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Skill development  व पंचायती राज की परस्पर भागीदारी से निकलेंगे रास्ते, स्किल मैपिंग है जरूरी : RP सिंह

Ranchi : कोरोना संकट के बीच अब तक चार लाख से अधिक श्रमिक झारखंड लौट चुके हैं. राज्य सरकार मनरेगा के जरिये उन्हें सबल करने का जतन कर रही है. पर सबों को उनके हुनर के हिसाब से मौका दे पाना मुश्किल लग रहा है. राज्य ग्रामीण विकास संस्थान (सर्ड) और स्किल डेवलपमेंट मिशन के पूर्व निदेशक आरपी सिंह के अनुसार स्किल डेवलपमेंट मिशन और पंचायतों के सामूहिक प्रयास से एक सकारात्मक पहल हो सकती है.

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न्यूजविंग से बातचीत में उन्होंने कहा कि मिशन और पंचायती राज की भूमिका तत्काल स्किल मैपिंग के लिए तय करने की जरूरत है. वापस लौटे श्रमिक तुरंत वापस नहीं लौटने वाले हैं. उनकी क्षमता, रुचि और संख्या को जानने का यह एक अच्छा समय है. इससे राज्य सरकार को योजना निर्माण में भी मदद मिलेगी.

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झारखंड कौशल विकास मिशन अपने उद्देश्य से पिछड़ता दिखता है. यहां पूर्ण कालिक टाइम ना तो एमडी हैं और ना ही सीइओ. एमडी तीन तीन पदों की जिम्मेदारी उठा रहे हैं. मिशन का अपना प्रोपर सेटअप 15 फीसदी भी नहीं है.

दूसरे राज्यों की तुलना में यह बेहद पीछे चल रहा है. कोरोना संकट के बीच वापस लौटे मजदूरों की स्किल मैपिंग का काम अभी किया जाना चाहिये था. उसके पास स्किल मैपिंग के काम के लिए अपने रिसोर्सेज नहीं हैं. पंचायत प्रतिनिधियों के माध्यम से यह काम हो सकता था. कुछ प्रतिनिधियों को मजदूरों का डाटा तैयार करने का बुनियादी तरीका बताया जा सकता था.

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पंचायतों की भागीदारी

जो श्रमिक वापस लौटे हैं, उनकी योग्यता और उनकी संख्या का वास्तविक डाटा संग्रह करने में पंचायतों को जोड़ा जाना चाहिये. राज्य में लगभग साढ़े चार हजार पंचायतें हैं. पंचायत प्रतिनिधियों को अपने ग्रामीण परिवेश की अच्छी समझ होती है. इसके साथ-साथ एनजीओ को भी सपोर्टिंग काम में जोड़ा जा सकता है. श्रमिकों की फॉर्म भरने, उसे बैंक से या सरकारी योजना से मदद लेने में मदद करने जैसे कामों में लगाया जा सकता है. वास्तव में अभी राज्य सरकार को यह पता चलना चाहिये कि उसके पास किस किस स्किल के कितने लोग हैं.

मनरेगा नहीं है इकलौता समाधान

वापस लौटने वाले कामगारों में सभी मनरेगा में रुचि नहीं दिखलायेंगे. पेंटर, राजमिस्त्री, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन और यहां तक कि इंजीनियरिंग की नौकरी करने वाले अनस्किल्ड कामों में नहीं लगेंगे. सात-आठ साल पहले तक मनरेगा बजट 90 हजार से एक लाख करोड़ का वार्षिक हुआ करता था. जो अब लगभग आधा हो चुका है.

साथ ही वेज रेट भी बढ़ा है. ऐसे में केवल मनरेगा योजना से ही बात नहीं बनने वाली. काम का मौका नहीं मिलने पर रिवर्स माइग्रेशन का समय शुरू हो जायेगा. स्किल्ड लोगों को आत्मनिर्भर बनाने को उन्हें बैंक से या सरकारी स्तर से मदद दिलानी होगी. 50 हजार से 1 लाख रुपये या इसी तरह से छोटी राशि की मदद देकर उन्हें स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ाया जा सकता है.

हॉस्पिलिटी सेक्टर में काम करने वाले किसी युवा को अगर थोड़ी पूंजी मिल जाये तो वह खुद से ढाबा, रेस्टूरेंट खोलकर रास्ता बना सकता है. स्किल्ड लोगों को सपोर्ट देने को पैसे की जरूरत राज्य सरकार को भी होगी. उसे केंद्र से और अधिक आर्थिक मदद लेने के लिए तार्किक और व्यावहारिक योजना बनानी होगी.

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