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5 सितंबर, शिक्षक दिवस पर खास:   …ताकि भारतीय शिक्षा परंपरा का मूल अक्षुण्ण रहे

Baijnath Mishra

 

हम जगद्गुरु थे,  तो हमने अध्ययन-अध्यापन के कार्य को तपस्या के रूप में देखा था. हमारी मान्यता थी -“छात्रानाम् अध्ययनं तपः”. इस कथन का निहितार्थ यह है कि हमने शिक्षा को उच्चतर भूमिका पर प्रतिष्ठापित करने का प्रयास किया था. तब हमारी दृष्टि केवल विद्या को धन प्राप्ति का माध्यम बनाने की नहीं थी. हमारा तत्कालीन शिक्षक जो वस्तुतः गुरु होता था,  वह संकल्प के साथ कहता था कि “नाहं विद्या विक्रयं शासनं शतेनापि करोमि” अर्थात सैकड़ों शासन का अधिकार प्राप्त होने पर भी मैं विद्या-विक्रय नहीं करूंगा.

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प्रश्न यह है कि अच्छा अध्यापक कौन होता है ?  इसका उत्तर श्री रामकृष्ण परमहंस देव ने दिया था “जतो दिन वांची ततो दिन सीखी” यानी जितने दिन जिऊंगा, उतने दिन सीखूंगा.  अर्थात् अच्छा अध्यापक वह होता है, जो आजीवन छात्र बना रहे. जब तक सांस चलती रहे, तब तक यदि सीखने की प्रवृत्ति बनी रहे, तो हम अच्छे अध्यापक हो सकेंगे. शिक्षा का मतलब होता है विद्या देने की प्रक्रिया. हमारे देश में विद्या दो प्रकार की बतायी गयी है – एक परा विद्या और दूसरी अपरा विद्या. परा विद्या के माध्यम से हम परमार्थ और अध्यात्म का अध्ययन करते हैं और अपरा विद्या के माध्यम से लौकिक विषय सीखते हैं. इन दोनों प्रकार की विद्याओं का अर्जन तपस्या है. इस तपस्या के भी दो अंग है-स्वाध्याय और प्रवचन.  हमारे भारतीय गुरुओं का यही वैशिष्ट्य रहा है.

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अच्छे अध्यापक को अच्छे ग्रन्थों के निरंतर अनुशीलन से कभी प्रमाद नहीं करना चाहिये. वह जितना अधिक स्वाध्याय करेगा,  उसका प्रवचन उतना ही प्रामाणिक होगा. कुछ अध्यापक ऐसे होते हैं,  जो ज्ञान तो बहुत अर्जित कर लेते हैं, लेकिन अपने विद्यार्थियों को अर्जित ज्ञान कुशलतापूर्वक नहीं दे पाते. इसके विपरीत कुछ अध्यापक ऐसे होते हैं, जो जितना जानते हैं, उतना विद्यार्थियों को सिखा देते हैं, लेकिन वे जानते ही कम हैं. ये दोनों प्रकार के अध्यापक उच्च प्रतिष्ठा के अधिकारी नहीं है. उच्च प्रतिष्ठा का अधिकारी वह अध्यापक है, जो ज्ञानी होने के साथ-साथ ज्ञान के संक्रमण की कला में भी पारंगत हो.

हमारे देश के शिक्षक का यह ध्येय वाक्य था कि विद्यार्थियो ! केवल हमारे सुचरित का ही अनुगमन करना. उन्होंने यह भी कहा था कि सर्वत्र विजय की कामना करनी चाहिए, लेकिन हमारा विद्यार्थी हमें पराजित कर दे तभी शिक्षा सफल होगी. जब कोई अध्यापक अपने विद्यार्थी से पराजित होने की कामना करता है, तो उसका उद्देश्य होता है शिक्षक ने ज्ञान की सीमा जहां तक खींची है, विद्यार्थी उसे और विस्तृत करेगा, अपने अध्ययन से नये सिद्धांत, नीतियां प्रतिपादित करेगा और नये तथ्य एवं सत्य का उद्भेदन करेगा. इसीलिये जब कोई शिष्य अपने गुरु को अपनी ज्ञान गंगा के आवेग एवं गहराई से अचंभित कर देता है,  तो गुरु की छाती फूल जाती है.

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गुरु भी दो प्रकार के होते हैं एक शिलाधर्मी और दूसरा आकाशधर्मी. भारतीय मनीषा में शिलाधर्मी गुरु त्याज्य है क्योंकि वह विदयार्थियों पर लद जाता है और दंभ के साथ कहता है कि मैं जो कहता हूं, वही तुमको मानना पड़ेगा. यदि ऐसे गुरु का कहा ही सत्य है, तो फिर विद्यार्थी को आगे सोचने, समझने, अध्ययन करने और विकास के नये आयाम तलाशने की क्या आवश्यकता होगी?

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इसीलिए हमारे यहां जिस आदर्श गुरु की कल्पना की गयी है,  उसे आकाशधर्मी संज्ञा दी गयी है. जिस प्रकार आकाश सभी वनस्पतियों को उनकी क्षमता के अनुरूप विकसित होने का अवसर प्रदान करता है, उसी प्रकार आकाशधर्मी गुरु अपने विद्यार्थियों को उनकी प्रतिभा एवं क्षमता के अनुरूप विकसित होने का समान और संपूर्ण अवसर प्रदान करता है. दुर्योग से स्वतंत्र भारत में ऐसे गुरुओं की संख्या तेजी से बढ़ी है, जो शिष्यों के वित्त का अपहरण तो करते हैं, किंतु उनके चित्त का अपहरण आवश्यक नहीं समझते हैं.

यही कारण है कि आज वे अपने शिष्यों की श्रद्धा अर्जित नहीं कर पा रहे हैं. शिक्षकों को यह तथ्य आत्मसात करना होगा कि केवल पद से सम्मान प्राप्त नहीं होता. विद्यार्थी केवल इसलिये सम्मान नहीं देंगे कि वह केवल शिक्षक है. शिक्षकों में कुछ ऐसी विशेषताएं होनी चाहिए जिससे शिष्यों के मन में श्रद्धा उत्पन्न होती रहे. जब तक हमारा शिक्षक वर्ग नयी-नयी विशेषताएं अर्जित करता रहेगा, हमारे विद्यार्थी श्रद्धावनत होते रहेंगे,  तब तक भारतीय शिक्षा परंपरा का मूल समाप्त नहीं होगा.

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