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शाह आयोग-1 : सरयू राय ने कहा- पूर्व सीएम रघुवर दास ने लौह अयस्क का अवैध खनन करनेवालों को संरक्षण दिया, मामले की जांच कर हेमंत करें कार्रवाई

Ranchi: चाईबासा में लौह अयस्क के अवैध खनन को लेकर पूर्व मंत्री सरयू राय ने पिछली सरकार और तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास पर गंभीर आरोप लगाये हैं. उन्होंने मौजूदा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिख कर मामले की जांच कराने का आग्रह किया है. अपने आवेदन के साथ सरयू राय ने बिंदुवार तरीके से दावा किया है कि सरकार और पट्टाधारी के बीच सांठ-गांठ होने की वजह से लगातार अवैध खनन होता रहा. साथ ही शाह आयोग ने जो अवैध खनन के खिलाफ जुर्माना लगाया था, उसमें मुख्यमंत्री और महाधिवक्ता ने गड़बड़ी कर पट्टाधारियों को फायदा पहुंचाया. क्या हैं सरयू राय के आरोप, आइये जानते हैं.

रघुवर सरकार से पहले शाह आयोग की अनुशंसा पर झारखंड सरकार ने कार्रवाई की. 2014 के जून महीने में अपर खान निदेशक की अध्यक्षता में चार सदस्यों की एक समिति बनी. समिति ने जांच कर अपनी रिपोर्ट सितंबर 2014 में दी. इसके बाद डीसी चाईबासा की अध्यक्षता में तीन सदस्यों की एक समिति बनी. जिसने अप्रैल 2015 में अपनी रिपोर्ट विभाग को सौंपी. एक बार फिर से विभाग की तरफ से चार सदस्यों की एक समिति बनी. इस समिति ने अपनी रिपोर्ट जुलाई महीने में सौंप दी. तीनों समितियों की रिपोर्ट में अवैध लौह अयस्क के खनन की बात थी. आखिरी रिपोर्ट में साफ कहा गया कि 23 खनन पट्टाधारी को जो अवधि विस्तार मिला है, वो उसकी पात्रता नहीं रखते हैं. इस रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन विकास आयुक्त ने सभी 23 खनन पट्टाधारियों का पट्टा रद्द कर दिया. जिसका आदेश एक अप्रैल 2016 को निकाला गया. इस आदेश पर महाधिवक्ता से भी परामर्श लिया गया था.

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पट्टा रद्द होने के बाद 23 में से तीन पट्टाधारी ने हाइकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की. 21 अप्रैल को याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट में अतिरिक्त महाधिवक्ता ने कहा कि खनन पट्टा का पहला नवीकरण का आवेदन रद्द करने का सरकार का आदेश नहीं था. उनके ऐसा कहने के बाद सवाल उठने लगे कि क्या अतिरिक्त महाधिवक्ता का ऐसा कहना कहीं पेशागत नैतिकता के विरुद्ध तो नहीं. आखिर में कोर्ट ने खनन पट्टा रद्द करने का सरकार का आदेश खारिज कर दिया. फैसला आने पर खान विभाग के तत्कालीन अतिरिक्त मुख्य सचिव ने अतिरिक्त महाधिवक्ता की टिप्पणी पर आपत्ति जतायी. उन्होंने सरकार को चिट्ठी लिख कर इस बात की सूचना दी. लेकिन इसका खामियाजा खुद खान विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को भुगतना पड़ा. तत्कालीन मुख्यमंत्री ने ऐसा करने पर खान सचिव को अपमानित किया. इससे साबित होता है कि सीएम और महाधिवक्ता की मिलीभगत थी. ऐसी मिलीभगत की जांच होनी चाहिए.

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मुख्यमंत्री ने अवैध खनन को संरक्षण दिया

कोर्ट के आदेश के बाद खननपट्टाधारी ने बिना सरकार की अनुमति लिए खनन का काम शुरू कर दिया. साथ ही खनन विभाग से परिवहन के लिए चालान निर्गत करने को कहा. खनन विभाग ने खननपट्टाधारियों की इस बात को स्वीकार नहीं किया. विभाग ने ऐसा करने से पहले महाधिवक्ता का परामर्श मांगा. महाधिवक्ता (अब स्वर्गीय) ने परामर्श दिया कि सरकार अगर सरकार हाइकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील नहीं करना चाहती तो खननपट्टाधारी को विभाग की तरफ से चालान निर्गत कर देना चाहिए. महाधिवक्ता के परामर्श के बाद मुख्यमंत्री ने 24 जून 2016 को विभाग को चालान देने का आदेश दिया. इससे पहले चाईबासा के जिला खनन पदाधिकारी ने कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील करने के लिए सरकार से आदेश मांगा था. मगर सीएम ने जिला खनन पदाधिकारी के प्रस्ताव को नहीं माना. पादधिकारी ने यह तर्क भी दिया कि नियम के मुताबिक खननपट्टाधारी को चालान नहीं दिया जा सकता. क्योंकि उसे पर्यावरण विभाग की तरफ से कंसेन्ट टू ऑपरेट (सीओटी) यानी खनन करने की अनुमति ही नहीं मिली है. स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री का चालान देने का आदेश गलत था. मुख्यमंत्री ने अवैध खनन को संरक्षण दिया. इस वजह से मामले की जांच होनी चाहिए.

जिला खनन पदाधिकारी को सीएम का आदेश नहीं पालन करने का खामियाजा भरना पड़ा. खननपट्टाधारी ने जिला खनन पदाधिकारी के खिलाफ हाइकोर्ट में मानहानी का मुकदमा दर्ज कर दिया. इस मुकदमे में सरकार की तरफ से पदाधिकारी को किसी तरह की कोई मदद नहीं मिली. यह मुकदमा उन्हें अपने पैसे से वकील रख कर लड़ना पड़ा. इतना ही नहीं सरकार की तरफ से पदाधिकारी को प्रताड़ित किया गया और उनका तबादला कर दिया गया.

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चालान रोकनेवाले अधिकारी का तबादला

अब तक खननपट्टाधारी बिना पर्यावरण से सीओटी मिले ही खनन कर रहे थे. जहां पर्यावरण विभाग को खननपट्टाधारी के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी, वो ही विभाग अब सीओटी देने का दबाव झेल रहा था. दबाव में विभाग ने सशर्त सीओटी जारी कर दिया. शर्त यह कि अगर खननपट्टाधारी ने कोई अनियमितता नहीं की हो तो वो खनन कर सकता है. जबकि इससे पहले ही खननपट्टाधारी की अनियमितता सिद्ध हो चुकी थी. इसलिए तो चालान रोकनेवाले जिला खनन पदाधिकारी का तबादला कर दिया गया था. नये आये जिला खनन पदाधिकारी ने अनियमितता रहने के बावजूद चालान दे दिया.

शाह आयोग की तरफ से अवैध खनन करनेवालों पर 14,541 करोड़ का जुर्माना लगाया था. 14,403 करोड़ रुपये लौह अयस्क के अवैध खनन के लिए और 138 करोड़ मैंगनीज अयस्क के अवैध खनन के लिए. इसमें ब्याज भी शामिल था. बाद में झारखंड सरकार की तरफ से जुर्माने की पुनर्गणना की. जुर्माने की राशि को घटा कर करीब 7133 करोड़ कर दी गयी. 2667.58 करोड़ मूल जुर्माना और करीब 4465.46 करोड़ ब्याज की राशि. पुर्नगणना में इतना अंतर कैसे आया, इस मामले की जांच होनी चाहिए. (जारी)

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