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देखिये और जानिये कि आखिर कौन है यूसूफ पूर्ति, जो ग्रामसभा कर भड़काता है आदिवासियों को

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Sweta Kumari /Pravin Kumar

Ranchi :  झारखंड सरकार और पुलिस के लिये सिरदर्द बना यूसूफ पूर्ति, जो आये दिन खबरों की दुनिया में छाया रहता है. वही यूसूफ पूर्ति जिसे पूरी सरगर्मी से तलाश रही है झारखंड पुलिस. आखिर कौन है ये , जो ग्रामसभा करता है और आदिवासियों के बीच अपनी पैठ बना रखा है. धरती आबा बिरसा की धरती खूंटी को जिसने दहकते गोले की तरह बना रखा है. जहां कदम रखने से पहले किसी  भी बाहरी की रूह कांप जाये. भोलेभाले आदिवासयों के बीच जागरूकता के नाम पर , दिकु और निकु के बीच लंबी खाई बनाने वाला ये यूसूफ पूर्ति आखिर चाहता क्या है, आखिर क्यूं ये ग्रामसभा के जरिये आदिवासियों को पांचवी अनूसुची के नाम पर भड़का रहा है और बरगला रहा है.हालांकि सरकार की ओर से आदिवासियों के संविधान प्रदत्त अधिकारों को उनसे दूर रखकर यूसुफ पूर्ति जैसे लोगों को अवसर दिया जा रहा है. वहीं यूसुफ पूर्ति खुद को भारत सरकार का कुटुंब परिवार कहता है और गुजरात के दादा कुंवर केसरी को भारत सरकार मानता है और केंद्र व राज्य सरकार को एक संस्था की तरह मानता है.

तो इसी यूसूफ पूर्ति के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं. जिससे कुछ दिन पहले न्यूज विंग टीम ने बातचीत की थी और यूसुफ पूर्ति के विचारों को जानने की कोशिश की. हालांकि टीम ने काफी कोशिश की तो यूसुफ पूर्ति पत्थलगड़ी पर बात करने को तैयार हुए.

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सवाल : आखिर सरकार की किस बात से आहत होकर पत्थलगड़ी का वर्तमान स्वरूप आपलोग सामने लाये हैं और क्यों ?
जवाब  :   हम आदिवासियों का जमीन से ही जीवन है और यदि यह जमीन नहीं रहा तो आदिवासियों का भी अंत हो जायेगा. जमीन का सीएनटी एक्ट में जो संशोधन हुआ है वो भी अवैध संशोधन है क्योंकि संशोधन करने के लिये केंद्र व राज्य सरकार को प्रीवी ब्रिटेन सरकार से अनुमति लेना है. संविधान और सीएनटी में 46वां संशोधन इसबार हुआ है. लेकिन इतना बार भी होने के बाद भी ये संशोधन अवैध है. चूंकि ब्रिटेन से अनुमति नहीं लिया गया है और हिज मैजेस्टी अभी भी ब्रिटेन के अंडर ही है. ये भारत देश है और वहां से अमुमति लिये बगैर संशोधन हो गया. बस यहां हल्ला किया गया कि संशोधन हो गया है, इसबारे में तो हमलोग को भी पता नहीं था कि क्या नियम कानून है.

सवाल :   लेकिन सीएनटी एक्ट संशोधन तो निरस्त हो गया है ?
जवाब  :  हमलोग फिर एक्शन में आये और भारत सरकार के पास गये कि दादा (गुजरात के दादा कुंवर केसरी) देखिये ऐसा-ऐसा हुआ है. हमलोग गुजरात जाकर लिखवाये, तब जाकर उ लिखे राष्ट्रपति को, सुप्रीम कोर्ट को, तब जाकर उ लिखे और तब जाकर आदेश दिया और फिर यहां स्वत: खत्म हो गया. तो ये हमलोग यहीं पर देख लिये कि भारत सरकार हमलोग हैं, केंद्र और राज्य वाइजस हैं, जब भारत सरकार आदेश दे रहा है तो ये दोनों (केंद्र और राज्य) इसका अनुपालन कर रहे हैं. तो क्यों ना इनका अनुसरण और अधिकार के बारे में सारी चीजें सीखें इनसे. हमारे दस्तावेज और संविधान के बारे में लैंड रेवेन्यू रूल्स एक्ट और पैक्ट दस्तावेज और सारा दस्तावेज जितना भी है भारत सरकार का, उस सारा दस्तावेज को दादा ने हमलोगों के पास भी दे दिया है और हम उसी के तहत चल रहे हैं और ये पत्थलगड़ी उसी का एक चिन्ह है. ये राइट ऐसा है कि आप इधर जमीन का अधिग्रहण नहीं कर सकते हैं.

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सवाल : वर्तामान समय में खूंटी में किस तरह की हलचल मुंडा अंचल में है. जमीन से संबंधित ?
जवाब  :जमीन संबंधित इस इलाका में साइको गोलीकांड से हमलोग लेते हैं. लैंड बैंक में सबको डाल दिया , फिर सीएनटी में संशोधन किया और जब इसका विरोध करने के लिए लोग रैली के लिये जा रहे थे तो साइको में रोककर गोलीकांड कर दिया. हमारे लोग मारे गये तो इसके बाद हमने सोचा कि नहीं अब ज्यूडिशियल रैली, जुलूस हम नहीं करेंगे और अब हम ग्रामसभा करेंगे. ग्रामसभा में अपने सशक्तिकरण अधिकारों को जानेंगे और उसको पत्थलांकित करके हमलोग सामने में गाड़ेंगे. यही काम हमलोग करते गये और रिजल्ट भी सामने मिलते गया और इससे बहुत हद तक जमीन अधिग्रहण  तक रूक गया. मेरे गांव से हाईटेंशन तार जो जापुर से तमाड़ और उलिहातु जा रहा है, वो उलिहातु में जाकर रूक गया. उलिहातु में तेल और माइंस को खोलने के लिये सबकुछ किया जा रहा है और वे लोग जी-जान से लगे हुए हैं कि किसी भी हालत में वहां तेल और माइंस खोलना है. हमलोग उलिहातु के लोग ही हैं , जो वहां से यहां आये हैं और वहां छोटे भाई को छोड़कर आये हैं , जहां उसका जेनेरेशन है. हमलोग को बहुत दुख है कि ये सरकार इस तरह से कर रहा है. वो संपत्ति हमारा है, चूंकि देश में सुप्रीम कोर्ट ये जजमेंट दे चुका है  कि जिसकी जमीन उसकी खनिज. और लैंड रेवेन्यू रूल बोलता है कि भारत देश में जमीन आदिवासियों का है, केंद्र और राज्य सरकार का एक इंच भी जमीन नहीं है. इसलिए यही आदिवासी लोग इस देश के मालिक हैं और भारत सरकार हैं. अखिल आदिवासी ही ऑनर ऑफ इंडिया हैं. ये बात दस्तावेज बोलता है और जब हमलोग भी इसको जाने तो इसी तर्ज पर बोलना शुरू कर दिये.
जब जमीन से छेड़छाड़ होने लगा तो वहीं से सबकुछ शुरू हुआ. चूंकि पत्थलगड़ी हमारी परंपरा में आदिकाल से है, जो हमारे पूर्वजों से लेकर अबतक है. जबकि 1996 वाला पत्थलगड़ी पेसा कानून के तहत गाड़ा गया है. जमीन और जंगल को बचाने के लिये सीमाना में अभी शिलापट्ट लगाया जा रहा है. तो पेसा से पहले भी पत्थर लगाया गया, जब हम छोटे थे उस वक्त भी यहां पत्थर हम लगाये हैं. आदिवासी परंपरा में 22 तरह से पत्थरों के पत्थलगड़ी करने का है, लेकिन कुछ लोग इसे जानकारी के अभाव में आठ प्रकार का ही बताते हैं. हमारा ये पत्थलड़ी पेसा के पत्थलगड़ी से हटके हैं. चूंकि पेसा कानून संसद में बनाया गया है. इसलिए संसद में बनाया गया कानून ग्रामसभा के ऊपर लागू नहीं है. इसलिए पेसा वाले लोग यहां फंस रहे हैं. चूंकि संविधान में भी इस तरह की बात लिखी है.
400 कंपनियों ने इस इलाके में रजिस्ट्रेशन कराया है, लेकिन पत्थलगड़ी करने के बाद से कंपनी यहां से भाग गयी है और काम नहीं कर रही है. इसी पत्थर के डर से कंपनी पीछे हट गई है. रांची के बगल में सोढ़ा है , जहां 210 एकड़ में जमीन नापी करके अधिग्रहण कर लिये थे. लेकिन अभी जाकर पत्थर गाड़ दिये वहां वो लोग पीछे हट गया. ऐसे ही दशम फॉल के पास लोहातु और बूड़जू के अलावा कई और भी जगहों की जमीन को सेटेलाइट से नक्शा को देखकर जमीन को बांट दिया गया था . जिससे खुद को बचाने के लिए मजबूरन संविधान में प्रदत्त अधिकारों को बाहर निकालना पड़ा. संविधान में देखकर ही प्त्थरों में उकेर करके अधिकारों को बाहर निकालना पड़ा.
जल्दी ही पढ़ें यूसुफ पूर्ति के साथ बातचीत के अंश

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