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सरदार पटेल आरएसएस को कांग्रेस में शामिल करना चाहते थे, नेहरू नहीं थे सहमत, देशद्रोही  संगठन करार दिया था

नीलांजन मुखोपाध्याय की किताब द आरएसएस: आइकॉन ऑफ द इंडियन राइट के अनुसार  महात्मा गांधी की हत्या के कुछ ही दिनों बाद सरदार पटेल आरएसएस को कांग्रेस में शामिल करना चाहते थे.

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NewDelhi :  नीलांजन मुखोपाध्याय की किताब द आरएसएस: आइकॉन ऑफ द इंडियन राइट के अनुसार  महात्मा गांधी की हत्या के कुछ ही दिनों बाद सरदार पटेल आरएसएस को कांग्रेस में शामिल करना चाहते थे. लेकिन, नेहरू समेत कांग्रेस के काफी नेता इस बात पर सहमत बिल्कुल नहीं थे.  पटेल के अनुसार आरएसएस अपनी राष्ट्रवादी गतिवधियों को कांग्रेस में शामिल होकर ही अच्छे तरीके से पूरा कर सकती है. लेकिन, तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू आरएसएस को देशद्रोही  संगठन करार दिया था.  बता दें कि  30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर बैन लगा दिया गया था.

प्रतिबंध लगने के बाद आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ने प्रतिबंध हटाने के लिए तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल और प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को  कई पत्र  लिखे.  बताया गया कि नेहरू ने कोई जवाब नहीं भेजा, लेकिन सरदार पटेल और गोलवलकर के बीच कुछ पत्रों का लेन देन जरूर हुआ.

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गोलवलकर को गांधी की हत्या का षडयंत्र रचने के आरोप में नागपुर से गिरफ्तार कर लिया गया.

द प्रिंट में छपे किताब के एक हिस्से के अनुसार आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक एमएस गोलवलकर को महात्मा गांधी की हत्या का षडयंत्र रचने के आरोप में एक  फरवरी 1948 को नागपुर से गिरफ्तार कर लिया गया.  बताया गया कि  गिरफ्तारी के दौरान पुलिस जीप की तरफ जाते हुए एमएस गोलवलकर ने अपने समर्थकों से कहा था कि संदेह के बादल जल्द ही हटेंगे और हम निष्कलंक बाहर आयेंगे. छह महीने बाद ही गोलवलकर को छह अगस्त, 1948 को जेल से रिहा कर दिया गया.

लेकिन, रिहाई के बदले उन पर कुछ निश्चित प्रतिबंध भी लगा दिये गये. प्रतिबंध के अनुसार गोलवलकर को नागपुर नगर निगम के दायरे में ही रहना था.  इसके अलावा उनकी राजनीतिक गतिवधियों,  भाषण देना, लेख लिखना या फिर बयान जारी करने को मना कर दिया गया.  लेकिन गोलवलकर के पत्र लिखने पर कोई रोक नहीं थी.  उन्होंने इसका फायदा उठाते हुए कई पत्र तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू और गृहमंत्री सरदार पटेल को लिखे.

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11 अप्रैल, 1948 को गोलवलकर ने नेहरू और पटेल को दो अलग-अलग पत्र लिखे

11 अप्रैल, 1948 को गोलवलकर ने नेहरू और पटेल को दो अलग-अलग पत्र लिखे. इस पत्र में उन्होंने सुनवाई के दौरान अपना पक्ष नहीं रखने देने की शिकायत की और कहा कि देश के इस अहम समय में सरकार के साथ सहयोग वाली उनकी भावनाओं को पेश करने का मौका नहीं दिया गया.  पत्र लिखे जाने के छह सप्ताह बाद भी कोई जवाब नहीं आने पर गोलवलकर ने दूसरा पत्र   24 सितंबर, 48 को लिखा अपने पत्र में उन्होंने प्रधानमंत्री (पंडित नेहरू) और उपप्रधानमंत्री (सरदार पटेल) से आरएसएस पर लगे प्रतिबंध को हटाने की अपील की और देश में व्याप्त सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई में सहयोग देने की बात कही.  अपने पत्र में सरदार पटेल को खास तौर पर संबोधित करते हुए एमएस गोलवलकर ने याद दिलाया, मैं और मेरे सभी साथी शुरुआत से ही स्थिति को सामान्य बनाने और मातृभूमि को अजेय बनाने के लिए लगातार आपका सहयोग कर रहे हैं.

इसके पहले 11 सितंबर, 1948 को सरदार पटेल ने अपने एक  पत्र में बंटवारे के बाद सीमा पार से आये शरणार्थियों को मदद देने और महिलाओं बच्चों को सुरक्षा मुहैया कराने में आरएसएस की भूमिका की प्रशंसा की.  लेकिन, इसके साथ ही उन्होंने संघ पर लगने वाले उन आरोपों पर भी कठोर प्रतिक्रिया दी, जिनमें बदले की भावना के तहत बेगुनाह मुसलमानों पर हमला करना भी शामिल था.  उन्होंने कहा था कि हिंदुओं को इकट्ठा करना और उनकी मदद करना अलग बात है, लेकिन बदले की भावना के तहत निर्दोष और असहाय पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को पीड़ा देना दूसरी बात है.

इस पत्र में पटेल ने एक बेहद ही अतिसंवेदनशील पहलू को भी छेड़ दिया और कहा कि वह आश्वस्त हैं कि अपनी अलग पहचान को छोड़ते हुए आरएसएस के लोग कांग्रेस में शामिल होकर देशभक्ति के जज्बे को आगे बढ़ा सकते हैं.  महात्मा गांधी की हत्या के महज कुछ ही दिन बीतने के बाद पटेल द्वारा बिना किसी से विर्मश किये इस प्रस्ताव पर कांग्रेस के अधिकांश नेता सहमत नहीं थे.  ऐसे लोगों में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी शामिल थे. गोलवलकर को लिखे सरदार पटेल के पत्र से साफ होता है कि उस वक्त आरएसएस को लेकर कांग्रेस के  दो दिग्गजों की राय अलग-अलग थी.

प्रधानमंत्री कार्यालय के वरिष्ठ अधिकारी एवी पाई ने गोलवलकर को लिखा कि आरएसएस देशद्रोह वाली गतिविधियों में संलिप्त रहा है.  जबकि नेहरू ने भी कहा कि आरएसएस की मंशा भारतीय संसद और प्रस्तावित भारतीय संविधान के बिल्कुल खिलाफ है.  हमारी सूचना के अनुसार आरएसएस की गतिविधियां देश विरोधी, घातक और हिंसक रही हैं.

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