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तो क्या पांच उपमुख्यमंत्री की परिघटना राजनीति में नया समीकरण का आगाज साबित होगी ?

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Faisal Anurag

आंध्र प्रदेश में पांच उपमुख्यमंत्री बनाया जाना वोटर समूहों की आकांक्षाओं को साधने का कदम है. ऐसा कदम जो एक भारी बहुमत की सरकार ने उठाया है.

आमतौर पर एक दल के बहुमत वाली सरकारों में इस तरह का प्रयोग आम परिघटना नहीं है. जब कभी उपमुख्यमंत्री किसी सरकार में बनाया जाता है तो वह दल या गठबंधन की मजबूरी के तौर पर ही देखा जाता रहा है.

जगन रेड्डी कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री वाई एस आर रेड्डी के पुत्र हैं. कांग्रेस नेता के तौर पर वाईएसआर ने न केवल अपराजेय समझे जाने वाले चंद्रबाबू नायडू को हराया था, बल्कि दोबारा अपनी सत्ता को बनाए रखा था. एक हवाई दुर्घटना में उनकी मौत के बाद ही आंध्रप्रदेश में कांग्रेस के बुरे दिन शुरू हुए थे.

आंध्र प्रदेश की राजनीति में कभी साइबर रेड्डी के नाम से मशहूर चंद्रबाबू नायडू की छवि तीव्र गति से विकास लाने वाले नेता की रही है. आंध्रप्रदेश के विभाजन के बाद वे जब सत्ता में वापस लौटे, तब एनडीए के घटक थे.

राज्य विभाजन के बाद उनके समक्ष राज्य को गति में लाने की चुनौती थी. राज्य विभाजन के बाद आंध्रप्रदेश की राजनीति में विशेष राज्य का दर्जा हासिल करने की राजनीतिक लड़ाई थी. मोदी सरकार के सहयोग में हाने के बावजूद, वे विशेष राज्य तो हासिल नहीं ही कर सके, जगन रेड्डी के जमीनी संपर्क और विभिन्न सामाजिक समूहों को साधने की कोशिश, उनकी रणनीति के कारण 2019 के चुनाव उनके लिए वाटरलू की तरह ही भयावह दुःस्वप्न साबित हुआ.

आम चुनाव में मोदी की जीत को जाति समीकरणों को टूटने के रूप में रेखांकित किया जा रहा है. हालांकि इस तरह की धारणा जल्दबाजी का ही नतीजा है.

भारत में जाति एक वास्तविकता है और राजनीति की संचालक शक्ति भी है. भारत के सामाजिक संबंधों के सरोकारों में कई परोक्ष और प्रत्यक्ष बदलाव हो चुके हैं, लेकिन जाति अपनी जगह स्थिर है.
इसके अपने सामाजिक ऐतिहासिक संदर्भ भी हैं. आम चुनावों को लेकर अनेक तरह के विश्लेषण जारी है, जो इस जनादेश को समझने की बारीक कोशिश करते दिखते हैं.

लेकिन ज्यादातर विश्लेषण न केवल त्वरित हैं बल्कि प्रच्छन्न और प्रत्यक्ष तरीके से व्यक्तिवादी राजनीति के महिमामंडन का सबूत है.
जगन रेड्डी को आंध्रप्रदेश विधानसभा में दो-तिहाई से भी ज्यादा सीटें मिली हैं. बावजूद उन्होंने पांच उपमुख्यमंत्री बनाया है.

उपमुख्यमंत्री बनाते हुए जगन रेड्डी की पार्टी ने स्पष्ट किया है कि पांच अलग- अलग जाति ओर धार्मिक समूहों को इस के माध्यम से हिस्सेदारी दी गयी है.

25 मंत्रियों में पांच उपमुख्यमंत्री किसी सामूहिक नेतृत्व का परिचायक नहीं है. यह परिघटना बता रही है कि राजनीति में सत्ता की हिस्सेदारी में वंचित समूहों की आकांक्षाओं का ध्यान रखा गया है.

अल्पसंख्यकों और जाति हितों को राजनीतिक भागीदारी देकर पार्टी को भविष्य के लिए ताकतवर बनाने की कोशिश है. हितों के आपसी टकराव के अंदेशों के बावजूद यह प्रयोग देश की राजनीति में वंचित समूहों ओर जातियों के महत्व को ही रेखांकित करता है.

नरेंद्र मोदी ने भी चुनाव प्रचार के दौरान जातियों को भाजपा की ओर करने के लिए चुनाव प्रचार के दौरान खुल कर अभियान चलाया. भाजपा जानती है कि 2019 की उसकी जीत एक ओर राष्ट्रवाद और हिेदुत्व के नाम पर है, तो दूसरी ओर उसमें जातियों की सोशल इंजीनियरिंग की भी भूमिका है.

जगन रेड्डी ने अपने पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए आंध्र प्रदेश की जाति संरचना के आधारों को आकर्षित करने की जिस रणनीति को अपनाया था, यह चुनावी जीत उसी के कारण संभव हुई है. हालांकि जगन रेड्डी भ्रष्टाचार के मामले में कई गंभीर आरापों और मामलों की गिरफ्त में हैं. उनकी तुलना में नायडू की छवि ज्यादा बेहतर मानी जाती है.

बावजूद नायडू जिस करारी हार के शिकार हुए उससे जाहिर होता है कि वे आंध्र प्रदेश की जाति आकांक्षाओं को राजनीतिेक स्वर देने में पीछे रह गए. नायडू की विकासात्मक प्रवृति की राजनीति की यह तीसरी बड़ी पराजय है.

तीनों बार रेड्डी पिता-पुत्रों ने उन्हें पराजित किया. जगन के पिता कांग्रेस के जन नेता थे और जगन कांग्रेस से अलग हैं और उनकी अपनी पार्टी है. हालांकि पिछले पांच सालों तक उन्होंने हर सवाल पर मोदी सरकार का संसद के दोनों सदनों में साथ दिया है.

दक्षिण भारत के सभी बड़े चार राज्यों की राजनीतिक प्रवृतियां एक समान नहीं हैं. बावजूद इसके राजनीति में उत्तर भारत को लेकर एक अलग तरह की धारणा है. यह प्रवृति तमिलनाडु में सबसे से ज्यादा है. अन्य तीनों राज्यों में अपेक्षाकृत कम है.

दक्षिण की राजनतिक प्रवृतियों में जाति संरचना बेहद आक्रामक है. और इसे स्वर देने की आक्रामक रणनीति अक्सर कामयाब होती है. 1957 के चुनावों के बाद से इस परिघटना की आहट सुनाई देने लगी, जब केरल में पहली वामपंथी सरकार अस्तित्व में आयी और द्रविड़ आंदोलन तेज हुआ.

1967 के बाद तो इन राज्यों की राजनीति अपनी राज्यवार विशेषता के साथ अपनी मौजूदगी की दास्तान सुनाता है. तो क्या पांच उपमुख्यमंत्री की परिघटना राजनीति में नया समीकरण का आगाज साबित होगी ?

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