Opinion

#Saryu Rai ने भ्रष्टाचार को उजागर किया, सबूत भी दिये, अमित शाह ने नहीं की कार्रवाई

Anand Kumar

– एक मंत्री सरकार के कुछ फैसलों पर असहमति जताता है, कैबिनेट की बैठकों में लिखित असहमति व्यक्त करता है, उसकी नहीं सुनी जाती.

– कुछ वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर वह निरंतर आगाह करता है, पत्र लिखता है, प्रमाण देता है, कोई कुछ नहीं करता.

Sanjeevani

– सत्ता शीर्ष पर बैठे अफसरों की मनमानी, गलत निर्णयों पर सवाल करता है, कुछ नहीं होता.

– ताकतवर लोगों की मनमानी, रंगदारी, लूट को चैलेंज करता है,  सरकारी तंत्र सोया रहता है.

– सरकार का सबसे बड़ा कानूनची अदालत में सरकार के निर्णय और राज्यहित के विपरीत पक्ष रखता है, इस पर ध्यान दिलाने पर सब चुप्पी साध जाते हैं.

इसे भी पढ़ें – देश नहीं झुकने दूंगा-देश नहीं बिकने दूंगा कहते-कहते सब बेचते जा रहे

– कैबिनेट से नियुक्त सरकार का वही कानूनची उस मंत्री के विरुद्ध स्टेट बार काउंसिल के अध्यक्ष की हैसियत से निंदा प्रस्ताव पारित कराता है.

– मंत्री कैबिनेट को बताते हैं कि उसी के द्वारा नियुक्त क़ानूनची ने निंदा प्रस्ताव पारित कर सरकार के विरुद्ध काम किया है, उस पर काईवाई नहीं कर मंत्री को अपमानित किया जाता है.

– मंत्री अपनी पार्टी के नेतृत्व को इन बातों से अवगत कराते हैं, इस्तीफे की अनुमति मांगते हैं, उन्हें यह कह कर शांत कर दिया जाता है कि नेतृत्व आपकी बातों पर गौर कर रहा है.

– मंत्री प्रतीक्षा करते रहते हैं क़ानूनची महोदय सत्ता के संरक्षण में मस्त रहते हैं.

– फैसला न होता देख मंत्री कैबिनेट की बैठकों में जाना बंद कर देते हैं. सत्ता शीर्ष में कोई हलचल नहीं होती.

– मंत्री अपने दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष को चिट्ठी सौंपते हैं, आग्रह करते हैं मेरे उठाये मुद्दे सही हैं तो कार्रवाई हो, गलत हैं तो मुझे बताया जाये अन्यथा मुझे पदमुक्त कर दें.

– मंत्री पदमुक्त करने का आग्रह करते हैं मगर कोई निर्णय नहीं होता.

– मंत्री कैबिनेट की बैठकों में करीब 10 माह तक नहीं जाते, साफ कहा- मुझे हटा दें, लेकिन उन्हें पदमुक्त नहीं किया जाता.

– चुनाव आ जाता है, मंत्री इंतजार करते हैं, उनके टिकट की घोषणा नहीं होती.

– मंत्री पार्टी से आग्रह करते हैं कि असमंजस हो तो मेरे नाम पर विचार न करें, पार्टी फिर भी फैसला नहीं ले पाती.

– नामांकन के अंतिम दिन बिना पार्टी की अधिकृत सूची जारी हुए प्रत्याशी तय किया जाता है, घोषणा जिलाध्यक्ष करते हैं.

– नामांकन की तिथि बीतने के दो दिन बाद प्रत्याशी का नाम पार्टी की सूची में आता है.

– मंत्री नामांकन के पहले इस्तीफा भेज देते हैं मगर 3 दिन तक मंजूर नहीं होता.

– वह पार्टी का सदस्य रहते हुए निर्दलीय नामांकन कर देते हैं लेकिन उन्हें पार्टी से निष्कासित करने का निर्णय तक नहीं लिया जाता.

– बात नहीं सुनते, पदमुक्त भी नहीं करते, दल से निकाल भी नहीं पाते.

– और कहते हैं कि मंत्री पद क्यों नहीं छोड़ा?

इसे भी पढ़ें- कोनार डैम का टूटना क्यों न बने चुनावी मुद्दा? लगभग 25 सौ करोड़ की योजना को चूहों ने कुतरा था!

– अरे मूर्खाधिपतियों! मंत्री यूपीएससी की परीक्षा देकर नहीं आता, जो इस्तीफा देगा. पार्टी मंत्री बनाती है, मुख्यमंत्री नियुक्ति की अनुशंसा करता है. इस्तीफा लेना एक मिनट का काम है, तो 10 माह की अनुपस्थिति के बाद भी हटाया क्यों नहीं?

– सरकार का विरोध कर रहे थे, पार्टी लाइन के खिलाफ थे, तो एक शोकॉज नोटिस तो बनता था, दिया क्यों नहीं?

– एक भी मुद्दे पर जवाब क्यों नहीं दिया, क्यों उन मुद्दों पर चुप्पी साध गये सब?

– अब ये न कहना कि मौका दे रहे थे, सीनियर नेता का सम्मान कर रहे थे.

– इतने भोले तो कतई नहीं हैं आप सब.

– मगर ये तो बता ही दें कि इतना असमंजस क्यों था भाई???

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. पत्रिका युगांतर भारती के संपादक हैं.)

इसे भी पढ़ें – डबल इंजन की सरकार ने दो साल में बंद किये 4532 सरकारी विद्यालय, 2300 प्राइवेट स्कूलों को दे दी मान्यता

डिसक्लेमरः इस लेख में व्यक्त किये गये विचार लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गयी किसी भी तरह की सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता और सच्चाई के प्रति newswing.com उत्तरदायी नहीं है. लेख में उल्लेखित कोई भी सूचना, तथ्य और व्यक्त किये गये विचार newswing.com के नहीं हैं. और newswing.com उनके लिए किसी भी प्रकार से उत्तरदायी नहीं है.

Related Articles

Back to top button