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SC के फैसले से राज्य के 28 हजार आदिवासी परिवारों पर बेघर होने का खतरा

सर्वोच्च न्यायालय ने 10 लाख से अधिक आदिवासी और वन-निवास परिवारों को बेदखल करने का दिया आदेश

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Pravin Kumar

Ranchi : सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद झारखंड के वन क्षेत्र में रहनेवाले 27, 809 आदिवासी परिवारों पर बेघर होने का खतरा मंडराने लगा है. साथ ही 298 अन्य पारंपरिक वन निवासी परिवारों के समक्ष आजीविका के साथ-साथ बेघर होने का खतरा बढ़ गया है. दरअसल, वन अधिकार कानून के तहत 2005 से पूर्व वन क्षेत्र में निवास करने वाले परिवार को जमीन और आवास पट्टा देने की बात की गयी थी. 2006 में पास हुए इस कानून में केन्द्र सरकार ने कहा था कि आदिवासियों या पारंपरिक रूप से जंगलों में निवास करने वालों के प्रति किये गये ऐतिहासिक अन्याय को स्वीकार किया गया. इस ऐतिहासिक अन्याय को रोकने के लिए वनाधिकार कानून को अधिनियमित किया गया. जिसके तहत जंगल में निवास करने वाले प्रत्येक परिवार को चार एकड़ भूमि इस कानून के द्वारा देने का प्रावधान था.

298 दावों को वन विभाग की ओर से खारिज किया गया था

इसके बाद भी ग्रामसभा के अनुमोदन पर झारखंड के 1,07,187 आदिवासी परिवार एवं 3569 अन्य पांरपरिक वन निवासी ने जमीन के पट्टा के लिए सरकार के समक्ष दावा पेश किया था. इसमें आदिवासी परिवार के 27,809 दावों और (अन्य पारंपरिक वन निवासी) के 298 दावों को वन विभाग की ओर से खारिज कर दिया गया था. उन परिवार को वन क्षेत्र से निकाले जाने का आदिश परित किया गया है. 16 राज्यों के कुल 11,27,446 आदिवासी और अन्य वन-निवास के दावों को अस्वीकार कर दिया गया है.

क्या कहा गया है 20 जनवरी के फैसले में

उच्चतम न्यायालय ने 16 राज्यों, जिसमें झारखंड भी शमिल है, के वनवासी परिवारों को बेदखल करने का आदेश दिया. इस फैसले से 16 राज्य के 10 लाख से अधिक परिवारों की अजीविका और आवास का संकट पैदा हो गया है. शीर्ष अदालत ने 13 फरवरी को वन अधिकार अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के बाद यह आदेश दिया. याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि नए कानून के तहत पारंपरिक वनक्षेत्रों से संबंधित दावों को खारिज कर दिया जाना चाहिए. केंद्र के वकील उस दिन सुनवाई से गायब थे.  उन्होंने अभियान फॉर सर्वाइवल एंड डिग्निटी और वनवासियों के आंदोलनों के लिए एक समूह पर  आरोप लगाया.

संसद ने 2006 में वन अधिकार कानून पारित किया था. कानून ने पारंपरिक वनवासियों को गांव की सीमाओं के भीतर वन भूमि, संसाधनों तक पहुंचने, प्रबंधन और शासन करने के उनके अधिकारों को वापस दे दिया,  जो औपनिवेशिक काल से वन विभाग द्वारा नियंत्रित थे. कानून ग्रामसभा को वनक्षेत्रों के प्रबंधन और उनकी सुरक्षा के लिए वैधानिक निकाय बनाता है. यह बताता है कि इन जंगलों में किसी भी गतिविधि को तब तक नहीं किया जाना चाहिए जब तक कि व्यक्ति और समुदाय के दावों का निपटारा नहीं हो जाता. अदालत ने राज्य सरकारों को आदिवासियों को बेदखल करने का निर्देश दिया, जिनके दावे खारिज कर दिए गये हैं. जस्टिस अरुण मिश्रा, नवीन सिन्हा और इंदिरा बनर्जी वाली तीन जजों की बेंच ने राज्यों को 27 जुलाई तक का समय दिया. इसी समय मामले की अगली सुनवाई होगी. इसने सरकारों से इस मामले पर उच्चतम न्यायालय में एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने को भी कहा.

20 फरवरी के आदेश में क्या है?

शीर्ष अदालत ने 20 फरवरी को इस मामले में लिखित आदेश जारी किया. “यदि मामले में निष्कासन नहीं हुआ है, जैसा कि पूर्वोक्त है, तो इस मामले को गंभीरता से अदालत द्वारा देखा जाएगा. न्यायालय ने राज्यों को यह बताने के लिए भी कहा कि दावों की अस्वीकृति के बावजूद कोई सबूत क्यों नहीं थे. बिजनेस स्टैंडर्ड के अनुसार 16 राज्यों में से लगभग अन्य राज्यों ने जो विवरण प्रदान नहीं किया है, उन्हें शीर्ष अदालत ने ऐसा करने के लिए कहा है. अन्य राज्यों द्वारा अपना डेटा जमा करने के बाद संख्या बढ़ने की संभावना है.

क्या कहते है वन आधिकार के कार्यकर्ता  फादर जार्ज 

झारखंड में वन अधिकार कानून के तहत पट्टा देने में सरकार कोताही बरत रही है. ग्रामसभा के द्वारा पास किये गये दावे में अनुमंडल और जिला स्तर पर कटौती कर दी जाती है. ग्रामसभा की कोई भूमिका नहीं होती है. जबकि दावे को निरस्त करने में ग्रामसभा की राय लेनी जरूरी है. वन विभाग की ओर से राज्य में जितने पट्टे दिये गये हैं, उन दावों में भी भूमि का रकबा कम करने का खेल विभाग के द्वारा किया गया है. दावे  को खरिज करने का कोई कारण नहीं बताया गया है. सरकार के द्वारा इस आदेश के अमल में लाने के बाद झारखंड के तीस हजार से आधिक आदिवासी परिवार के समक्ष संकट खड़ा हो जायेगा.

30 हजार परिवारों के समक्ष भुखमरी का खतरा

सामाजिक कार्यकर्ता सुधीर पाल कहते हैं, न्यायालय के आदेश आने के बाद झारखंड के तीस हजार से अधिक परिवारों के समक्ष आजीविका और आवास का संकट हो जाएगा. न्यायालय में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने अपना पक्ष जनबूझ कर सही ढंग से नहीं रखा है. या फिर केन्द्र सरकार ने सजिश के तहत वन क्षेत्र को कॉरपोरेट के हवाले करने के लिए सैकड़ों साल से रह रहे आदिवासियों को निकालने का षड्यंत्र रचा जा रहा है. जब इस अधिनियम को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा रही थी, उस समय ही जंगलों से लाखों आदिवासियों और गरीब किसानों को बाहर निकालने के संकेत मिल गये थे.

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