Opinion

सामाजिक आंदोलन को मिलेगी नयी दिशा या इसे स्थायी पराजय का शिकार होना पड़ा है

FAISAL ANURAG

क्या हिंदी पट्टी के वोट रुझान 1990 के पहले की तरह हो गये हैं. 2014 और 2019 के चुनावों के परिणाम तो यही कह रहे हैं. जब भी कोई बड़ा राजनीतिक नतीजा आता है तो उसे इतिहास के आईने में देखने के बजाय उसे नयी परिघटना के बतौर स्थापित करने का प्रयास किया जाता है. इसका यह अर्थ नहीं है कि 2019 के चुनावों का नतीजा सामान्य परिघटना है. वास्तव में यह अनेक अर्थो में अपनी अलग कहानी कह रहा है. 2019 के नतीजों का आकलन करते हुए इस बात का ध्यान रखा जाना ही चाहिए कि 2019 में भारतीय जनता पार्टी को 22 करोड़ लोगों ने वोट दिया है जो 2014 की तुलना में चार करोड़ से ज्यादा है. भाजपा ने अपने वोट प्रतिशत में सात प्रतिशत का इजाफा किया है. इससे जाहिर होता है कि 2014 के बाद के भारत में भाजपा ने अपने आधार का विस्तार किया है और इसने सोशल इंजीनियरिंग से उन सामाजिक शकितयों को अपने पक्ष में किया है जो 2014 तक उसके साथ आने से हिचक रहे थे. 2014 के बाद के अनेक उपचुनावों में और पिछले दो सालों में हुए विधानसभा के चुनाव नतीजों से यह माना जा रहा था कि 2014 में की गयी भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग का जादू उतर चुका है. लेकिन 2019 ने यह बताया है कि समीक्षकों का इस तरह का निष्कर्ष न केवल गलत था बल्कि भाजपा की ताकत का अंदाज लगाने में उनकी चूक का भी यह परिणाम था.

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बहुजनवादी राजनीतिक दलों और सामाजिक न्याय के प्रचलित समीकरणों को लेकर चुनाव बाद अनेक तरह के सवाल किए जा रहे हैं. यह भी कहा जा रहा है कि सामाजिक न्याय की राजनीतिक ताकतों का इस तरह हार जाना वास्तव में उनके परिवारमोह के कारण ही संभव हुआ है. लेकिन इस निष्कर्ष पर जल्दबाजी करना उसी तरह गलत साबित हो सकता है जिस तरह 2017 के बाद राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद हुए हैं. बावजूद इसके यह कहा जा सकता है कि 1990 के बाद से हिंदी पट्टी की राजनीति बदली थी और विभिन्न वंचित समूहों के राजनीतिक भागीदारी की आकांक्षा ने अपनी जगह बनायी थी. भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकार रहे गांविंदाचार्य ने इस राजनीतिक सच्चाई को गहरे से आत्मसात करते हुए सोशल इंजीनियरिंग के माध्यम से इन तबकों को राजनीतिक भागीदारी देते हुए राजनीतिक बदलाव की पीठिका तैयार की थी. जिसे 2014 के चुनावों में पूरी तरह परिपक्व करने के अपने अभियान में भाजपा कामयाब हुई थी. भारतीय जनता पार्टी बड़ी ताकत बन कर भी जिस तरह छोटे राजनीतिक दलों को महत्व देती है वास्तव में वह जाति समीकरण को साधने में बेहद कारगर साबित हो रहा हे. 2019 में इसने न केवल मंडलवादी राजनीति करने वालों के दायरे से बडे आधार को अपनी तरफ आकर्षित किया है बलिक उसे स्थायी बनाने की दिशा में भी पहल कर दिया है. एनडीए के नेता चुने जाने के बाद मोदी ने इस ओर इशारा किया है. हालांकि 2014 के बाद की अनेक घटनाओं के बाद अभी यह संशय बरकार है कि वे जिस माइनोरिटी की बात कर रहे हैं वह कितना राजनीतिक बयान है और कितना विदेशों में बनी धारणाओं को तोडने के मकसद से फौरी तौर पर कहा गया है.

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1967 में वंचित जाति समूहों की राजनीतिक भागीदारी के बड़े आंदोलनों के बाद से हिंदी पट्टी में राजनीतिक समीकरण बदलने लगा था. हालांकि 1989 के पहले तक के लोकसभा चुनावों में पूरे भारत के सभी जाति  समूहों के मुख्य रूझान एक ही तरह अभिव्यक्त होते रहे हैं. द्रविड़ आंदोलन ने दक्षिण में सबसे पहले इस तरह के समीकरणों को बदलते हुए अपनी राजनीतिक महत्ता को स्थापित किया. लेकिन तब भी यह प्रवृति तमिलनाडु के बाहर लक्षित नहीं होती थी. 1967 में लोहिया ने सोशलिस्ट, कम्युनिस्ट और जनसंघ को एक गठबंधन में खड़ा किया और सात राज्यों में कांग्रेस को बेदखल किया. 1967 के लोकसभा चुनाव में इस कारण कांग्रेस के लिए कड़ी चुनौती पेश हुई. 1962 में कांग्रेस को तमाम विपरीत हालात के बावजूद 44.72 प्रतिशत वोट के साथ 361 सीट मिले थे. कांग्रेस को इस चुनाव में लगभग साढ़े तीन प्रतिशत वोट का नुकसान हुआ था. 1967 में  साढे तीन प्रतिशत उसके और वोट घटे. और उसे मात्र 283 सीटों पर ही जीत मिली थी. सामाजिक न्याय की ताकतों के विपक्षी गठबंधन के पक्ष में जाने के कारण कांग्रेस की सीटें घटी. 1971 में कांग्रेस का वोट शेयर बढा और सीट भी 373 हो गयी. 1977 में उसे एक बार फिर विपक्षी गठबंधन के कारण हार मिली और केंद्रीय सत्ता से पहली बार बेदखल हुई. उसे पूरे भारत में सीटों के लिए तरसना पडा. लेकिन दक्षिण भारत ने उसका साथ नहीं छोड़ा था. 189 सीट ही उसे मिले थे. 1980 में हूए उपचुनाव में कांग्रेस ने 374 सीट जीत कर वापसी की. यह बताता है कि हिंदी पट्टी में बडी कामयाबी तभी मिलती है जब वोटरों के बड़े समीकरण क्रियाशील हो जाते हैं. 2019 के चुनाव में बिहार, उत्तरप्रदेश सहित अन्य हिंदी राज्यों में भाजपा ने बडी कामयाबी हासिल की है. हारी हुई ताकतों के वोट आधारों में भाजपा ने हिस्सेदारी ले कर अपनी जीत को बड़ा ही किया है. इस चुनाव में यह भी संदेश है कि केवल आंकडों के गठबंधन कामयाब नहीं हो सकते. उसे सामाजिक रूझान के बदलाव को समझने की जरूरत है जिसने बहुजनवादी राजनीतिक दलों के आधार के बहुजनों के बीच भी भाजपा की स्वीकृति बढ़ी है. इसका एक बड़ा कारण तो चुनाव प्रचार के समय नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में ही यह कहते हुए स्पष्ट कर दिया था कि जाति से पिछड़े हैं. 2014 के चुनाव में भी उनके प्रचार अभियान का यह हिस्सा था. भाजपा ने हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के कार्ड को एक अपराजेय राजनीतिक अभियान में बदला और इसके साथ उसने सामाजिक संतुलन साधने में भी कारगर पहल की.

यह राजनीतिक समीकरण कितना स्थायी साबित होगा, यह अभी से नहीं कहा जा सकता. छत्तीगढ, मध्यप्रदेश और राजस्थान में मात्र चार महीने पहले हुए चुनावों में भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग का जो बिखराव दिखा था उसे वह साधने में कारगर रही. हालांकि भाजपा ने सामाजिक न्याय आंदोलन से उभरे एजेंडा का भी प्रवक्ता बनने से परहेज नहीं कर इन ताकतों का विश्वास हासिल करने के लिए हिंदुत्ववादी प्रवृति को आजमाया है.

लेकिन भाजपा इस बात को जानती है कि सामाजिक न्याय के आंदोलनों का प्रतिनिधित्व करने वाले राजनीतिक ताकतों से उसने जो वोट शेयर हासिल किया है, उसे साधे रहना आसान नहीं है. इसका एक बडा कारण तो यह है कि हिंद्दी पट्टी के उभार को इतिहास में पीछे ले जाना संभव नहीं है. सामाजिक न्याय का आंदोलन देर-सबेर नये राजनीतिक रूझान के साथ दस्तक दे सकता है. हालांकि चुनाव परिणाम के साथ ही भाजपा अगले चुनाव के लिए अपने सामाजिक आधार के विस्तार की रणनीति को ओर इशारा कर दिया है. संसद के सेंट्रल हाल में मोदी ने अपने भाषण में इसका प्रमुखता से उल्लेख किया है. सामाजिक न्याय की ताकतों को नये  तरीके से अपनी विरासत को आगे बढाने की चुनौती है. यदि वे ऐसा करने में कारगर रहे तो भाजपा के लिए अब भी सामाजिक स्तर पर बड़ी चुनौती साबित हो सकती है. जीत के बाद भी यह निष्कर्ष भविष्य के लिए चुनौती है कि सामाजिक न्याय आंदोलन स्थायी पराजय का शिकार हो चुका है. इसलिए यह चुनाव निश्चित तौर पर कई अर्थो में 1990 के पहले की वापसी नहीं है. सिवा इसके कि भाजपा हर जाति समूह के भीतर अपने आधार को मजबूत करती दिखी है.

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