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Sir Dorabji Tata Death Anniversary: ज‍िनके नेतृत्‍व में टाटा स्टील भारत में निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी स्टील कंपनी बन गई

Jamshedpur: आज उस महान शख्‍सि‍यत की पुण्‍यत‍िथ‍ि है ज‍िन्‍होंने अपने पि‍ता के सपनों को साकार क‍िया और उनके नेतृत्‍व में टाटा स्‍टील भारत में न‍िजी क्षेत्र की सबसे बड़ी स्‍टील कंपनी बन गई. 27 अगस्त 1859 को जन्मे सर दोराबजी टाटा टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी टाटा के जेठा थे. सर दोराबजी टाटा को न केवल अपने पिता का व्यवसाय कौशल विरासत में मिला बल्कि उनकी निस्वार्थता और समाज को वापस देने की भावना भी विरासत में मिली.

1897 में सर दोराबजी टाटा ने एचजे भाभा की बेटी मेहरबाई से शादी की, जो एक उत्साही और संवेदनशील महिला थीं. उन्‍हें अंग्रेजी साहित्य और पियानो बजाने का शौक था. अपने पति की तरह उन्होंने भी महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा, पर्दा प्रथा और छुआछूत जैसे मुद्दों के लिए काम किया. उन्होंने भारत को अंतर्राष्ट्रीय महिला परिषद से भी परिचित कराया.

खेलों को द‍िया बढ़ावा
27 मई 1909 को सर दोराबजी टाटा ने भारतीय विज्ञान संस्थान बैंगलोर की स्थापना की और 1912 में संस्थान को दान दिया. कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय को आर्थ‍िक मदद दी और भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च में संस्कृत अध्ययन के लिए टीम का गठन क‍िया.  सर दोराबजी टाटा का खेलों के प्रति प्रेम उनकी परोपकारी गतिविधियों से झलकता है. 1919 में उन्होंने एंटवर्प खेलों में भाग लेने के लिए चार एथलीटों और दो पहलवानों की सुविधा प्रदान की. भारतीय ओलंपिक परिषद के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने 1924 के पेरिस ओलंपियाड के लिए भारतीय दल को वित्तपोषित किया.
धन का अचनात्‍मक अनुप्रयोग में व‍िश्‍वास
सर दोराबजी टाटा ने अपने धन के रचनात्मक अनुप्रयोग में विश्वास किया और 1932 में नवस्थापित सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट को अपना पूरा भाग्य प्रदान किया. इसमें टाटा संस, इंडियन होटल्स और संबद्ध कंपनियों, भू-संपत्तियों और उनके 21 टुकड़ों में पर्याप्त शेयरधारिता शामिल थी. उन्होंने मुंबई में प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय को अपने चित्रों, प्रतिमा और अन्य कला वस्तुओं का संग्रह भी दान कर दिया. 3 जून 1932 को जर्मनी के बैड किसिंजेन में सर दोराबजी टाटा का निधन हो गया था.
कॉटन ड‍िवीजन से शुरुआत
सर दोराबजी टाटा एक असाधारण कल बनाने के लिए दृढ़ संकल्पित व्यक्ति थे. टाटा में कॉटन डिवीजन से शुरुआत करते हुए उन्होंने बाद में टाटा स्टील और टाटा पावर की स्थापना करके अपने पिता के सपने को पूरा किया जो आज टाटा समूह के उद्योगों के समान रूप से अभिन्न अंग हैं. उनके नेतृत्व में ही टाटा स्टील देश में निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी स्टील कंपनी बन गई. इसके तुरंत बाद उन्होंने पनबिजली, खाद्य तेल, साबुन निर्माण, निर्माण और विमानन जैसे क्षेत्रों में कदम रखा. ब्रिटिश भारत में उद्योगों के प्रति उनके योगदान को 1910 में मान्यता मिली जब उन्हें किंग एडवर्ड सप्तम ने नाइट की उपाधि दी. उन्होंने टाटा स्टील को बंद होने से रोकने के लिए अपनी निजी संपत्ति का वचन दिया.

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टाटा स्‍टील को बचाने के ल‍िए बेच द‍िए पत्‍नी के गहने
1920 के दशक में टाटा स्टील को बाजार में भारी गिरावट का सामना करना पड़ा. दोराबजी ने अपनी पूरी व्यक्तिगत संपत्ति गिरवी रख दी जिसमें उनकी पत्नी का गोल्‍डेन डायमंड भी शामिल था. इम्पीरियल बैंक ने उन्हें 1 करोड़ का पर्सनल लोन दिया जिसका इस्तेमाल उन्होंने कंपनी को बेल आउट करने के लिए किया. दोराबजी इस बात से अच्छी तरह वाकिफ थे कि उत्पादित हर टन स्टील हजारों लोगों की मेहनत है. उन्होंने 8 घंटे का दिन, मातृत्व अवकाश, भविष्य निधि, दुर्घटना मुआवजा और मुफ्त चिकित्सा सहायता जैसी पहल की शुरुआत की. टाटा स्टील को एक ऐसी कंपनी के रूप में माना जाता है जिसका दिल अपने लोगों के लिए धड़कता है

MDLM
Sanjeevani

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