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..तो ये सही है, संसद में जो कहा जाना चाहिये था, नहीं कहा गया, लोग इसलिए सड़कों पर हैं

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Faisal Anurag

संसद में जो कहा जाना चाहिये था, नहीं कहा गया, इसलिए लोग सड़कों पर हैं. यह दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट के एक जज की टिप्प्णी है. आदलत ने भीम सेना के चीफ चंद्रशेखर रावण की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह बात कही.

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साथ ही कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को फटकार भी लगायी. कोर्ट के समक्ष दिल्ली पुलिस चंद्रशेखर के खिलाफ कोई सबूत नहीं दे सकी है, जिससे उनकी गिरफ्तारी को उचित ठहराया जा सके. दिल्ली पुलिस ने कैंपसों में जिस तरह का व्यवहार किया है और जिस तरह सीएए विरोधी आंदोलनकारियों के साथ वह पेश आयी है, उससे उसकी प्रोफेशनल छवि पर सवाल उठ रहे हैं.

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अदालत ने लोगों के विरोध करने के अधिकार की बात कह कर पुलिस को कठघरे में खड़ा किया है. दरअसल पुलिस की भूमिका केंद्र सरकार के हर सही गलत आदेश का पालन करने वाले की तरह बन कर उभरी है.

पुलिस के अनेक पूर्व वरीय अधिकारियों ने भी अपनी चिंता प्रकट की है. लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण आंदोलनों से निपटने के दिल्ली पुलिस के तरीकों को लेकर विवाद गहरा गया है. दिल्ली पुलिस को बेहद दक्ष माना जाता रहा है.

लेकिन राजनीतिक दबाव के कारण जो हालात बने हैं उसमें पुलिस ने अपनी साख को दावं पर लगा दिया है. तीस हजारी कोर्ट की जज कामिनी लाउ ने बेहद तल्खी के साथ चंद्रशेखर रावण के मामले में दिल्ली पुलिस के वकील से सवाल जबाव किया.

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पुलिस के वकील अदालत के सवालों का जवाब नहीं दे पाये. अदालत ने कहा कि आखिर कानून की किस धारा के तहत रावण को प्रदर्शन करने से रोका गया. उनके खिलाफ हिंसा में शामिल होने का कोई सबूत पुलिस पेश नहीं कर सकी. पुलिस के वकील ने कहा कि वे जामा मस्जिद पर प्रदर्शन कर रहे थे.

जब अदालत ने कहा कि वहां प्रदर्शन करने की रोक किस कानून के तहत है. अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस इस तरह की बात कर रही है मानो जामा मस्ज्दि पाकिस्तान में है. अदालत ने कहा कि यदि जामा मस्जिद पाकिस्तान में होता तब भी वहां प्रदर्शन करना कोई अपराध नहीं है.

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सवाल सिर्फ अदालत की सख्त टिप्पणी भर का नहीं है. देश में विरोधों को ले कर अब उन सेक्टर से भी  आवाज आने लगी है, जो आमतौर पर चुप्पी बनाये रखते हैं. सत्या नाडाल भी चुप नहीं रह सके.

उन्होंने भी देश में आंदोलनों के कारण और हालात पर चिंता जाहिर की है. उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि वे माइक्रोसाफ्ट के सीईओ बन सके क्योंकि भारत में धार्मिक विविधता की आजादी थी. नडाल की टिप्प्णी बेहद अहम है. भारत एक ओर पांच ट्रिलियन इकोनामी बनने की बात कर रहा है. ऐसे में कारपोरेट के सबसे बड़े नामों में एक का विरोध में उठा स्वर किसी भी सरकार की नीतियों को असहज ही करता है.

मोदी-शाह की सरकार इस स्थिति के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है. उसने जिस तरह के हालात बनाये हैं, उससे देश के आर्थिक विकास की संभावना का प्रभावित होने का खतरा है. मोदी के समर्थक लेखक चेतन भगत भी कहने लगे हैं कि भारत 2040 तक बड़ी शक्ति बन कर उभर सकता है. बशर्ते भारत में हिंदू-मुसलमान एकजुट होकर काम करें.

ऐसे समय में, जब देश का अल्पसंख्यक वर्ग अंदेशे में है और उसका भरोसा मोदी सरकार से पूरी तरह उठा प्रतीत हो रहा है, भगत की टिप्पणी का महत्व बढ़ जाता है. आशंका तो देश के तमाम गरीबों में भी है. नागरिकता रजिस्टर को ले कर चिंता उभरने लगी है. देश के कई ग्रामीण इलाकों में भी शाहीनबाग की तरह प्रदर्शन होने लगे हैं.

भाजपा की सांसद मीनाक्षी लेखी अब नडाल की टिप्पणी के बाद साक्षरों को शिक्षित बनाने की बात कर अपना मजाक ही बना रही हैं.

असम की पीड़ा हर दिन बढ़ती जा रही है. अब केंद्र सरकार ने वहां मूलवासियों के राजनीतिक अधिकार का एक नया विमर्श खड़ा किया है. लेकिन सीएए के विरोध में उठ खडा हुआ असम इसे अस्वीकार कर रहा है. असम का सबसे बडा त्योहार बीहू 14 तारीख को उल्लास के बदले प्रतिरोध का उत्सव बन गया.

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