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स्मैश द पैट्रियार्की मतलब पितृसत्ता को ध्वस्त करो

Nidhi Nitya

मैं उसके बारे में अभी किसी तरह की जल्दबाजी में निर्णय नहीं लेना चाहती. उसकी अपनी लड़ाई है. सही-गलत तो सिद्ध होता रहेगा. शायद इसमें वर्षों बीत जाये. उस पर लगे आरोप भी बदलते रहेंगे.

फिलहाल उसे ड्रग्स लेने के मामले में जेल भेजा गया है. जिसके लिए जांच की जाये तो आधा बॉलीवुड, बिज़नेस क्लास, स्टूडेंट्स और अन्य भी अपराधी घोषित किये जा सकते हैं. हां उसका ड्रग्स लेना कोई तारीफ की बात नहीं. ना ही उसकी लाइफ स्टाईल मेरी सराहना का विषय है.

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कुछ सराहा जा सकता है, तो अपने अस्तित्व को बचाने के उसके हिम्मत भरे प्रयासों को. वो टूटी नहीं सामना कर रही है. उसने जो भी सही-गलत भूतकाल में किया उसे फेस करने तैयार है. उसके अपने लॉजिक हैं और वो उनके साथ कानून को जवाब दे रही है.

उसकी जगह हम होते तो, हम सब भी यही कर रहे होते.

पिछले तीन-चार महीनों से वो पूरी हिम्मत के साथ मुंबई, बिहार और सीबीआइ सहित सभी जांच एजेंसियों को जवाब दे रही है. वो लड़की जिस पर चरित्रहीनता के साथ-साथ अपने बॉयफ्रेंड की हत्या या आत्महत्या के लिए प्रेरित करने के आरोप एक बड़े तबके के द्वारा लगाये जा रहे हैं. वो लड़की सामान्य बनी हुई है. लड़की साहसी भी है.

इस लड़की की हिम्मत को सलाम. वो अपनी टी-शर्ट पर लिखती है

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“स्मैश द पैट्रियार्की”

मतलब

“पितृसत्ता को ध्वस्त करो”

उसकी लड़ाई किस दिशा में जाएगी मैं नहीं जानती. वो सजा पायेगी या बरी होगी. उसमें मुझे तनिक भी दिलचस्पी नहीं. मेरी दिलचस्पी उस संदेश में है जो उसकी टी-शर्ट पर लिखा है. जब उसे रिमांड पर लिया गया, उसने पहन रखी थी.

कमाल की बात है. मैं इन दिनों अपने आसपास महज स्त्रियों को ही नहीं बल्कि पुरुषों को भी पितृसत्ता और पुराने बोए गये सामाजिक बबूलों को काटते हुए देख रही हूं. मैं ऐसे बहुत से पुरुषों को देख रही हूं, जिन्होंने परंपरागत पुरुष बने रहने से इनकार कर दिया है. अब मैं ऐसे पुरुषों को देख रही हूं, जो स्त्रियों के हित और सम्मान के लिए समाज के सामने आ खड़े हुए हैं. और कहीं-कहीं तो आगे निकलकर स्त्रियों को ही जगाने के प्रयास में लगे हुए हैं. मेरे मन में बहुत आदर है उन सभी के लिए.

साधुवाद उन सभी स्त्री-पुरुषों को जो समाज और सोच को बंधन मुक्त बनाने की पहल के सजग सारथी बने हुए हैं.

तो…

“स्मैश द पैट्रियार्की”

मतलब

“पितृसत्ता को ध्वस्त करो”

सिर्फ़ स्त्रियों की नहीं. अब पुरुषों की भी आवाज़ है. आवाज़ उठती रहे, बात उठती रहे.

अब बदलाव लाज़मी है.

 

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