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झारखंड सरकार के खर्च पर ब्रिटेन में उच्च शिक्षा हासिल करेंगे छह आदिवासी छात्र

Ranchi : झारखंड के जनजातीय समाज के युवा अब इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म पर अपनी चमक बिखेरने को तैयार हैं. खासकर ब्रिटेन की यूनिवर्सिटियों में उच्च शिक्षा के जरिये. इसके जरिये ना सिर्फ वे अपने हुनर को निखारेंगे बल्कि देश दुनिया में अपनी काबिलियत से बदलाव का किस्सा भी लिखेंगे. राज्य सरकार ने मरांग गोमके जयपाल सिंह मुण्डा ओवरसीज स्कॉलरशिप के जरिये आदिवासी युवाओं के सुनहरे करियर को साकार करने की ठानी है

 

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हर साल 10 प्रतिभाओं को अवसर

राज्य सरकार ने 29 दिसंबर, 2020 को जयपाल सिंह मुण्डा ओवरसीज स्कॉलरशिप स्कीम के बारे में फैसला लिया था. इसके जरिये हर साल 10 प्रतिभाशाली आदिवासी स्टूडेंट्स को ब्रिटेन के टॉप 15 यूनिवर्सिटियों में 22 अलग-अलग कोर्सों के जरिये मास्टर या एमफिल कोर्स सरकारी खर्चे पर कराये जाने की सहमति बनी थी. 29 दिसंबर को सीएम हेमंत सोरेन ने इस संबंध में औपचारिक घोषणा करते हुए जानकारी भी दी थी. 7 मार्च, 2021 को इस संबंध में औपचारिक नोटिफिकेशन भी जारी हुआ.

 

नोटिफिकेशन के बाद मेधावी ट्राइबल स्टूडेंट्स की तलाश शुरू हुई. अब इसी महीने (सितंबर में) इस स्कॉलरशिप के लिये पहला बैच तैयार कर लिया गया है. इनमें 6 स्टूडेंट्स हैं. 23 सितंबर को हेमंत सोरेन के हाथों इन्हें औपचारिक तौर पर सम्मानित किये जाने का कार्यक्रम है. केंद्र सरकार अपने स्तर से एससी, एसटी वर्ग के 20 स्टूडेंट्स को विदेशों में पढ़ाई के लिये स्कॉलरशिप देती रही है. पर किसी राज्य सरकार से स्तर से ट्राइबल स्टूडेंट्स को ब्रिटेन में उच्च शिक्षा के लिये स्कॉलरशिप दिये जाने का संभवतः यह पहला प्रयास है.

 

जयपाल सिंह ने जनजातीय समाज को दिलायी थी पहचान

मरांग गोमके जयपाल सिंह मुण्डा को जनजाति समाज का पहला मेधावी स्ट्डेंट माना जाता है, जो विदेश में जाकर पढ़े थे. संत जॉन्स ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में 1922 में उन्होंने पॉलिटिक्स, फिलॉसफी, इकोनॉमिक्स में बीए किया था. अब इसके 100 सालों बाद झारखंड से ट्राइबल क्लास के 6 स्टूडेंट्स ब्रिटेन की टॉप 5 यूनिवर्सिटी में उच्च शिक्षा हासिल कर राज्य का नाम रोशन करेंगे.

 

जनजातीय विरासत को संवारने, आगे बढ़ाने की भूमिका 

जयपाल सिंह मुण्डा ओवरसीज स्कॉलरशिप के लिये सिलेक्टेड 6 स्टूडेंट्स कहते हैं कि इस स्कॉलरशिप के लिये मौका मिलना बेहद सम्मानजनक है. अपनी पढ़ाई के बाद मिले अनुभवों का उपयोग वे जनजाति समाज की भाषा, संस्कृति, पर्यावरण, माइनिंग एरिया में रहने वालों के जीवन स्तर में बदलाव और दूसरे पहलुओं पर काम करेंगे.

हरक्यूलस सिंह मुण्डा बीआइटी मेसरा के स्टूडेंट रहे हैं. आउटलुक ग्रुप, दिल्ली में नौकरी भी की है. ट्राइबल भाषा में ट्राईलिंगो नाम का डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म भी ट्राइबल स्टूडेंट्स के लिये शुरू किया था. अब वे लंदन यूनिवर्सिटी में लिंग्विस्टिक्स में एमए करेंगे. उन्हें भरोसा है कि ट्राइबल भाषाओं के विकास में वे कुछ रोल अदा कर पायेंगे.

आकांक्षा मेरी बलमुचू चक्रधरपुर की हैं. बेंगलुरु से बायोटेक में अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की हैं. अब वे लफबेरो यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड से क्लाइमेट चेंज साइंस एंड मैनेजमेंट में उच्च शिक्षा प्राप्त करेंगी. अंजना प्रतिमा डुंगडूंग मूलतः गुमला की हैं. खड़िया समाज की हैं. पॉलिटिकल साइंस में रांची से ग्रेजुएशन की हैं. अब वारविक यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड से इंटरनेशनल रिलेशंस में एमएससी करेंगी.

दिनेश भगत किसान परिवार से हैं. सरस्वती शिशू मंदिर, धुर्वा (रांची) से स्कूलिंग की है. संत जेवियर कॉलेज, रांची से जियोलॉजी में ग्रेजुएशन. अब ससेक्स यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड से एमएससी-क्लाइमेट चेंज, डेवलपमेंट एंड पॉलिसी में एमएससी करेंगे. प्रिया मुर्मू मीडिया बैकग्राउंड से रही हैं. एमबीए भी किया है. अब लफबेरो यूनिवर्सिटी, इंग्लैंड से क्रिएटिव राइटिंग एंड द राइटिंग इंडस्ट्रिज में एमए करने का मौका मिलेगा. उन्हें यकीन है कि इससे कम्युनिटी लिटरेचर को एक्सपोजर मिलेगा. अजितेश मुर्मू संथाल के आदिवासी समाज से हैं. स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर, नई दिल्ली से आर्किटेक्चर की पढ़ाई की है. अब यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन से बायो-इंटीग्रेटेड डिजाइन में एम आर्च करने का मौका मिला है.

 

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