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दर्जन से ज्यादा बेस्टसेलर नॉवेल लिखनेवाली लेखका शिवानी, महिलाओं में था जबरदस्त क्रेज

जन्मदिन पर विशेष

Naveen Sharma

Ranchi : हिंदी की सबसे लोकप्रिय साहित्यकार शिवानी का जन्म 17 अक्टूबर, 1923 को विजयादशमी के दिन गुजरात के राजकोट शहर में हुआ था. शिवानी के पिता अश्विनी कुमार पाण्डे राजकोट में स्थित राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल थे, जो कालांतर में माणबदर और रामपुर की रियासतों में दीवान भी रहे. शिवानी के माता और पिता दोनों ही विद्वान, संगीत प्रेमी और कई भाषाओं के ज्ञाता थे.

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शिवानी के पितामह संस्कृत के प्रकांड विद्वान पंडित हरिराम पाण्डे, जो बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में धर्मोपदेशक थे, वे परम्परानिष्ठ और कट्टर सनातनी थे. महामना मदनमोहन मालवीय से उनकी गहरी मित्रता थी. वे प्रायः अल्मोड़ा तथा बनारस में रहते थे, अतः शिवानी का बचपन अपनी बड़ी बहन तथा भाई के साथ दादाजी की छत्रछाया में उक्त स्थानों पर बीता.

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कई भाषाओं की जानकर थीं

इसका असर गौरा पंत ‘शिवानी पर भी पड़ा. इसलिए शिवानी एक ऐसी शख्सियत रहीं, जिनकी हिंदी, संस्कृत, गुजराती, बंगाली, उर्दू तथा अंग्रेज़ी पर अच्छी पकड़ था. शिवानी अपनी कृतियों में उत्तर भारत के कुमायूँ क्षेत्र के आसपास की लोक संस्कृति की झलक दिखलाने और किरदारों के बेमिसाल चरित्र चित्रण करने के लिए जानी गई. महज 12 वर्ष की उम्र में पहली कहानी प्रकाशित होने से लेकर उनके निधन तक उनका लेखन निरंतर जारी रहा. उनकी अधिकतर कहानियां और उपन्यास नारी प्रधान रहे. इसमें उन्होंने नायिका के सौंदर्य और उसके चरित्र का वर्णन बड़े दिलचस्प अंदाज में किये हैं.

शांति निकेतन में पढ़ाई का असर

शिवानी आधुनिक अग्रगामी विचारों की थीं. शिवानी ने बंगाल के रवींद्र नाथ टैगोर के शांति निकेतन से बी.ए. किया. साहित्य और संगीत के प्रति एक गहरा रुझान ‘शिवानी’ को माता और पिता से विरासत के रूप में तो मिला ही था इसमें शांति निकेतन की पढ़ाई के दौरान टैगोर की छत्रछाया में और निखार आया .

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अधिकतर उपन्यास रहे बेस्टसेलर

हिंदी में लोकप्रिय साहित्यकारों की बात करें तो गुलशन नंदा और शिवानी इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं. शिवानी के प्राय: सभी उपन्यास बेस्टसेलर रहे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि उनकी लेखन शैली में गजब का आकर्षण था. वो पाठकों को अपनी कहानी और पात्रों के जरिये इस तरह कनेक्ट करती थीं कि अगर उनके उपन्यासों और कहानियों की किताब को एक बार कोई पढ़ना शुरू करे तो उसे खत्म किये बिना छोड़ना मुश्किल है. मैंने खुद उनके उपन्यास ज्यादा नहीं पढ़े पर एक उपन्यास आज भी याद आता है सुरंगमा. इसे पढ़ने के दौरान उनकी लेखन की जादूगरी को मैंने भी महसूस किया था.
वे अपने उपन्यासों और कहानियों में पात्रों और घटनाओं का जिस तरह से वर्णन करती हैं, वह मंत्रमुग्ध कर देने वाला होता है.

कृष्णकलि का जादू

 

वैसे तो शिवानी के अधिकतर उपन्यास लोकप्रिय रहे हैं. इनमें “अतिथि”, “चौदह फेरे”, “विषकन्या”, “मायापुरी” आदि ज्यादा प्रसिद्ध उपन्यास रहे है. , लेकिन शिवानी को सबसे अधिक जाना जाता है उनके “कृष्णकली” उपन्यास के लिए. “धर्मयुग” में यह उपन्यास धारावाहिक के रूप में छपा था. तब इसकी नायिका , कृष्णकली और प्रवीर पर पाठक का गजब क्रेज था.

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सौंदर्य की चित्रकार

शिवानी के लेखन की प्रमुख विशेषताओं में से एक यह भी था कि वे सौंदर्य प्रेमी थीं इसलिए उनकी रचनाओं में सौंदर्य का वर्णन कमाल का था. अब वो सौंदर्य चाहे कुमाऊं और गढ़वाल के क्षेत्र के हिमालय की सुंदर व नयनाभिराम पहाड़ी इलाकों का हो या फ़िर अपूर्व सुन्दरी नायिकाओं का. उनके नायक भी स्मार्ट, धीर-गंभीर, आई.ए.एस, आई.एफ़.एस या फिर कोई बड़ा राजनीतिज्ञ होता था. सामान्य लोग प्राय: उनकी कहानियों के केन्द्रीय पात्र नहीं रहे हैं.

शिवानी की युवावस्था अपने शिक्षाविद पति के साथ उत्तर प्रदेश के विभिन्न भागों में बीती. शिवानी के पति के असामयिक निधन के बाद वे लम्बे समय तक लखनऊ में रहीं और अन्तिम समय में दिल्ली में अपनी बेटियों मृणाल पांडे तथा अमेरिका में बसे पुत्र के परिवार के साथ रहीं.

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