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ऋषि कपूर को यहां से देखिये…

Zeb Akhtar

इरफान खान के बाद ऋषि कपूर का जाना सिनेमा के लिए दूसरा ब़ड़ा नुकसान है. इरफान जहां अपने अभिनय की पारी लगभग खेल चुके थे या उसे और परवान चढ़ा रहे थे, वहीं ऋषि कपूर स्टार वाली छवि से निकल कर अभी गंभीर किस्म के अभिनय की ओऱ मुड़े ही थे. उन्होंने खुद माना था कि सही मायनों में उनके अभिनय का कैरियर अब शुरू हुआ है. 2010 के बाद. शायद सैयद इरफान के साथ गुरफ्तगू कार्यक्रम में उन्होंने ये बात कही थी. 2010 में आयी दो दुनी चार को उन्होंने अपना टर्निंग प्वाइंट कहा था.

इसके पहले के साल बॉबी से बनी रोमांटिक हीरो की छवि से निकलने की छटपटाहट है, जो हर अभिनेता में होती है. अगर उसमें अभिनय की भूख बची हो तो. बहरहाल, दो दुनी चार (2010) के बाद डी डे, लव आजकल, मुल्क, कपूर एंड संस, 102 नोट आउट, कपूर एंड संस, स्डूडेंट्स ऑफ द इजर तक में जो ऋषि कपूर दिखायी पड़ते हैं, वो राजकपूर के गढ़े हुए ऋषि नहीं हैं.

दरअसल, बॉबी (1973) के माध्यम से ऋषि कपूर के नाम का ये मजबूत स्टारडम भी ऐसे ही नहीं खड़ा हुआ था. राजकपूर ने इस छवि को बहुत सचेत होकर बहुत मेहनत से गढ़ा था. क्योंकि बॉबी से पहले राजकपूर मेरा नाम जोकर बनाकर भारी नुकसान ने धंसे हुए थे. उन्हें वहां निकलना था. और इसके लिए उनको एक बड़े हिट की जरूरत थी.

वे अब और रिस्क लेने की स्थिति में नहीं थे. उन्हें एक नहीं फेल होने वाले स्टार हीरो औऱ बोल्ड कहानी की जरूरत थी. वे जान गये थे कि मेरा नाम जोकर वाला राजू का आदर्शवाद अब चलने वाला नहीं है. या ऐसी फिल्म बनाना एक अलग प्रतिभा की मांग करता है. क्योंकि खुद राजकपूर ने दो बीघा जमीन देखने के बाद बिमल राय (निर्देशक) को फोन करके कहा था, ये मैं कैसी उलटी सीधी फिल्में बना रहा हूं.

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बहरहाल, राजकपूर ने घाटे से निकलने के लिए ऋषि कपूर के स्टारडम की मजबूत छवि का निर्माण किया. जो हम तुम एक कमरे में बंद हो जैसी कल्पना करता है औऱ जिसपर पहले सीन में ही आंटी उम्र की महिला फिदा है. और बाद में जो ऐसा रोमांटिक मजनू साबित होता है जो प्रेमिका के लिए मर जाने तक को तैयार है. फिल्म हिट हुई. और ऐसी हिट हुई कि आज भी बॉबी को रोमांटिक सिनेमा का कल्ट कहा जा सकता है.

मैंने एक ऐसा सिनेमा हाल भी देखा है, जो उन दिनों बंद होने के कगार पर था. लेकिन उसे बॉबी की प्रिंट मिल गयी. एक साल तक फिर फिल्म चलती ही रही. मालिक ने इतना कमाया कि उसने एक सिनेमा हाल औऱ बना लिया. औऱ नाम रखा बॉबी टॉकीज. हालांकि मल्टीप्लेक्स के दौर में अब फिर से उनकी हालत खराब है.

लैला मजनूं (2018) के बाद वे अपनी खालिस उर्दू और लहजे की वजह से मुस्लिम लड़कियों में बहुत लोकप्रिय हो गये थे. आप देखेंगे तो हालिया मुल्क और डी डे में भी इसकी झलक मिलेगी.

बहरहाल बॉबी (1973) के हीरो की जो मजबूत छवि राकपूर ने गढ़ी, उससे निकलने में ऋषि कपूर को 50 साल लग गये. इसकी बेचैन ऋषि कपूर को अब महसूस होने लगी थी. वे एक्टिंग के लिए छटपटा रहे थे. कि कुछ मिले. कोई फिल्म मिले जिसमें वो अपना हुनर दिखा सकें. जौहर दिखा सके. और प्रतिभा और फिर कपूर खानदान की शानदार विरासत की वजह से उन्हें ये मौका मिलता भी रहा. तो उन्होंने अपने फैन्स निराश भी नहीं किया. तो ऐसे समय में जब ऋषि कपूर का ‘बेस्ट’ निकलने की जमीन तैयार हो रही थी, उनका जमीदोज होना खलने वाला है. बहुत खलने वाला.

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