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शाह आयोग-2 : सरयू राय ने कहा- जुर्माना वसूल करने में भी सरकार और महाधिवक्ता ने पट्टाधारियों पर की मेहरबानी

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Ranchi: रघुवर दास की सरकार के वक्त खनन विभाग नियमों को ताक पर रख कर काम कर रहा था. सरयू राय का आरोप है कि खनन विभाग मुख्यमंत्री रघुवर दास के इशारे पर अवैध लौह अयस्क खनन करनेवालों का साथ दे रहा था. ऐसे ही कई गंभीर तरह के आरोप सरयू राय ने लिखित रूप से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को दी है. सरयू राय ने सारे बिंदुओं पर जांच की मांग की है. पिछली कड़ी में न्यूज विंग ने बताया था कि कैसे महाधिवक्ता भी इस पूरे प्रकरण में शामिल थे. इस कड़ी में जानिये और क्या गड़बड़ियां हुईं…

…अवैध खनन के जुर्माने पर लगे ब्याज की राशि को सुप्रीम कोर्ट ने माफ कर दिया. इसके बाद फिर से एक बार जुर्माने की राशि की पुनर्गणना की गयी और उसे दोबारा से घटा दिया गया. 2667.58 करोड़ के जुर्माने को घटा कर 2404.26 करोड़ कर दिया गया. ऐसा कैसे हो गया इस बात की भी जांच होनी चाहिए.

खनन पट्टाधारियों ने फिर भी जुर्माने की राशि जमा नहीं की. उन लोगों ने केंद्रीय ट्रिब्यूनल में अपील दायर कर दी. उन्हें जुर्माना स्थगन का आदेश भी मिल गया. लेकिन सरकार की तरफ से स्थगन आदेश हटवाने की सरकार की तरफ से कोई कोशिश नहीं की गयी. ये भी एक जांच का विषय है.

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जुर्माने पर ब्याज की गणना हुई या नहीं इसकी जांच होनी चाहिए

शाह आयोग ने जो जुर्माने लगाया था. उसके ब्याज को सुप्रीम कोर्ट ने माफ कर दिया. साथ ही आदेश दिया था कि जुर्माने की राशि एकमुश्त जमा की जाये. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की तरफ से जुर्माने की मांग करने और जुर्माना अदा करने में होनेवाली देरी का ब्याज माफ करने जैसा कोई निर्णय नहीं दिया था. जुर्माना अदा करने में हुई देरी पर ब्याज की गणना हुई या नहीं, इसकी भी जांच होनी चाहिए.

शाह आयोग ने 2011 तक हुए अवैध खनन पर जुर्माना लगाया था. जिन पर जुर्माना लगाया गया था वो 2011 से मार्च 2020 के बीच अवैध खनन किया या नहीं, अगर किया तो उसका जुर्माना भरा या नहीं, इसकी जांच होनी चाहिए.

जुर्माना वसूल करने में भी कई पट्टाधारियों पर सरकार और महाधिवक्ता ने मेहरबानी की है, जो असंवैधानिक है. सुप्रीम कोर्ट ने पट्टाधारियों को एकमुश्त जुर्माना अदा करने का आदेश दिया था. लेकिन कई पट्टाधारियों से ये जुर्माना किस्तवार वसूला गया, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना है. यदि किसी न्यायालय ने किस्तों में भुगतान करने का आदेश दिया तो सरकार ने इसकी अपील ऊपर के न्यायालय में की या नहीं. यदि नहीं की तो ऐसे आदेश के विरुद्ध अपील नहीं करने के बारे में निर्णय किसने लिया. इसकी जांच होनी चाहिए.

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आखिर किसके इशारे पर महाधिवक्ता ने ऐसा किया

ऐस भी उदाहरण है कि हाइकोर्ट ने एकमुश्त जुर्माना अदा करने का आदेश दिया. पट्टाधारी ने इस आदेश के खिलाफ अपील दायर की तो सरकार के महाधिवक्ता ने कुछ नहीं पूछा और खुद ही अपने मन से कोर्ट को बता दिया कि दोनों पक्ष जुर्माना का भुगतान 20 किस्तों में करने पर सहमत हैं. जबकि खान विभाग ने इस बात पर सहमति नहीं जतायी. ऐसे में सवाल उठता है कि फिर आकिर किसके निर्देश पर महाधिवक्ता ने ऐसा किया. क्या महाधिवक्ता और खननपट्टाधारी के बीच सांठ-गांठ थी. अगर नहीं को किसके इशारे पर उन्होंने पेशागत नैतिकता के विरुद्ध ऐसा किया. इसकी जांच होनी चाहिए.

हाईकोर्ट का छह दिसंबर 2016 का निर्णय था कि जिन आवेदकों ने कोर्ट में केस किया है, वो तभी खनन कर सकेंगे जब वो दो महीने के अंदर यह साबित कर दें कि उन्होंने सभी अनियमितता को दुरुस्त कर लिया है. शेष पट्टाधारियों को कोर्ट ने इसके लिए छह महीने का समय दिया. इसका मतलब यह कि नियमों का उल्लंघन करने वाले पट्टाधारी खनन नहीं कर सकेंगे. लेकिन कोर्ट के आदेश के विरुद्ध अवैध खनन का काम चलता रहा. नियमों के उल्लंघन की जांच के बारे में सरकार ने टालने वाला रवैया अपनाया. खान सचिव ने 60 दिनों का नोटिस पट्टाधारियों को दिया. यह नोटिस गलत नियम के तहत दिया. 60 दिनों का समय बीत जाने के बाद पट्टाधारियों ने खान सचिव को नोटिस का जवाब दिया. जवाब यह कि आपने जिस धारा के तहत उन्हें नोटिस दिया है, उसकी सुनवाई करने का अधिकार आपको है ही नहीं. सुनवाई स्थगित हो गयी. सरकार ने पूरे मामले पर चुप्पी साध ली. फिर से हाइकोर्ट ने हस्तक्षेप किया, लेकिन विभाग के सचिव ने सुनवाई करने से इंकार कर दिया. इसके बाद सरकार ने मामले की सुनवाई के लिए सदस्य, राजस्व पर्षद को जिम्मा दिया. सदस्य राजस्व पर्षद ने सुनवाई की और खनन पट्टाधारी का पट्टा रद्द करने की अनुशंसा सरकार से की. ये वही पट्टाधारी हैं, जिन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री ने जान-बूझकर साजिश के तहत परिवहन चालान दिलवाया था. सदस्य, राजस्व पर्षद को दूसरे मामलों में विभाग की तरफ से किसी तरह की कोई मदद नहीं मिली. विभाग ने पट्टाधारियों के नियम उल्लंघन के प्रमाणों को नहीं रखा, जो फाइलों में मौजूद हैं. ऐसा क्यों किया गया इस मामले की जांच होनी चाहिए.

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विभाग ने भी की गड़बड़ियां

सुप्रीम कोर्ट ने कॉमन कॉज मामले में दो अक्टूबर 2017 को निर्णय दिया कि 31 दिसंबर, 2017 के पहले पट्टाधारियों को जुर्माने की राशि दे देनी होगी. अगर ऐसा नहीं होता है तो वो खनन का काम नहीं करेंगे. लेकिन दूसरी तरफ जुर्माना नहीं देने वालों को खान विभाग की तरफ ने 31 दिसंबर 2017 को थोक के भाव में परिवहन का चालान दे दिया गया. इसी आधार पर मई 2018 तक लौह अयस्क का परिवहन होता रहा. अगर जांच होती है तो ऐसा करने वालों का चेहरा उजागर हो जायेगा. दूसरा फैसला यह था कि झारखंड सरकार की कैबिनेट ने 28 दिसंबर 2016 को सभी खननपट्टाधारियों के पट्टों को सशर्त बढ़ा दिया. जबकि एमएमडीआर एक्ट में प्रावधान होने और खनन पट्टा रद्द करने संबंधी मामले में हाइकोर्ट का आदेश आ जाने के बाद झारखंड सरकार को कैबिनेट में मामला ले जाकर भारत सरकार ने खननपट्टाधारियों द्वारा वन भूमि पर एनपीवी देने की अवधि का विस्तार 31 मार्च 2017 से आगे बढ़ाने से इंकार कर दिया. वन भूमि पर एनपीवी जमा करने की अवधि 31 मार्च 2017 को खत्म हो जाने के बाद भी एक खनन पट्टाधारी ने एनपीवी दिये बिना 31 दिसंबर 2017 तक खनन किया. यह अवैध खनन का मामला है. सरकार ने पूरी जानकारी रहते हुए अवैध खनन होते रहने दिया. यह सरकार और पट्टाधारी के बीच सांठ-गांठ का पक्का प्रमाण है. यह अवैध खनन सत्ता शीर्ष की इजाजत के बगैर नहीं हो सकता. इसकी जांच होनी जरूरी है. (समाप्त)

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