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SCPCR: अजब आयोग की गजब कहानी, बगैर चेयरमैन और मेंबर्स के ही दो सालों में कर दिया 1000 से अधिक केसों का निपटारा

AMIT JHA

Ranchi: बच्चों के जायज हक, देखभाल और उसके हितों की बात करने का सबसे प्रभावी आयोग है-राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग. फिलहाल झारखंड में अप्रैल, 2019 से इस आयोग में सन्नाटा है. ना तो अध्यक्ष है, ना मेंबर्स. कायदे से एक अध्यक्ष और 6 मेंबर्स इसमें होते हैं. बावजूद इसके आयोग सेहतमंद है. महज मेंबर सेक्रेटरी के भरोसे ही आयोग बाहुबली बना हुआ है. आंकड़े भी इसकी गवाही दे रहे हैं. 2016-17 से 2018-19 में जब आयोग में अध्यक्ष और मेंबर्स शोभा बढ़ा रहे थे, तब बच्चों से जुड़े 181 मामलों का समाधान आयोग ने किया. पर इसके बाद से अब तक (2019-20 से लेकर 2020-21 तक) 1109 मामलों का निष्पादन आयोग ने कर दिया है. अब इस दावे पर सवाल उठ रहे हैं.

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संसद में उठा था सवाल

लोकसभा के चालू सत्र में सांसद प्रसन्न आचार्य ने महिला, बाल विकास मंत्रालय से अलग अलग अलग राज्यों में संचालित राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के संबंध में जानकारी मांगी थी. पूछा था कि पिछले पांच सालों में कितने केस आयोग में रजिस्टर्ड हुए और कितने निष्पादित किये. इसके जवाब में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने बताया कि एनसीपीसीआर के जरिये अलग अलग राज्यों आंकड़े मिले हैं. इसके मुताबिक झारखंड में 2016-17 से 2020-21 तक कुल 3205 केस रजिस्टर्ड हुए. इसमें से 1282 मामलों का निष्पादन कर दिया गया. निपटायी गयी शिकायतों की संख्या में 2016-17 से पहले के भी आंकड़े शामिल हैं.

किस साल कितने केस और कितना निष्पादन

2016-17         प्राप्त-55              निष्पादित-53

2017-18         प्राप्त-55              निष्पादित-51

2018-19         प्राप्त-134            निष्पादित-77

2019-20         प्राप्त-2761         निष्पादित-132

2020-21         प्राप्त-200           निष्पादित-969

 

जांच का विषयः आरती

आयोग की पूर्व अध्यक्ष आरती कुजूर ने न्यूज विंग से कहा कि अगर पिछले दो सालों में 3000 केस रजिस्टर्ड हुए और 1000 से अधिक केस का निपटारा हो गया तो यह जांच का विषय है. कमिशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स एक्ट 2005 के प्रावधानों के तहत आयोग के चेयरमैन और मेंबर्स ही प्राप्त शिकायतों पर वैधानिक निर्णय लेकर फैसला लेते हैं. मेंबर्स सेक्रेटरी की भूमिका सीमित है. आयोग के अध्यक्ष और मेंबर्स के निर्णय के आलोक में ही वैधानिक कार्रवाई को वे पूरा करने या आगे बढ़ाने का अधिकार रखते हैं. ऐसे में आयोग के पास 2019-20 से 20-21 के बीच 3000 केसों का दर्ज हो जाना और 1000 केसों को निष्पादित कर देना संदिग्ध है.

 

विधानसभा में मिला था गोलमोल जवाब

झारखंड विधानसभा के इस साल मार्च में हुए बजट सत्र के दौरान विधायक राज सिन्हा ने सरकार से पूछा था कि आयोग में नियमित तौर पर अध्यक्ष और मेंबर्स को मनोनीत नहीं किये जाने से बाल हित पर असर पड़ रहा है या नहीं. इस पर महिला, बाल विकास विभाग ने इस पर असहमति जतायी थी. कहा था कि आयोग का कार्यकाल 20 अप्रैल, 2019 को खत्म हो गया था. पर इसके बाद से प्राप्त शिकायतों पर आवश्यक कार्रवाई और निष्पादन भी किया जाता है. हालांकि यह नहीं बताया था कि बगैर अध्यक्ष और मेंबर्स के किस नियम के आधार पर आयोग में सुनवाई होती है. आयोग के अध्यक्ष और मेंबर्स की नियुक्ति पर कहा था कि इसके लिये नियुक्ति, चयन की प्रक्रिया जारी है.

विधानसभा में दिये गये आश्वासन के बाद सरकार ने अब आयोग में अध्यक्ष और मेंबर्स की नियुक्ति की दिशा में कदम बढा दिये हैं. आयोग के चेयरमैन और मेंबर्स की नियुक्ति के लिये आवेदन मांगे गये हैं. इसके लिये 16 अगस्त तक समय सीमा निर्धारित की गयी है.

 

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