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लघुकथाः भादो की एक रात

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Dr. Urmila Sinha

भादों का महीना. काली अंधेरी रात. मुसलाधार बारिश. गंगा का विकराल रूप. एक दूजे को पछाड़ती लहरें. सबकुछ उसके गर्भ में. कोई ओर न छोर. उसी के बीच एक मछुआरा नंगे बदन हाथ में चप्पू लिए पूरी शक्ति से धारा से जंग लड़ता है. चारों दिशाओं में जल ही जल. बिना घबड़ाये, संतुलन खोये मां गंगा की स्तुति करता नाविक पूरी ताकत और निष्ठा से किनारे आने कि जद्दोजहद करता हुआ. “हे गंगा म‌ईया पार लग‌ईह हे माय.”

“मेरे साजन हैं उस पार….”अलापता पानी की लहरों पर क‌ई पोरसा ऊपर, और अगले ही क्षण धार के साथ क‌ई हाथ नीचे. अस्तित्व की लड़ाई लड़ता. मछली की पोटली कसकर बांधा, वही उसकी जमा-पूंजी जो थी.   पराक्रम के आगे तूफान क्या? किनारे लगते ही सधे हाथों से नौका को बांध दिया. अंधेरे की अभ्यस्त आंखें. पीठ पर जाल, मछली की पोटली,  नंगे बदन, घनघोर अंधेरा, लगातार बारिश,पांव ठीक झोंपड़ी के आगे रूकी. इंतजार करती भार्या. झट से बांस का फाटक हटा और गृहस्वामी को अंदर खींच लिया. क्षणभर के लिए आंखें मिलीं. क्या कहना, क्या सुनना.

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घरवाली की आंखें मछली की मात्रा देख चमक उठी.”कल्ह इसे बेचकर घर जरूरत का सामान खरीदूंगी ”

जान जोखिम में डालकर लाया या कैसे? उसे तो गृहस्थी चलानी है. बच्चों का पेट भरना है. बूढ़ी सास की दवा लानी है. हाथ मुंह धो पति खाने बैठा. तृप्त भाव से चाट पोंछ, रूखा-सुखा खाता अपनी खांसती बूढ़ी मां, नींद में सपने देख हंसते बच्चे और प्रतिक्षारत पत्नी के समक्ष समस्त आपदाओं को भूल गया. गृह स्वामी होने का भाव”, तुमने खाया.”

“बिना तुम्हें खिलाये खाया है कभी. “मानिनी का गौरव पूर्ण ज़वाब.

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“मां और बच्चों ने”

“हां, वे सभी खाकर सोये हैं.”

संतोष और आनंद से भर उठा मछुआरा. “आखिरकार मैं घर का मालिक हूं. परिवार की जरूरतों को पूरा करना मेरा धर्म है.” अपनों की जिम्मेदारी और प्रेम-भाव विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति देता है.

रसोई समेट गृहिणी नींद से बोझिल हाथ जोड़ विनती करने लगी, “मेरे सुहाग की रक्षा करना, हे गंगा माई”. दोनों हाथ स्वतः जुड़ गये. मां गंगा का विकराल रूप.  रोजी-रोटी कमाने की मजबूरी.  जीवन रक्षा के लिए जद्दोजहद. सब तिरोहित हो चुका था. दाम्पत्य प्रेम का अनुपम उदाहरण. बस एक कसक रह गयी तो एकांत की, जो कल्पना में उम्र बीती जा रही है. जो त्योहार की तरह साल के 365 दिन में कभी-कभी ही आता है.

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