसदी. वहीं छत्तीसगढ़ ने इस मामले में एमपी को 0.50 फीसदी पीछे छोड़ा. छत्तीसगढ़ की प्रति व्यक्ति आय 2.5 फीसदी है और एमपी की 2 फीसदी.

इसके अलावा और भी कुछ चौंकानेवाले तथ्य हैं. जैसे झारखंड की आबादी छत्तीसगढ़ से तीन गुना ज्यादा थी, जबकि राजस्व कर एक तिहाई. झारखंड राजस्व के मामले इसलिए भी चौंकाता है, क्योंकि यह एक खनिज संपदा से भरपूर राज्य है.

फिर झारखंड के साथ क्या गलत हुआ?

राजनीतिक अस्थिरता एक बड़ी वजह रही. छत्तीसगढ़ में लंबे समय तक एक स्थिर सरकार थी. वहीं झारखंड ने कभी भी छत्तीसगढ़ की तरह एक लंबी सरकार को नहीं देखी. इस बीच झारखंड पर घपले-घोटाले के कई तरह के आरोप भी लगे. झारखंड के कुछ बड़े राजनीतिक चेहरे राष्ट्रीय स्तर पर घोटालों के लिए जाने गए. जिसमें कोल स्कैम अहम रहा. एक तरह से कहा जाए तो झारखंड जैसे खनिज संपदा वाले राज्य को infamous Dutch disease या ‘the resource curse’ भी कहा जा सकता है.

खास तौर से कहा जा सकता है कि झारखंड में हमेशा से राजनीति में एक विजन की कमी रही. राजनीतिक हस्तियां अपने छोटे टर्म में हमेशा से ही अपनी जेब भरते रहे. रमन सिंह जैसा एक भी नेता झारखंड को कभी नहीं मिला.

ब्यूरोक्रेसी ने झारखंड को तबाह कर, दूसरा ही राज्य बना दिया

झारखंड की ब्यूरोक्रेसी, बनावट और सिविल सर्वेंट्स ने झारखंड की यह गति करने में खूब साथ दिया. बिहार से जब झारखंड अलग हो रहा था, तो वहां की ब्यूरोक्रेसी पहले से ही चारा घोटाले से घिरी हुई थी. उस समय के बेहतरीन सिविल सर्वेंट्स आरएस शर्मा और राजीव गौबा थोड़े समय के लिए चीफ सेक्रेट्री रहे और केंद्र चले गए. इसके उलट विवेक धांढ़ जैसे आईएएस अफसर ने छत्तीसगढ़ में ही रुकना अच्छा समझा. वो चार साल तक वहां के चीफ सेक्रेटरी रहे. ऐसा करने से छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक तरीके से निरंतरता बनी. इसकी तुलना में झारखंड में सीनियर अधिकारियों की कमी रही. कुछ थे भी तो उन्हें राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया गया. इस वजह से उन अधिकारियों को संदिग्ध आचरण वाले अधिकारी के तौर पर देखा जाने लगा. झारखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री रघुवर दास फिलहाल अच्छा काम कर रहे हैं. वो अपने आस-पास कुछ सीनियर आईएएस की बात मानते हैं.

कुछ अधिकारी अयोग्य, अनिर्णायक

काफी संख्या में राज्य के अधिकारी जो हेडक्वार्टर में हैं या जिले में हैं प्रतिबद्ध और योग्य हैं. फिर भी झारखंड को धीमी गति से विकास करनेवाला राज्य माना जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि यहां के कुछ अधिकारी या तो अयोग्य या तो अनिर्णायक या तो उदासीन या तो हठी या धूर्त हैं. या यह सभी हैं. ये अपवाद हैं. लेकिन इनमें से कुछ अच्छे ओहदे पर हैं और दिखने वाले चेहरों में से एक हैं. एक बार के लिए यह बताना मुश्किल है कि सिमडेगा के कुछ प्रखंड में एक भी कॉमर्शियल बैंक के ब्रांच क्यों नहीं हैं. ऐसे मैंने अपने हाल के दौरे में महसूस किया है. जब इसकी जानकारी राज्य के कुछ सीनियर आइएएस अधिकारियों को दी गयी, तो प्रतिक्रिया और भी डरानेवाली थी. कई स्तर पर काफी घोषणाएं हुईं हैं. लेकिन सालों से जमीन पर नहीं उतरी हैं. कोई उन घोषणाओं को देखने वाला नहीं है.

प्रतिबद्ध अफसरों की जरूरत

राज्य की आर्थिक स्थिति दिल दहलानेवाली स्थिति में है. इस ओर भी किसी का ध्यान नहीं है. डीवीसी का राज्य पर बकाया करीब 3000 करोड़ है और किसी को नहीं पता कि इस राशि का भुगतान कब होगा. झारखंड को अभी दूसरे राज्यों से सीखने की काफी जरूरत है. खास कर छत्तीसगढ़ से. लेकिन उससे पहले यह मानने की जरूरत है कि झारखंड संकटकालीन दौर से गुजर रहा है. राज्य सरकार विकास की तरफ यू-टर्न करना चाहती है तो सरकार को निश्चित तौर पर आरएस शर्मा, राजीव गौबा और विवेक धांढ जैसे अधिकारियों की जरूरत है.

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