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न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता में फंस जाता है एससी और एसटी समाज : रिटायर्ड जस्टिस सीएस कर्णन

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  • रिटायर्ड जस्टिस सीएस कर्णन ने कहा- देश में संविधान को नहीं, धर्म और जाति को दी जाती है प्रमुखता, इसलिए वंचितों को नहीं मिल पाता न्याय

Ranchi : एससी और एसटी समाज के लोग न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता में फंसकर रह जाते हैं. न्यायालय की प्रक्रिया सही रूप से नहीं समझने के कारण वंचित समाज के लोग वर्तमान में न्यायालय जाने से डरते हैं. न्यायालय में वंचितों की आवाज इसलिए भी दबकर रह जाती है कि उनके समाज का प्रतिनिधित्व करने कोई न्यायाधीश (जज) उन्हें दूर तक नहीं दिखाई देता है. न्यायालय में अधिकतर न्यायाधीश सवर्ण जाति के हैं, इस लिए वंचित समाज को सही रूप में न्याय नहीं मिल पाता है. उक्त बातें मुख्य वक्ता के रूप में कोलकाता के पूर्व जज जस्टिस सीएस कर्णन ने गुरुवार को रांची विश्वविद्यालय के केंद्रीय पुस्तकालय में कहीं. यहां वह बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व और न्याय पर आधारित भारतीय संविधान की विशेषता विषयक एक दिवसीय विचार संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि झारखंड आदिवासी बहुल क्षेत्र है राज्य के आदिवासियों को सामाजिक, आर्थिक एवं न्याय समान रूप से तभी मिल सकेगा, जब आदिवासी समुदाय के लोग न्यायाधीश, आईपीएस और आईएएस जैसे पदों पर काबिज होंगे. जस्टिस कर्णन ने कहा कि भारत में सबसे पहले संविधान को प्रमुखता दी जानी चाहिए, लेकिन देश में सबसे पहले धर्म और जाति को प्रमुखता दी जाती है. इससे वंचित समाज को न्याय नहीं मिल पाता है.

वंचित समाज के सामाजिक-आर्थिक विकास को रोकने के लिए आठ लाख सरकारी नौकरियां खत्म कर रही सरकार : डॉ राम

संगोष्ठी का आयोजन नेशनल फोरम ऑफ एससी/एसटी एंड ओबीसी कम्युनिटी के तत्वावधान में किया गया था. इसमें विषय प्रवेश करते हुए संस्थान के झारखंड प्रभारी डॉ साहदेव राम ने कहा कि आजादी के 71 सालों के बाद भी वंचित समाज को भारतीय संविधान के अनुरूप समानता एवं न्याय नहीं मिल पा रहा है. एससी और एसटी वर्ग के बेरोजगार युवाओं की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है. देश स्तर पर आठ लाख सरकारी नौकरी को सरकार खत्म कर रही है, ताकि वंचित समाज को आर्थिक और सामाजिक विकास से रोका जा सके. कार्यक्रम के माध्यम से मुख्य अतिथि द्वारा संस्थान के सदस्यों एवं कार्यकर्ताओं को सम्मानित किया गया. एससीएस छात्र संगठन के छात्र नेताओं, एससी और एसटी के समाजसेवी लोगों को जस्टिस कर्णन द्वारा सम्मानित किया गया.

न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता में फंस जाता है एससी और एसटी समाज : रिटायर्ड जस्टिस सीएस कर्णन

एकल शिक्षा नीति से होगा वंचित समाज का विकास : पूर्व आईपीएस रामचंद्र राम

पूर्व आईपीएस अधिकारी रामचंद्र राम ने कहा कि देश में दो तरह की शिक्षा नीति होने के कारण वंचित समाज को न्याय नहीं मिल रहा है. निजी और सरकारी शिक्षा को खत्म कर देश में एकल शिक्षा नीति लाने पर बल दिया जाना चाहिए, ताकि देश का वंचित समाज विकास से दूर नहीं हो.

भारतीय न्याय व्यवस्था पर पूरी तरह हावी है जातिवाद : केकेएल गौतम

सुप्रीम कोर्ट के वकील केकेएल गौतम ने कहा कि भारतीय न्याय व्यवस्था पर जातिवाद पूरी तरह से हावी है. न्यायाधीश की जाति के अनुरूप वकीलों को न्याय प्रक्रिया के दौरान सुविधा या सहायता मिलती है. पूरे देश में हाई कोर्ट के लिए 1079 पद स्वीकृत हैं. इन पदों पर मात्र 20 न्यायाधीश एससी/एसटी समुदाय के हैं और 25 ओबीसी समुदाय के. ऐसे में वंचित समाज को किस आधार पर न्याय मिलता है, यह एक गंभीर विषय है.

मूलवासियों को गुलाम के रूप में रखना चाहते हैं मनुवादी : छात्र नेता द्वारिका दास

एसीएस के छात्र नेता द्वारिका दास ने कहा कि देश में मूलवासियों की संख्या 80 फीसदी है, लेकिन सामाजिक, आर्थिक एवं शैक्षणिक समानता न होने के कारण हजारों सालों से मूलवासियों को मनुवादियों ने गुलाम बनाकर रखा है. मूलवासियों के विकास का एक मात्र हथियार है भारतीय संविधान. संविधान को देश में जलाने का कार्य किया जाता है और मनुवादी केंद्र की सरकार चुपचाप इसको देखती है. इससे यही साबित होता है कि मूलवासियों के अधिकारों का हनन करने की साजिश रची जा रही है.

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