Opinion

कड़िया मुंडा की सादगी, खूंटी और वर्तमान राजनीति

Sweta Kumari

Jharkhand Rai

झारखंड की राजनीति में एक बड़ा नाम और बीजेपी के कद्दावर नेता कड़िया मुंडा इन दिनों खासे चर्चा में हैं. ऐसे तो उनकी छवि एक ईमानदार नेता के रूप में शुरू से रही है और उन्होंने पार्टी में अनुशासन में रहकर ही सेवा की.

खूंटी से आठ बार सांसद रहे और छवि बिल्कुल बेदाग रही. साल 1971 से अपने राजनीतिक करियर की शुरूआत की. कड़िया मुंडा पर ना तो कभी परिवारवाद हावी रहा और ना ही राजनीति में इन्होंने कभी खाने-कमाने की सोची.

साफ और बेदाग छवि के साथ विवादों से कभी कोई नाता नहीं रहा. ना तो परिवार के लिए कभी भी इन्होंने चुनाव में टिकट मांगा और ना ही पार्टी के अंदर किसी लॉबी से नाम ही जुड़ा. इनके सासंद रहने के दौरान भी परिवार ने खेती करके ही जीवन चलाया.

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पार्टी ने जो भी आदेश सुनाया उसे हमेशा ही अनुशासन समझकर निभाया. लोकसभा चुनाव 2019 में इस बार 75 साल पार कर चुके कई नेताओं को बीजेपी ने टिकट नहीं दिया है उन्हीं में से एक कडिया मुंडा भी हैं.

वैसे तो कई नेताओं ने टिकट कटने पर पार्टी के सामने अपनी आपत्ति जताई और निर्दलीय लड़ने की भी बात सामने रखी. लेकिन कड़िया मुंडा ने खूंटी से टिकट कटने पर भी शालीन रहकर ही एकबार और खुद को साबित कर दिया. चूंकि इस बार पार्टी ने खूंटी से अर्जुन मुंडा को उम्मीदवार बनाया है.

1989 से 1999 तक कड़िया मुंडा पांच बार सासंद रहे. साल 2009 और 2014 में भी लोकसभा चुनाव जीते. लेकिन इस बार पार्टी ने खूंटी से अर्जुन मुंडा को खड़ा किया है.

उम्मीदवार घोषित होने के बाद अर्जुन मुंडा खूंटी गये और कड़िया मुंडा से आशीर्वाद भी लिया. दोनों के बीच क्या बातें हुईं, वह तो अंदरखाने की बात रही, लेकिन मिलने के दौरान की जो तस्वीरें वायरल हुईं. वह काफी संतोषजनक थी.

खूंटी से चुनाव लड़ने पर अर्जुन मुंडा के सामने कई तरह के चैलेंज हैं. लेकिन अपनी सीट दूसरे नेता के पाले में जोने पर भी कड़िया मुंडा के चेहरे पर शिकन नहीं दिखी. हालांकि कड़िया मुंडा ने पार्टी में कई तरह से उतार-चढ़ाव देखे.

झारखंड के गठन के बाद एक दौर वह भी आया, जब तेजी से कड़िया मुंडा का नाम मुख्यमंत्री के लिये उछला. लेकिन फिर आखिरी वक्त में बाबूलाल मरांडी को मुख्यमंत्री बनाया गया. उस वक्त भी कड़िया मुंडा ने अपनी शालीनता का ही परिचय पार्टी से सामने दिखाया.

लेकिन वह दौर ऐसा था, जब कोई भी नेता मुख्यमंत्री की लिस्ट में सबसे ऊपर हो और आखिरी दौर में किसी और के नाम पर मुहर लग जाये तो बौखलाना जाहिर है. लेकिन ऐसे दौर में भी शालीनता का परिचय देने वाले कड़िया मुंडा के लेकर यही वजह रही कि वे अटल जी के नजदीकियों में शुमार रहे.

ठीक एक बार फिर वैसी ही स्थिति इन दिनों भी देखने को मिल रही है. अर्जुन मुंडा को टिकट देने पर भी पार्टी का फरमान सिर झुकाकर मान लिया. ऊपर से अर्जुन मुंडा को जीतने का आशीर्वाद भी दिया.

भारत की राजनीति आज जिस दौर से गुजर रही है, उसमें कड़िया मुंडा जैसे लोग अपवाद होते जा रहे हैं. सादगी भरी राजनीत के दौर के कड़िया मुंडा लगभग लुप्त होती प्रजाति में हैं.

एक समय था आदिवासी नेताओं में अपने समाज और संस्कृति के अनुरूप जीने की स्वाभाविक प्रवृति थी. लेकिन पूंजी के वर्चस्व ने इस सादगी और संस्कृति पर गहरा हमला किया है.

ये लेखिका के निजी विचार हैं

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