Opinion

भारत-चीन सीमा पर कारगिल जैसे हालात, नरेंद्र मोदी सरकार की विदेश नीति की बड़ी विफलता

Soumitra Roy

ये कोई दो साल पहले की बात है. लेह से पेंगांग त्सो लेक तक 12 घंटे के सफर के बाद देर शाम तंबू के बाहर सुस्ता रहा था. साथ में थे शेरपा धन सिंह थापा.

कड़कती ठंड. मैंने यूं ही धन सिंह से पूछ लिया- ये उत्तर की ओर से आ रही आवाजें कैसी हैं ? धन सिंह ने इधर-उधर देखा (ताकि कोई सुन न ले) फिर धीरे से कहा- ये चीनी गाड़ियों की आवाजें हैं. वहां सड़क बनी है. मेरे कौतूहल को और बढ़ाते हुए उसने कहा ये चीनी हमारे एरिया में घुसना चाहते हैं, ताकि हम पर नजर रख सकें.

आज जब धन सिंह को फोन कर हालचाल पूछा तो जवाब मिला- कारगिल जैसी हालत है सर.

14 हजार फीट की ऊंचाई पर पेंगांग त्सो झील की सैर करनेवालों में से बहुतों को उत्तर की ओर ताड़ के पेड़ जैसे पहाड़ नजर आते हैं. बेहद दुर्गम इलाका और तापमान गर्मियों में भी माइनस पर. ऊपर से ऑक्सीजन की कमी.

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इन पहाड़ों को फिंगर एरिया कहते हैं. इस इलाके का कोई नक्शा भारत और चीन दोनों के पास नहीं है. भारत कहता है कि लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी फिंगर 8 से शुरू होता है, वहीं चीन का कहना है कि यह फिंगर 2 से शुरू होता है.

फिंगर 2 में भारतीय सेना तैनात है. वहां से चीनी सेना की हर हरकत नजर आती है.

आप यह जान कर हैरान होंगे कि कारगिल ऑपरेशन के दौरान जब भारतीय सेना पाकिस्तान से लड़ रही थी, चीन ने फिंगर 4 तक एक सड़क बना ली. जवाब में भारतीय सेना भी कुछ सालों से फिंगर 2 से एक सड़क बना रही है.

यह सड़क इसलिए जरूरी है, क्योंकि अगर चीनी सेना अंदर घुसी तो अभी भारतीय जवानों को मोर्चे तक आने में 3 घंटे लग जाते हैं, जबकि चीनी सेना के लिए सड़क से टैंकों और बख्तरबंद गाड़ियों के साथ आना महज 40 मिनट का काम है.

असल मसला यहीं पर है. भारत के सड़क बनाने से नाराज चीन ने फिंगर 3 पर बंकर बना लिये हैं.

चीन का इरादा क्या है?

दरअसल चीन फिंगर 4 के पश्चिम में करीब 16,000 फीट ऊंचाई तक घुसना चाहता है. ये बेहद नाजुक और रणनीतिक स्थान है, क्योंकि वहां से चीन को लुकुंग में भारतीय सेना की पेट्रोलिंग बोट्स ही नहीं, पेंगांग के उत्तर में मार्समिकला तक का पूरा नजारा दिखेगा.

विवाद की जड़ कहां है?

एलओसी, एलएसी और अब सीसीएल, यानी चाइनीज क्लेम लाइन. लद्दाख के गलवान घाटी से 80 किलोमीटर दक्षिण पूर्व में भारत का गोगरा पोस्ट है. इसे पेट्रोल पॉइंट 14, 15 से भी जानते हैं. इसी इलाके में चीनी सेना 3 किलोमीटर अंदर तक घुस आयी है. यह पेंगांग त्सो और हलवन घाटी के बीच का हिस्सा है.

हालांकि चीन का कहना है कि वह अपने सीसीएल की हद में ही है. पर सीसीएल भी एक दावा है, जिसका कोई आधार नहीं. चीनी सैनिकों के साथ सड़क बनानेवाली भारी मशीनें और साजो-सामान है. मकसद है भारत को सड़क बनाने से रोकना.

मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है चीन के अभी 5000 सैनिक वहां मौजूद हैं. जवाब में भारत भी मिरर डिप्लॉयमेंट, यानी जितने तुम्हारे, उतने ही हमारे के अनुसार सैनिकों की तैनाती कर रहा है. ये तैनाती भी स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जवानों से की जा रही है, क्योंकि बाहर से जवानों को बुलाने में हाई ऑल्टीट्यूड एक्लेमेटाइजेशन करवाना होता है, यानी एक हफ्ता चाहिए.

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सेना और रक्षा मंत्रालय चाहे जितना नकारे, तनाव चरम पर है. लेकिन कुछ सवाल यहां बेहद अहम हैं-

  1. मोदी के आने के बाद भारत-चीन के रिश्ते वड़नगर तक जा पहुंचे. झूला झूलने तक की रस्में हुईं. लेकिन सीसीएल और एलएसी का मसला क्यों नहीं सुलझाया जा सका?
  2. गृह मंत्रालय ने बिना सोचे-समझे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का नया नक्शा जारी कर एलएसी को नकार कर अक्साई चीन को भारत का हिस्सा बताया था. अब चीन के साथ गतिरोध दूर करने में बातचीत कैसे हो पायेगी?
  3. चीन की नेपाल के साथ नजदीकी को भारत का विदेश मंत्रालय दूर नहीं कर पाया है. अब लिपुलेख विवाद शुरू हो गया है. भारत की सरकार क्या सीमा पर दुश्मन बढ़ाने की कोशिश में है?
  4. व्यापार और राष्ट्रीय संप्रभुता दोनों अलग हैं. यह परस्पर विवाद के बीच चोरी-छिपे इरान से तेल खरीदने का अंबानी टाइप का खेल नहीं है. मोदी सरकार अपनी विदेश नीति कब बनायेगी?
  5. सबसे आखिरी दो-टूक सवाल: कारगिल एक भयंकर चूक थी. देश ने इसकी बड़ी कीमत उठायी है. क्या मोदी सरकार अपने स्वार्थ के लिए कारगिल जैसा दूसरा युद्ध चाहती है?

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(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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