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तो क्या उग्रवादी संगठन जेजेएमपी, पुलिस अफसरों के लिये काम कर रहा है !

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Surjit Singh

तथ्य
– पलामू के सतबरवा थाना क्षेत्र के बकोरिया में 09 जून 2015 को पुलिस व नक्सलियों के बीच कथित मुठभेड़ हुई. जिसमें 12 लोग मारे गये. मारे गये लोगो में पांच नाबालिग थे. और एक डॉ अनुराग को छोड़ किसी का नक्सली होने का इतिहास नहीं था.

– मारे गये लोगों के परिजनों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में बेकसूरों की हत्या कर दी. सीआइडी ने मामले की जांच की और मुठभेड़ को सही बताया.

– मारे गये लोगों के परिजनों ने मामले की सीबीआई जांच के लिये हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की. कोर्ट ने सरकार, पुलिस, सीआइडी औऱ परिजनों का तर्क सुनने के बाद मामले की सीबीआई जांच के आदेश दिये.

– 30 जनवरी 2019 को बकोरिया कांड के पीड़ित परिवार के लोगों ने राजभवन पहुंच कर एक आवेदन दिया. जिसमें आरोप लगाया गया है कि जेजेएमपी नामक उग्रवादी संगठन के उग्रवादी केस उठाने की धमकी दे रहें हैं और पुलिस अफसर के रिश्तेदार पैसा लेकर सुलाह कराने का दवाब बना रहे हैं.

आरोप गंभीर है. बकोरिया में फर्जी मुठभेड़ कर नक्सली अनुराग और 11 लोगों की हत्या में जेजेएमपी के उग्रवादियों पर कोई आरोप नहीं है. आरोप पुलिस के अफसरों पर हैं. डीजीपी डीके पांडेय पर केस की जांच प्रभावित करने का आरोप है. पुलिस अफसर के रिश्तेदार पैसा लेकर सुलह करने का दवाब बना रहे हैं. यह तो समझ में आता है. क्योंकि पुलिस के अफसर इस केस में फंसे हुए हैं और वह बचने के लिये यह सब कर सकते हैं. लेकिन जेजेएमपी के उग्रवादियों पर तो कोई आरोप नहीं है. फिर वे इस मामले में पुलिस अफसरों की मदद क्यों करना चाह रहे हैं. सवाल यह है कि क्या पुलिस के अफसरों और जेजेएमपी के उग्रवादियों के बीच कोई संबंध है.

पुलिस पर उग्रवादी संगठनों से संबंध रखने औऱ जायज-नाजायज काम करवाने के आरोप लगते हैं. लेकिन ताजा आरोप के बाद अब पुलिस के अफसर सीधे-सीधे संदेह के दायरे में आ रहे हैं.

एक तथ्य यह भी है कि जेजेएमपी के एक उग्रवादी गोपाल सिंह ने टीपीसी के उग्रवादियों की जन अदालत में कहा था कि बकोरिया कांड को जेजेएमपी के उग्रवादी पप्पू लोहरा के दस्ते ने अंजाम दिया था. फिर पुलिस ने क्यों मुठभेड़ की क्रेडिट ली. क्यों घटना के दूसरे दिन बिना जांच किये डीजीपी डीके पांडेय ने लाखों रुपये पुलिस कर्मियों के बीच इनाम के रुप में बांट दिये. घटना के दिन से ही पुलिस पर आरोप लगने लगे थे, फिर किस परिस्थिति में और क्यों डीजीपी ने कथित मुठभेड़ में शामिल जवानों को दिल्ली ले जाकर गृह मंत्री राजनाथ सिंह तक से मिलवाया.

इस मामले की जांच के दौरान जांचकर्ता (सीआइडी के तत्कालीन एसपी) ने जेल में बंद गोपाल सिंह तक का बयान क्यों नहीं दर्ज किया, यह अलग से जांच का विषय है.

वैसे झारखंड पुलिस के मुठभेड़ों, मुठभेड़ों में मारे के नक्सलियों-उग्रवादियों और मुठभेड़ की तारीखों को लेकर कुछ लोग नये सिरे से तहकीकात कर रहें हैं. ब्यूरोक्रेसी के बीच एक कहानी बकोरिया कांड की जांच से जुड़े अफसरों को लेकर भी चर्चा में है. इस पर चर्चा फिर कभी.

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