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कोरोना का साइडइफेक्ट: पढ़ रहे लेकिन लेसन नहीं रहता याद, पढ़ाई भी अब नहीं करना चाहते बच्चे

Ranchi : कोरोना का कहर जारी है. झारखंड में भी मरीजों की संख्या कम होने का नाम नहीं ले रही है. अब कोरोना की तीसरी लहर के कहर से बच्चे परेशान हो गए है. चूंकि कोरोना ने उनकी आफलाइन पढ़ाई पर ब्रेक लगा दिया है. अब आनलाइन और आफलाइन क्लास के चक्कर में बच्चे पिस रहे हैं. इतना ही नहीं वे पढ़ाई तो कर रहे हैं लेकिन उन्हें लेसन ही याद नहीं रह रहा है. वहीं कई बच्चों ने अब पढ़ाई छोड़ने का भी मन बना लिया है. ऐसे में पैरेंट्स की चिंता बढ़ गई है. वहीं पैरेंट्स अपने बच्चों को लेकर साइकियाट्रिस्ट और साइकोलॉजिस्ट के पास काउंसेलिंग के लिए पहुंच रहे हैं.

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हर दिन आ रहे दर्जनों मामले

आनलाइन पढ़ाई में बच्चों का इंटरेस्ट कम हो गया है. ऐसे में जब भी उन्हें क्लास से ब्रेक मिल रहा है तो उनका समय नेट पर सर्फिंग करने में बीत रहा है. वे चाहकर भी अपनी पढ़ाई पर कांसेंट्रेट नहीं कर पा रहे हैं. वहीं थ्योरी पढ़ने में उनका बिलकुल भी मन नहीं लग रहा है. बच्चों का कहना है कि जब मल्टी च्वाइस क्वेश्चंस के ही उन्हें आंसर देना है तो डिटेल में पढ़ने का कोई मतलब नहीं है. ऐसे में उनका इंटरेस्ट पढ़ाई से कम हो रहा है. ऐसे ही दर्जनों मामले काउंसेलिंग के लिए हर दिन पहुंच रहे हैं.

 

ये आ रही परेशानी

-एकेडमिक से हो गए है दूर

-बिहेवियर में आ गया बदलाव

-आर्गनाइज्ड तरीके से नहीं हो रही पढ़ाई

-मोबाइल एडिक्शन से बढ़ी और परेशानी

-क्लास के दौरान भी कर रहे नेट सर्फिंग

-घट रहा कांफिडेंस लेवल

-थ्योरी पढ़ने से बच रहे बच्चे

-एंग्जाइटी और डिप्रेशन की समस्या

-पढ़ने के बाद भी मार्क्स आ रहे कम

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केस 1

क्लास पांच का एक बच्चा काउंसेलिंग के लिए आया. जिसने बताया कि आनलाइन क्लास से वह बोर हो चुका है. वह इसलिए मन लगाकर नहीं पढ़ाई कर पाता है क्योंकि पढ़ने के बाद भी उसे अच्छे मार्क्स नहीं आते है. वहीं कितनी भी पढ़ाई कर ले उसे मल्टी च्वाइस क्वेश्चंस ही एग्जाम में पूछे जाते हैं.

 

केस 2

क्लास 10 का एक स्टूडेंट एंग्जाइटी की चपेट में आ गया. पैरेंट्स उसे लेकर काउंसेलिंग के लिए आए. जहां पर उसने बताया कि तीन साल से आनलाइन और आफलाइन क्लास से वह परेशान हो चुका है. जब पढ़ाई आनलाइन हो रही थी तो एग्जाम भी आनलाइन लेना था. कोविड के चक्कर में पढ़ाई अनआर्गनाइज्ड हो गई है. मार्क्स को लेकर भी टेंशन बनी हुई है कि क्या होगा.

 

क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ भाग्यश्री कर ने बताया कि वह स्पेशली स्कूली बच्चों पर काम कर रही है. आज स्थिति यह है कि नर्सरी से लेकर हायर एजुकेशन वाले स्टूडेंट्स भी एंग्जाइटी और डिप्रेशन की चपेट में है. ऐसे में पैरेंट्स को सपोर्टिव होना पड़ेगा. बच्चों को अपने काम से टाइम निकालकर उनके साथ कुछ टाइम स्पेंड करें. काउंसेंलिंग के लिए जब बच्चे आते है तो पता चलता है कि वे किस स्थिति से गुजर रहे हैं. आइआइटी के भी स्टूडेंट्स इसी समस्या से जूझ रहे हैं.

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