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SC के जज जस्टिस गुप्ता ने कहा, भारतीयों को सरकार की आलोचना का अधिकार…यह देशद्रोह नहीं

NewDelhi : एक नागरिक के रूप में भारतीयों को सरकार की आलोचना का अधिकार है. आलोचना को देशद्रोह नहीं माना जा सकता. इन विचारों के व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस दीपक गुप्ता ने शनिवार को अहमदाबाद में एक कार्यक्रम में अपने भाषण की शुरुआत में साफ कर दिया कि व्यक्त किये गये उनके व्यक्तिगत विचार हैं.

Jharkhand Rai

कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में वह ऐसा नहीं कह रहे हैं. जस्टिस गुप्ता अहमदाबाद में लॉयर्स की एक वर्कशॉप में भारत में राजद्रोह का कानून और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता विषय पर अपने विचार रख कर रहे थे.

जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा, कार्यपालिका, न्यायपालिका, नौकरशाही, सशस्त्र बलों की आलोचना को राष्ट्रद्रोह नहीं कहा जा सकता. अगर हम इन संस्थानों की आलोचनाओं को झेलने में लड़खड़ाते हैं तो हम लोकतंत्र के बजाय एक पुलिस स्टेट बन जायेंगे.

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सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है असंतोष का अधिकार

उन्होंने कहा, मेरे लिए, एक बहुत महत्वपूर्ण अधिकार है जिसे संविधान में नहीं लिखा गया है. यह है विचारों की स्वतंत्रता का अधिकार और अंतरात्मा की स्वतंत्रता का अधिकार. जस्टिस ने कहा कि अपने आप में सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है असंतोष का अधिकार. जस्टिस दीपक गुप्ता के अनुसार हर समाज के अपने नियम होते हैं और समय के साथ जब लोग सिर्फ पुराने-पुराने नियमों से चिपके रहते हैं तो समाज पतित होता है और इसका विकास नहीं होता है.

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कभी भी जिज्ञासा का त्याग ना करें

कहा कि नये विचारक तब पैदा होते हैं जब वे समाज के स्वीकृत मानदंडों से असहमत होते हैं. अगर हर कोई स्वीकृत मानदंडों का अनुसरण करेगा तो नया मार्ग नहीं बनाया जा सकेगा और ना ही मन को कोई नयी दिशा मिलेगी. अगर कोई व्यक्ति सवाल नहीं पूछता और पुराने सिस्टम पर सवाल नहीं उठाता तो कोई भी नयी प्रणाली विकसित नहीं होगी और मन में नये ज्ञान का विस्तार नहीं होगा.

जस्टिस दीपक गुप्ता का मानना था कि नये विचारों और धार्मिक प्रथाओं का विकास तभी हुआ जब उन्होंने पुरानी प्रथाओं पर सवाल किये. जस्टिस गुप्ता ने कहा, कभी भी जिज्ञासा का त्याग ना करें. हमेशा सवाल करें कि यह विश्वास क्यों? कुछ नया क्यों नहीं? तभी समाज विकसित होगा. कार्यक्रम का आयोजन प्रेलीन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट और जस्टिस पी डी देसाई मेमोरियल लेक्चर कमेटी ने किया.

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