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967 गांवों से गुजरी सुदेश की स्वराज स्वाभिमान यात्रा

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Ranchi: आजसू पार्टी के केंद्रीय अध्यक्ष सुदेश महतो ने रविवार देर रात स्वराज स्वाभिमान यात्रा का तीसरा चरण बड़कागांव में पूरा किया. अब तक उन्होंने 426 किलोमीटर की पदयात्रा की है. 967 गांवों से यह  गुजर चुकी है. ढाई सौ से ज्यादा सभा और चौपाल लग चुके हैं. दो अक्तूबर को उन्होंने मांडू से इस यात्रा की शुरुआत की थी. तीन चरणों में उन्होंने मांडू, गोमिया, बेरमो, डुमरी, सिंदरी, टुंडी, खरसांवा, मनोहरपुर, चक्रधरपुर, सरायकेला, इचागढ़, विशुनपुर, लोहरदगा, बड़कागांव विधानसभा क्षेत्र के दूरदराज गांवों के लोगों के  साथ सीधी बात की है.

अवाम को भी है बोलने का अधिकार

श्री महतो ने कहा कि जिन विषयों को लेकर और जिस मकसद के साथ उन्होंने गांवों के लोगों के साथ सीधी बात की शुरुआत की थी वह सिलसिला मजबूत होने लगा है. अवाम को यह लगने लगा है कि उन्हें भी बोलने का अधिकार है. प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर हाशिये पर छोड़े गये आम लोगों के भी सवाल हैं, जिसे पूछने से वे बचते हैं. साहस नहीं करते. लेकिन स्वराज स्वाभिमान यात्रा अब आम लोगों के बीच साहस भरने लगा है. इस यात्रा के मायने निकाले जाने लगे हैं.

अफसर सहजता से लोगों को दें बोलने की पेशकश

उन्होंने कहा कि सत्ता के नुमाइंदे, सियासत करने वाले और सिस्टम चलाने वाले (अफसर) सहजता से और बिना दबाव बनाये कभी किसी गांव की चौपाल में जमीन पर बैठकर इसकी पेशकश करके देख लें. पहले गांव या पंचायत बोले वे सुनेंगे. इस तरह आमआदमी की जुबान से हकीकत सुनाई पड़ जायेगी. सच यह है कि आम आदमी और गांव-पंचायत की आवाज को अब तक को दबाया जाता रहा है.

सपने दिखाना आसान है

श्री महतो ने कहा कि दो महीने की यात्रा में एक बात स्पष्ट तौर पर रेखांकित हुई है कि दूसरे देश और राज्यों से तुलना में यहां सपने दिखाना आसान है. झारखंड की भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक परिस्थतियां, स्थानीय विषय और जनभावनाएं अलग हैं. इन सभी को समझे बिना समेकित तरक्की की लकीर नहीं खींची जा सकती. राज्य में अलग-अलग क्षेत्र की अलग-अलग समस्याएं हैं. लेकिन कुछ एक जैसा है तो वह है सिस्टम की नाकामियां और अफसरशाही-बाबूगीरी का हावी रहना. स्वराज और स्वाभिमान के रास्ते यही अफसरराज बड़ा बाधक है. सत्ता के विकेंद्रीकरण को लिए शासन प्रशासन तैयार नहीं है. आम आदमी इसके खिलाफ लड़ाई के लिए अब मुखर होने लगे हैं। गांव और पंचायत भी चाहती है कि सचिवालय और जिला मुख्यालय का पंचायती राज व्यवस्था पर दबदबा खत्म हो.

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