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कैम्ब्रिज के लिए श्रेया हुई थीं सेलेक्ट, आर्थिक मदद नहीं मिलने से गया चांस

अब अपने मेहनत के दम पर है यूएस कंपनी में हैं साइंटिस्ट

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Ranchi: उच्च शिक्षा को देश और राज्य में बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कई घोषणाएं की, लेकिन हकीकत यह है कि विद्यार्थियों को अगर शोध कार्य के लिए विश्‍व के नामचीन विश्‍वविद्यालयों में जाने की इच्छा हो तो उन्हें लंबा इतंजार करना पड़ता है. इंतजार भी ऐसा कि जिसमें उम्मीद नहीं रखी जा सकती कि सरकार की ओर से सहायता मिल ही जायेगी. कुछ ऐसा ही हुआ कांके निवासी 30 वर्षीय श्रेया वर्मा के साथ. साल 2016 और 2017 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन में कैंसर रिसर्च के लिए इनका चयन हुआ. घर की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि श्रेया अपने दम पर कैम्ब्रिज में पढ़ाई कर ले. ऐसे में उसे राज्य से लेकर केंद्र सरकार तक को कई बार पत्र लिखा. 2016 में चयनित होने के बाद उसने अपने स्तर से केंद्र सरकार को कई बार पत्राचार किया, लेकिन उन्हें ना केंद्र से मदद मिली और ना ही राज्य से.

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15 राउंड इंटरव्यू में किया पास

श्रेया ने बताया कि फिर से 2017 में उसने कैम्ब्रिज में रिसर्च के लिए 15 राउंड का इंटरव्यू पास किया. इंटरव्यू में इनका चयन इस साल मई में हुआ था, नामाकंन के लिए इनके पास नवंबर तक का समय था. इस क्रम में श्रेया ने राज्य से लेकर केंद्र तक को कई पत्र लिखा, मेल किया. श्रेया ने बताया कि उसने हैंड रिटेन लेटर सरकारी कार्यालयों में भेजे. कई बार केंद्र सरकार की ओर से मेल आया कि राशि जल्द ही निर्गत कर दी जायेगी, लेकिन जनवरी तक राशि नहीं मिली.

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नामांकन में दिया गया एक्सटेंशन

श्रेया ने बताया कि वर्ष 2017 में नवंबर से लेकर मार्च तक कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की ओर से कई मेल आये. जिसमें नामाकंन के एक्सटेंशन की बात भी कही गयी थी. उन्होंने बताया कि यूनिवर्सिटी की ओर से खुद भारत सरकार को मेल किया गया था, जिसमें रिसर्च के लिए सहायता करने की बात कही गयी थी. आखिरकार सरकार की ओर से निराशा हाथ लगी. उन्होंने बताया कि कैम्ब्रिज की ओर से कुछ राशि स्कॉलरशिप में दी जा रही थी. लेकिन, लंदन में रह कर रिसर्च वर्क उतनी राशि में मुश्किल था.

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भारतीय स्वास्थ्य पर करना था काम

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श्रेया ने बताया कि कैंब्रिज में उनका चयन भारतीय महिलाओं के स्वास्थ्य पर रिसर्च करने के लिए किया गया था. जिसमें इनका विषय ‘वीमेंस हेल्थ एंड कैंसर’ था. उन्होंने बताया कि ऑनलाइन चयन के दौरान कई बार कैम्ब्रिज के प्रोफेसरों ने कहा कि भारतीय महिलाओं के स्वास्थ्य पर बेहतर काम किया जा सकता है, लेकिन दुर्भाग्य से काफी मेहनत के बाद भी सरकारी सहायता नहीं मिली.

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फिनलैंड में कैंसर पर कर चुकी हैं काम

साल 2013 में इनका चयन फिनलैंड के यूनिवर्सिटी ऑफ ओलू में कैंसर पर रिसर्च के लिए हुआ था. यूनिवर्सिटी से स्कॉलरशिप मिलने के कारण इन्होंने वहां छह माह तक रिसर्च किया, लेकिन विभिन्न परिस्थितियों के कारण इन्हें वापस आना पड़ा. जिसके बाद इन्होंने लगभग पांच सालों तक रातु रोड स्थित अपनी नानी की स्कूल में प्रबंधक के रूप में काम की. जिसके बाद इन्होंने कैम्ब्रिज में एडमिशन के लिए आवेदन भरा. इसके पूर्व इन्होंने इंडियन इंस्टिच्‍यूट ऑफ साइंस से अल्जाइमर पर रिसर्च पूरा किया था.

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यूएस कंपनी में हैं वैज्ञानिक

वर्तमान में श्रेया जिनोटिपिक नामक यूएस कंपनी में सिनियर साइंटिफिक एनालाइटिस्ट के पद पर कार्यरत है. जहां ये सिक्वेंसिंग और ब्रेस्ट कैंसर पर काम कर रही हैं. इन्होंने बताया कि काफी हताशा के बाद जिनोटिपिक में वैज्ञानिक के पद पर काम करने का अवसर मिला. कई बार ऐसी स्थिति आ गयी थी कि लगा अब घर बेचना पड़ेगा, ऐसे में परिवार का एक सहारा घर ही था, जिसे बेचकर परिवार के लिए मुसीबत नहीं बुलाया जा सकता था. उन्होंने कहा कि देश के कई युवा विदेशों में उच्च शिक्षा के लिए जाना चाहते हैं, लेकिन सरकार की उदासीन रवैये के कारण विद्यार्थियों का भविष्य मार खा जाता है.

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