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मनरेगा में धीमी हो गई काम की रफ्तार: फंड की कमी बना कारण

लंबित है भुगतान, मजदूरी दर भी कम

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Ranchi: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के तहत ग्रामीण क्षेत्र के हर घर को साल में 100 दिन का काम मिलने के कानूनी अधिकार दिये गये है. लेकिन योजना के संचालन में इसका ध्यान नहीं दिया जा रहा है. झारखंड जैसे राज्य में मनरेगा मजदूरों की कम मजदूरी भी योजना को अरूचिकर बना रही है. ऊपर से फंड की कमी और भुगतान लंबित रहना भी बड़ी समस्या बनती जा रही है. योजना के गौण होने का कारण जो सामने आ रहा है, उसमें पहला फंड के आवंटन की कमी, दूसरा समय पर मजदूरी भुगतान नहीं होना, और तीसरा कई राज्यों में मनरेगा मज़दूरी न्यूनतम मज़दूरी से भी कम होना रहा है.

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फंड के आवंटन में कमी

कुल मिलाकर पिछले सालों की बकाया मजदूरी 8707 करोड़ रूपये है. इस बकाया मज़दूरी के साथ, अगर हर दिन 255.08 रुपयों के औसत से हिसाब किया जाए तो 2018-19 में मनरेगा के लिए कम से कम 74,805 करोड़ रुपयों के बजट की ज़रुरत है. लेकिन मनरेगा के वेबसाइट के मुताबिक, इस वित्तीय वर्ष में केवल 50,480 करोड़ रुपयों (पिछले वर्ष की बकाया राशि को अगर निकाल दिया जाए) का आवंटन किया गया है. 22 अक्टूबर 2018 तक, 39,825 करोड़ रूपए खर्च हो चूके है और वित्तीय वर्ष पूरे होने में अभी भी 5 महीने बचे हैं, जबकि कुल आवंटन का 86% खत्म हो चुका है. ऐसे में यह मज़दूरों के लिए यह बेहद चिंताजनक विषय है.

सरकार का दावा गलत

पिछले दो सालों से वित्तमंत्री कहते आ रहे है कि, ”इस भाजपा सरकार ने मनरेगा के तहत सबसे ज़्यादा बजट निर्धारित किया है.” आंकड़े इसे गलत सबित करते हैं. देश में मनरेगा में राशि का आवंटन लगातार घटता जा रहा है. स्वतंत्र अर्थशास्त्रियों के शोध के अनुसार, इस कार्यक्रम को सक्षम रूप से चलने के लिए कम से कम GDP के 1.7 % प्रतिशत का आवंटन अनिवार्य है. मगर पिछले 5 सालों में GDP के केवल 0.25% के हिसाब से मनरेगा में फंड आवंटित हुए. 2018-19 का इन्फ्लेशन अडजस्टेड आवंटन, 2010-11 से भी काफी कम है और यह विशेष रूप से शर्मनाक और अपमानजनक है, क्योंकि केंद्र सरकार निरंतर यह कह रही है कि कर (टैक्स) में बढ़ोती हो रही है. अगर टैक्स में वाकई बढ़ोतरी हो रही है तो मनरेगा में राशि के आवंटन में बढ़ोतरी अखिर क्यों नहीं हुई. ऐसे में एक बड़ा सवाल योजना को लेकर सरकार पर खड़े होते हैं.

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पिछले कुछ सालों से यह देखा जा रहा है कि, वित्तीय साल के पहले 6 महीनों में ही मनरेगा का ज़्यादातर बजट खत्म हो जाता है. इससे दो प्रमुख समस्याएं सामने आती हैं- पहला यह कि, ब्लॉक स्तर के प्रशासन कर्मचारी, मज़दूर के काम की मांग को दर्ज ही नहीं करते हैं. दूसरी बड़ी परेशानी यह है कि, मज़दूरों को मज़दूरी भुगतान नहीं मिल पाता. उनका भुगतान लंबित ही रह जाता है. इतने कम और अपर्याप्त बजट आवंटन की वजह से मनरेगा में लेबर बजट के अनुसार जितना काम होना चाहिए, उससे काफी कम काम हो रहा है.

लंबित भुगतान की समस्या और मजदूरी दर में कटौती

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मनरेगा कार्यक्रम के लिए आवंटित राशि की कमी (एक बहुत गंभीर समस्या है, जो साल दर साल होती है और जिसके समाधान के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे हैं) एवं केंद्र व राज्य सरकारों की प्रशासनिक लापरवाही के कारण करोड़ों रूपये का मज़दूरी भुगतान लंबित है. इन भुगतानों के लिए फंड ट्रांसफर ऑर्डर (FTO) को प्रथम व द्वितीय हस्ताक्षरियों द्वारा स्वीकृत कर दिया गया है. लेकिन ये केंद्र सरकार के स्तर पर लंबित हैं.

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मनरेगा में भुगतान से संबंधित केवल राज्य स्तरीय प्रक्रिया गिनी जाती है. जबकि केंद्र सरकार व भुगतान करने वाली वित्तीय संस्थाओं (जैसे बैंक) के स्तरों पर होने वाली प्रक्रियाओं (FTO के द्वितीय हस्ताक्षरी द्वारा स्वीकृति के बाद और मज़दूरों के खातों में मज़दूरी जमा होने तक) में हो रही देरी की गणना नहीं की जाती है. इसलिए, केंद्र सरकार के स्तर पर हो रही यह व्यापक देरी, मजदूर के लंबित भुगतान के आंकड़ों में दर्ज ही नहीं हो रही है.

केंद्रीय स्तर पर हो रही देरी आंकड़ों में शामिल नहीं

2017 में लंबित भुगतान की समस्या और उससे जुड़ी केंद्र सरकार द्वारा मुआवज़ा की गणना के गलती के परिमाण को समझने के लिए एक शोध किया गया था. इस शोध को सही स्वीकार करने के पश्चात, वित्त मंत्रालय ने 21 अगस्त, 2017 को एक मेमोरेंडम निकाला था. उस मेमोरेंडम में वित्त मंत्रालय ने कबूल किया है की “MIS में केंद्र सरकार से मज़दूरी देने में हो रही देरी का हिसाब नहीं किया जा रहा है. हर रोज़ 10 लाख से 15 लाख पे-आर्डर ज़ारी हो रहे हैं. और समय पर मज़दूरी नहीं दे पाने का प्रमुख कारणों का उल्लेख किया – (1) मनरेगा में राशि के आवंटन की कमी (2)आधारभूत संरचना के कारण आ रही बाधायें, और (3) प्रशासनिक जिम्मेवारी के अनुपालन में लापरवाही.”

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इसके जवाब में 19 मई 2018 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहा गया कि – “हम[सुप्रीम कोर्ट] यह बिलकुल स्वीकार नहीं कर सकते हैं कि, FTO के दूसरे हस्ताक्षर के बाद केंद्र सरकार की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है. केंद्र सरकार को तुरंत मज़दूरी भुगतान का इंतज़ाम करना चाहिए और इसमें ज़रा भी विलम्ब हुआ तो मज़दूर को पूरा लंबित भुगतान का मुआवज़ा देना चाहिए. मज़दूर के खाते में पैसा जमा होने तक मुआवज़े का हिसाब करना चाहिए. केंद्र सरकार को अपनी ज़िम्मेदारी का उल्लंघन नहीं करना चाहिए और एक असहाय मज़दूर का फायदा नहीं उठाना चाहिए.”

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