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Sir Ratan Tata ने की थी पाटल‍िपुत्र में खुदाई के ल‍िए फंड‍िंग, म‍िला था राजा अशोक का स‍िंंहासन कक्ष, ये रही पूरी कहानी

Rakesh Ranjan
Jamshedpur: आज हम आपको बता रहे हैं उस शख्‍स के बारे में ज‍िसने टाटा समूह को न केवल ऊंचाईयां दी बल्‍क‍ि साथ में भारतीय इत‍िहास, कला और संस्‍कृत‍ि के संरक्षण में भी महती भूमि‍का न‍िभायी. नाम था सर रतन टाटा. सर रतन टाटा ने ही पाटल‍िपुत्र में खुदाई के ल‍िए फंड‍िंंग की थी. यह भारत की पहली पुरातात्‍व‍िक खुदाई थी. खुदाई में राजा अशोक के सिंहासन कक्ष की खोज के साथ ही राष्ट्रीय महत्व की कई और कलाकृतियांं म‍िलीं. 1913 से 1917 के बीच हुई खुदाई में सम्राट अशोक का 100 स्तंभों वाला मौर्यकालीन दरबार मिला था. वर्ष 1912 में सर रतन ने बिहार और उड़ीसा के तत्कालीन उपराज्यपाल सर हरकोर्ट बटलर से किसी भी पुरातात्विक उत्खनन को वित्तपोषित करने की इच्छा व्यक्त की थी और उसके बाद खुुदाई हुई थी.

खुदाई में सिक्कों, पट्टिकाओं और टेराकोटा जैसे संग्रहालयों की एक अच्छी संख्या का पता चला. इसे पटना में संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है. सर रतन टाटा का जन्म 20 जनवरी 1871 में बंबई (अब मुंबई) में हुआ था. बंबई के सेंट जेवियर कालेज में अध्ययन कर पिता की योजनाओं को सफल बनाने में भाई की पूरी सहायता की. वर्ष 1904 में पिता की मृत्यु के बाद इन्हें और इनके भाई सर दोराब जी और जमशेद जी टाटा को अपार वैभव और संपदा उत्तराधिकार में प्राप्त हुई. टाटा एंड कंपनी के साझीदार होने के साथ ही ये इंडियन होस्टल्स कंपनी लिमिटेड, टाटा लिमिटेड, टाटा आयरन एंड स्टील वर्क्स साकची, दी टाटा हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर सप्लाई कंपनी लिमिटेड इंडिया के डाइरेक्टर भी थे.

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महात्‍मा गांधी को आंदोलन के ल‍िए की आर्थ‍िक मदद
पिता से प्राप्त संपत्ति‍ का सर रतन टाटा ने औद्योगिक विकास के कार्यों के साथ-साथ समाजसेवा के कार्यों में उपयोग किया. 1912. में लंदन स्कूल ऑफ इकानॉमिक्स में अपने नाम से सामाजिक विज्ञान और शासन का एक विभाग स्थापित किया. उसी वर्ष निर्धन छात्रों की स्थितियों के अध्ययन के ल‍िए लंदन विश्वविद्यालय में एक रतन टाटा फंड की भी स्थापना की. इनके नाम से एक दानकोश की भी स्थापना हुई. इनका देहांत 5 सितंबर 1918 में कार्नवाल में हुआ. दक्षिण अफ्रीका के ट्रांसवाल में एक प्रैक्टिसिंग बैरिस्टर के रूप में महात्मा गांधी ने प्रचलित शासन के तहत एशियाई लोगों और विशेष रूप से भारतीयों की दुर्दशा के विरोध में एक असहयोग आंदोलन का नेतृत्व किया.  आंदोलन संचा‍ल‍ित करने के ल‍िए मौद्रिक सहायता समय की आवश्यकता थी और सर रतन टाटा ने गोपाल कृष्ण गोखले के आग्रह का उदारतापूर्वक जवाब दिया. 1909 और 1913 के बीच 1.25 लाख रुपये द‍िए  जिससे महात्मा दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के अधिकारों के लिए अपनी लड़ाई जारी रख सकें.

सर रतन टाटा कला संग्रह

सर रतन टाटा कला और संस्कृति के पारखी थे. वह एक विपुल यात्री भी थे, जिसने भारत में कई स्थानों का दौरा किया. चित्रों, प्राचीन साहित्य की पांडुलिपियों के अलावा दुर्लभ भारतीय शॉल और पुराने भारतीय हथियार जैसे खंजर, बंदूकें और तलवारें प्राप्त करने के लिए. उन्होंने पेरिस की अपनी यात्राओं के दौरान फूलदानों, इत्र की बोतलों और सजावटी आकृतियों का एक संग्रह खरीदा. इंग्लैंड के ट्विकेनहैम में उन्होंने 17वीं सदी की एक आलीशान हवेली खरीदी. यह एक पारंपरिक लाल ईंट की संरचना थी जो एक फ्रांसीसी शैटॉ फ्रंटेज के साथ अपने ही मैदान में स्थापित थी. इसे ‘यॉर्क हाउस’ कहा जाता है. यह इंग्लैंड में रहने के दौरान सर रतन टाटा और लेडी टाटा का निवास था.  ओरिएंट के अपने दौरे पर उन्होंने नीले और सफेद चीन और हाथीदांत में जापानी दीवार पर लटकने वाले गहने खरीदे. 1919 में लगभग 5 लाख रुपये मूल्य के इस संग्रह को सर रतन की वसीयत के निर्देशों के अनुसार, 1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय, बॉम्बे को सौंप दिया गया था. पूरे संग्रह को संग्रहालय में सुदूर पूर्वी कला खंड में प्रदर्शित किया गया है और कला में सर रतन के उत्कृष्ट स्वाद और निश्चित रूप से उनकी उदारता की गवाही देता है.

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